
देश-दुनिया में अंडों की डिमांड बढ़ी हैं. अंडों का उत्पादन बढ़ाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में मुर्गी पालन में भी इजाफा होने लगा है. सरकार भी किसानों को मुर्गी पालन की व्यवसाय को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है. पोल्ट्री फार्मिंग की शुरुआत करने के लिए किसानों को बंपर सब्सिडी भी प्रदान की जाती है.
अपनी लड़ाका प्रवृत्ति के लिए मशहूर
देश में कड़कनाथ मुर्गी के साथ-साथ असील मुर्गी की भी लोकप्रियता काफी ज्यादा है. यह नस्ल दक्षिणी पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में पाई जाती है. ये मुर्गी सहनशक्ति, झगड़ालूपन और जबरदस्त लड़ने की क्षमता की वजह से जानी जाती है. इनके काले, लाल मिश्रित रंग के पंख होते है. असील की सभी नस्लों में रेजा (हल्की लाल), टीकर (भूरी), चित्ता (काले और सफेद सिल्वर), कागर (काली), Nurie 89 (सफेद), यारकिन (काली और लाल) और पीला (सुनहरी लाल) नस्लें प्रसिद्ध हैं.
एक अंडे की कीमत 100 रुपये
असील की मुर्गी और मुर्गे का पालन ज्यादातर मीट उत्पादन के लिए किया जाता है. अंडे उत्पादन के मामले में इनकी मुर्गियां कमजोर मानी जाती हैं. ये सालाना सिर्फ 60 से 70 अंडे देने की क्षमता रखती हैं. हालांकि, इनके अंडे की कीमत काफी ज्यादा होती है. सामान्य तौर पर आपको एक अंडा 6 से 10 रुपये में मिलता होगा. वहीं, असील मुर्गी का एक अंडा 100 रुपये में खरीदा जाता है. हालांकि, इनकी कीमत में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है.
कैसा होता है इनका आकार?
असील मुर्गी का मुंह लंबा और बेलनाकार होता है जो कि पंखों, घनी आंखों, लंबी गर्दन वाला होता है. इनकी मजबूत और सीधी टांगे होती हैं. इस नसल के मुर्गे का भार 4-5 किलो और मुर्गी का भार 3-4 किलो होता है. इसके कोकराल (युवा मुर्गे) का औसतन भार 3.5-4.5 किलो और पुलैट्स (युवा मुर्गी) का औसतन भार 2.5-3.5 किलो पाया जाता है. बता दें कि देश में कई जगह मुर्गी या मुर्गों की लड़ाई चलन में हैं. ऐसे में असील नस्ल की मुर्गी और मुर्गों को लड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
ठंड में दवाओं के तौर पर इनके अंडे का किया जाता है सेवन
असील मुर्गी के अंडे सर्दी से बचाने के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं. ठंड के समय इनका सेवन दवा के तरीके से किया जाता है. साथ ही इसके अंडे का सेवन आंखों के लिए भी फायदेमंद होता है.