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किसानों को नहीं जलानी पड़ेगी पराली, इस तरीके से खेतों में ही नष्ट हो जाएंगे फसल अवशेष!

पराली से होने वाला प्रदूषण देश के लिए मुख्य मुद्दा ना बने इसके लिए पूसा (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) ने फसल अवशेषों को खेतों मे ही जलाने के लिए एक कैप्सूल (बायो एंजाइम) तैयार किया है. इस कैप्सूल की खास बात है कि किसानों के फसल के अवशेषों को खेतों में ही नष्ट कर देती है.

Bio-enzyme to destroy paddy stubble Bio-enzyme to destroy paddy stubble
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 2:06 PM IST
  • पराली जलाने की घटनाओं से हवा में बढ़ता है प्रदूषण
  • फसल अवशेषों को नष्ट करने के लिए पूसा ने तैयार किया बायो एंजाइम

Bio- Enzyme For Paddy Stubble: उत्तर भारत के लिए काफी समय से पराली जलाना (Stubble Burning) मुख्य समस्या बनी हुई है. हर साल पराली जलाने की घटनाएं दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता में गिरावट लाने के साथ वायु प्रदूषण बढ़ाती हैं. इस बीच अब खरीफ फसलों की भी कटाई होनी है, लेकिन इस बार सरकार पहले से तैयार है कि किसान भाई खेतों में पराली ना जलाकर कोई वैकल्पिक व्यवस्था अपनाएं. इसके लिए पराली निस्तारण यंत्रों पर अनुदान समेत कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं.

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इस बार पराली से होने वाला प्रदूषण देश के लिए मुख्य मुद्दा ना बने इसके लिए पूसा (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) ने फसल अवशेषों को खेतों मे ही जलाने के लिए एक कैप्सूल (बायो एंजाइम) तैयार किया है. इस कैप्सूल की खास बात ये है कि किसानों की फसल के अवशेषों को खेतों में ही नष्ट कर देता है. पूसा संस्थान ने तय किया है कि अगले तीन वर्षों में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने को समाप्त कर देनी है, इसके लिए उन्होंने 'जलाना नहीं गलाना है' का नारा भी दिया है.

ये कैप्सूल कैसे करता है काम?

पूसा डिकंपोजर छिड़काव के बाद 20-25 दिनों के भीतर पराली को विघटित कर खाद में बदल देता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है. पराली निस्तारण यंत्रों का उपयोग अभी भी अधिकांश किसानों के लिए एक महंगा तरीका है, इसलिए ये बायो एंजाइम किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है. संस्थान ने अभी इसकी 4 कैप्सूल के एक पैकेट की कीमत 20 रुपये रखी है. इससे 25 लीटर घोल बनाया जा सकता है, जिसका उपयोग एक हेक्टेयर (2.5 एकड़) भूमि में किया जा सकता है. 

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पराली न जलाने के लिए किसानों को किया जा रहा जागरूक

> ऑनलाइन बैठकों, वेबिनार, व्हाट्सएप के माध्यम से किसानों को जागरूक करने के लिए नियमित संवाद सत्र चलाए जा रहे हैं.
> पूसा समाचार नामक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का एक साप्ताहिक यू-ट्यूब चैनल भी नियमित रूप से पराली और पूसा डिकंपोजर को लेकर किसानों को नई नई जानकारी देता है.

12 कपंनियों को दिया गया लाइसेंस

आईएआरआई ने पूसा डिकंपोजर को बनाने और इसकी मार्केटिंग के लिए 12 कंपनियों को इस तकनीक का लाइसेंस दिया है. इसके अलावा पिछले साल, पूसा ने उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों के किसानों को 5,730 हेक्टेयर क्षेत्र उपयोग करने के लिए लिए इस कैप्सूल को प्रदान किया था.

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