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सृजन, संरक्षण और संहार... नर्तक शिव नटराज के नृत्य में कितने प्रतीक शामिल हैं?

शिव का दाहिना हाथ एक विशेष मुद्रा में उठाया होता है, जिसे अभय मुद्रा कहा जाता है, जो 'निर्भीक मुद्रा' के रूप में परिभाषित होती है. यह मुद्रा शिव के भक्तों को सुरक्षा और उनके आशीर्वाद का आश्वासन देती है. सृजन और विनाश के निरंतर चक्र के बीच भी, इसमें एक आशा और सुरक्षा की भावना है.

जानें- नटराज के बारे में जानें- नटराज के बारे में
विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 19 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 6:39 AM IST

शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं. पहला उनके क्रोध का परिचायक, प्रलयकारी रौद्र तांडव और दूसरा आनंद प्रदान करने वाला आनंद तांडव. पर ज्यादातर लोग तांडव शब्द को शिव के क्रोध का पर्याय ही मानते हैं. रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र कहे जाते हैं, आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज. प्राचीन आचार्यों के मतानुसार शिव के आनंद तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है और उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है. शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएं हैं. जो संसार में उपस्थित सभी कलाओं के देवता माने जाते है.

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नटराज का नृत्य, जिसे तांडव कहा जाता है, कोई साधारण प्रदर्शन नहीं है! यह एक ब्रह्मांडीय तमाशा है, जो शिव के पांच प्रमुख कार्यों का प्रतिनिधित्व करता है.

सृष्टि (सृजन)
स्थिति (संरक्षण)
संहार (विनाश)
तिरोभव (अंधकार या माया)
अनुग्रह (दिव्य कृपा)

यह एक विशाल संतुलनकारी क्रिया है, जो ब्रह्मांड को सही तरीके से चलाने के लिए आवश्यक है. इस नृत्य के माध्यम से यह दिखाया जाता है कि सृजन और विनाश हमेशा एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, और यही ब्रह्माण्डीय चक्र चलता रहता है. नटराज की मुद्रा में छिपे प्रतीकवाद को और गहरे से समझें तो हर तत्व में छिपा हुआ एक गहरा अर्थ निकलेगा.

डमरूः शिव के दाहिने हाथ में डमरू ब्रह्मांडीय ध्वनि का प्रतीक है, जो सब कुछ शुरू करने वाली 'बिग बैंग' की ध्वनि है, जिसने सृष्टि की शुरुआत की थी.

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आग (अग्नि)
बाईं हाथ में अग्नि, जो विनाश का प्रतीक है, लेकिन यह नकारात्मक रूप में नहीं है. यह एक विशाल रबर की तरह है, जो नए निर्माण के लिए रास्ता बनाता है. जैसे सूखे पत्तों को हटा कर नए विकास के लिए जगह दी जाती है, वैसे ही विनाश आवश्यक होता है ताकि नवीनीकरण हो सके.

उठा हुआ हाथ (अभय मुद्रा)
शिव का दाहिना हाथ एक विशेष मुद्रा में उठाया होता है, जिसे अभय मुद्रा कहा जाता है, जो "निर्भीक मुद्रा" के रूप में परिभाषित होती है. यह मुद्रा शिव के भक्तों को सुरक्षा और उनके आशीर्वाद का आश्वासन देती है. सृजन और विनाश के निरंतर चक्र के बीच भी, इसमें एक आशा और सुरक्षा की भावना है.

इशारा करने वाला हाथ
उनका बायां हाथ नीचे की ओर इशारा करता है, जो उनके उठे हुए पांव की ओर संकेत करता है, जो "अज्ञानता का पर्दा हटाना" और सांसारिक आसक्तियों से मुक्ति का प्रतीक है. यह यह याद दिलाता है कि दुःख से मुक्ति का एक रास्ता है और आध्यात्मिक ज्ञान की ओर एक मार्ग है.

बौना (अपस्मार)
शिव के शक्तिशाली पांव के नीचे एक बौना पड़ा हुआ है. यह बौना अज्ञानता, स्वार्थ और मानव मन की सीमाओं का प्रतीक है. शिव ने अपास्मारा को कुचलकर यह दर्शाया कि ज्ञान और सत्य अज्ञानता पर विजय प्राप्त करते हैं.

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आग के घेरा (प्रभा मंडल)
शिव के रूप के चारों ओर एक अंगारे का घेरा है, जिसे प्रभा मंडल कहा जाता है. यह घेरा समय के निरंतर चक्र और सभी चीजों की अस्थिरता का प्रतीक है. यह याद दिलाता है कि जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और भौतिक दुनिया में सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है.

नटराज का नृत्य हिंदू पुराणों में भी एक विशेष स्थान रखता है. किंवदंतियां कहती हैं कि शिव ने तांडव नृत्य हर बड़े ब्रह्मांडीय चक्र के अंत में किया, ताकि दुनिया का विनाश कर उसे फिर से नए तरीके से बनाया जा सके. यह कथा इस विचार को बल देती है कि विनाश नई शुरुआत के लिए आवश्यक होता है, जैसे हम किसी कमरे को सजाने से पहले साफ करते हैं. इस गहरे सत्य को व्यक्त करते हुए, नटराज परिवर्तन और नई शुरुआत के प्रतीक के रूप में स्थापित होते हैं.

नटराज की कला और सांस्कृतिक प्रभाव
नटराज केवल एक आकर्षक मूर्ति नहीं है, वह सैकड़ों वर्षों से कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं. मूर्तियों और चित्रों से लेकर आकर्षक कहानियों तक, नटराज की छवि भारतीय कला में समाहित हो चुकी है. चोल साम्राज्य के कांस्य मूर्तियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं - ये अत्यधिक विस्तार से और जीवंत तरीके से शिव के नृत्य की ऊर्जा और गति को पकड़ती हैं. ये मूर्तियां न केवल नटराज के रूप को प्रदर्शित करती हैं, बल्कि उनके ब्रह्माण्डीय नृत्य की आध्यात्मिक शक्ति और लय को भी व्यक्त करती हैं.

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नटराज सिर्फ संग्रहालयों तक सीमित नहीं हैं. आप उन्हें मंदिरों और सांस्कृतिक केंद्रों की दीवारों पर भी देख सकते हैं. ये चित्रकला और भित्ति चित्र नटराज के महत्व को दर्शाते हैं, न केवल धर्म के क्षेत्र में बल्कि भारतीय संस्कृति में भी. उन्होंने लेखकों को भी प्रेरित किया है. कवियों और कथाकारों ने नटराज के ब्रह्माण्डीय नृत्य की अवधारणा का उपयोग किया है, ताकि वे सृजन, विनाश और भौतिक दुनिया की सीमाओं को पार करने जैसे गहरे विषयों का अन्वेषण कर सकें.

आज भी कलाकार नटराज से प्रेरणा प्राप्त करते हैं. आधुनिक कलाकार और नर्तक नटराज की छवि की फिर से व्याख्या करते हुए पारंपरिक तत्वों को समकालीन शैलियों में मिला रहे हैं. इस दृष्टिकोण से नटराज आधुनिक दर्शकों के लिए प्रासंगिक बने रहते हैं, साथ ही यह भारत की समृद्ध कलात्मक और आध्यात्मिक धरोहर की भी याद दिलाता है. नटराज की व्यापक पहचान ने उसे भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रतीक बना दिया है, जिससे लोग दुनिया भर में भारत की गहरी कलात्मक और आध्यात्मिक परंपराओं को सराह रहे हैं.

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