
सनातन परंपरा और भारतीय मनीषा ने प्रकृति का वर्गीकरण दो प्रमुख तत्वों के रूप में किया है. नश्वर और अनश्वर. मजे की बात ये है कि जो नश्वर है, उसका नष्ट होना और फिर से नया सृजन होने का भी एक चक्र है और यह चक्र अनश्वर है. यानी कि दूसरे अर्थों में देखें तो सृष्टि नाशवान होने के साथ ही उसी समय में अनश्वर भी है. ये अनश्वर का क्रम नित्य चलता रहता है. संस्कृत में इस नित्य के लिए नित और नृत शब्द आया है.
नृत का अर्थ है चक्करदार या फिर एक चक्र में सतत चलना.. आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इसी नृत का अर्थ नृत्य होता है. नृत्य यानि नाचना, या फिर चक्कर लगाना या फिर चक्र लेना. संयोग से चक्कर लगाना नृत्य कला का ही एक हिस्सा है, नृत्य की प्रेरणा नटराज शिव हैं और इसलिए शिव के समान ही नृत्य भी अविनाशी है.
भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है नृत्य
नृत्य केवल एक कला का रूप नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है. भारतीय पौराणिक कथाओं, दर्शन और धार्मिक ग्रंथों में भी इसका खास स्थान है. यह न केवल अभिव्यक्ति का जरिया है, बल्कि देवताओं की आराधना, आध्यात्मिक साधना और सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न अंग भी रहा है. भारतीय दर्शन में नृत्य को आत्मा की भाषा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का माध्यम माना गया है. यह सृष्टि की उत्पत्ति, ध्वंस और पुनर्जन्म से गहराई से जुड़ा हुआ है.
नटराज शिव और तांडव
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में नृत्य को ब्रह्मांडीय लय और ऊर्जा के रूप में देखा गया है. विभिन्न ग्रंथों में इसे सृजन, विनाश और पुनर्जन्म की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है. इसका उदाहरण शिव तांडव भी है और ब्रह्मांडीय लय भी. भगवान शिव को नटराज कहा जाता है, जो नृत्य के स्वामी हैं. उनका तांडव नृत्य सृष्टि, संहार और पुनरुत्थान का प्रतीक है. यह नृत्य ब्रह्मांड की ऊर्जा और संतुलन को दर्शाता है. भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण से, शिव का नृत्य प्रकृति और चेतना की अनवरत गति का प्रतीक है.
रासलीला... जो कृष्ण लीलाओं का साक्षी है
वहीं, जब रासलीला की बात होती है तो यह नृत्य शृंगार का पक्ष लेते हुए भक्ति भाव की ओर बढ़ता है. श्रीकृष्ण और गोपियों के रासलीला नृत्य को प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक माना जाता है. यह नृत्य गोपियों की ईश्वरीय आत्मसमर्पण और प्रेम की भावना है. भक्ति दर्शन के अनुसार, रासलीला आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है. स्वर्गलोक की अप्सराएं, जैसे उर्वशी, मेनका और रंभा, देवताओं के आनंद और मनोरंजन हेतु नृत्य करती थीं. ये नृत्य कला, सौंदर्य और मोहकता का प्रतीक थे.
नटराज का चित्रण और मूर्तिकला
दक्षिण भारत में मंदिरों में शिव के नटराज स्वरूप की मूर्तियां स्थापित हैं, जो उनके ब्रह्मांडीय नृत्य को दर्शाती हैं. यह नृत्य आध्यात्मिक जागरण और सृजन की शक्ति का प्रतीक है. भारतीय दर्शन में नृत्य केवल भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि एक साधना है. योग, ध्यान और आध्यात्मिक साधना के साथ नृत्य को आत्मा के उच्चतम स्तर पर ले जाने का साधन माना गया है. शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में नृत्य को आत्मा की चैतन्यता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह माना गया है. नर्तक जब पूर्ण रूप से नृत्य में लीन होता है, तो वह आत्मानुभूति की अवस्था में पहुंच जाता है.
नाट्य शास्त्र में योग की प्रक्रिया है नृत्य
सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति और पुरुष के संतुलन में नृत्य एक माध्यम बनता है, जिसमें प्रकृति की गतिशीलता और पुरुष की चेतनता समाहित होती है. योग में मुद्रा, आसन और प्राणायाम के माध्यम से नृत्य को आत्मिक ऊर्जा का साधन माना गया है. नाट्यशास्त्र में नृत्य को योग की एक विधि के रूप में देखा गया है.
भरत मुनि के लिए क्या है नृत्य कला
भारतीय और पश्चिमी विद्वानों ने नृत्य को दर्शन, आध्यात्म और आत्मिक अभिव्यक्ति से जोड़ा है. नाट्य शास्त्र के रचनाकार, भरत मुनि कहते हैं कि 'नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि यह जीवन का सार और आत्मा की भाषा है.' उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में नृत्य की मुद्राओं, रसों और भावों को विस्तार से बताया. वहीं, कश्मीर के अभिनवगुप्त, जो कि प्रसिद्ध दार्शनिक रहे हैं उन्होंने भी नृत्य को आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बताया. उनके अनुसार, "नृत्य वह साधना है, जिसमें आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है."
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय नृत्य परंपरा को आध्यात्मिक चेतना का एक रूप माना. उनके अनुसार, "नृत्य वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपने भीतर की ऊर्जा को समझते हैं."
इन सबसे हटकर, ओशो कहते हैं कि "जब आप पूर्ण रूप से नृत्य में डूब जाते हैं, तो आपका अहंकार विलीन हो जाता है और आप अस्तित्व के साथ एक हो जाते हैं."
भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियां, जैसे भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, ओडिसी, और मणिपुरी, पौराणिक कथाओं पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियां करती हैं. इन नृत्य शैलियों में मुद्राओं, हाव-भावों और गीतों के माध्यम से रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक घटनाओं को मंच पर जीवंत किया जाता है.
भरतनाट्यम: यह नृत्य देवदासी परंपरा से विकसित हुआ, जिसमें शिव, पार्वती और अन्य देवी-देवताओं की कथाएं प्रस्तुत की जाती हैं.
कथक: उत्तर भारत की यह नृत्य शैली कृष्णलीला और मुगल दरबार की कहानियों से प्रभावित है.
ओडिसी: इस नृत्य में भगवान जगन्नाथ, राधा-कृष्ण और अन्य पौराणिक प्रसंगों को भावनात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
कुचिपुड़ी: यह नृत्य शैली विशेष रूप से भगवान विष्णु की कथाओं पर आधारित होती है.
नृत्य का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
नृत्य केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा भी है. यह ध्यान और साधना का एक रूप है, जिसमें नर्तक अपनी आत्मा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ता है. नृत्य के माध्यम से कलाकार अपनी भक्ति को अभिव्यक्त करता है और दर्शकों को भी दिव्यता का अनुभव कराता है. प्राचीन समय में मंदिरों में नृत्य को पूजा का हिस्सा माना जाता था. देवदासियां मंदिरों में नृत्य के माध्यम से भक्ति प्रदर्शित करती थीं.
विभिन्न धार्मिक उत्सवों, जैसे नवरात्रि, जन्माष्टमी और शिवरात्रि में नृत्य का विशेष महत्व होता है. ध्यान की तरह नृत्य भी एक साधना का रूप है, जिसमें मन, शरीर और आत्मा का समर्पण होता है. नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. यह पौराणिक कथाओं, दर्शन और आत्मिक साधना से गहराई से जुड़ा हुआ है. नृत्य के माध्यम से हम न केवल अपनी संस्कृति को संरक्षित कर सकते हैं, बल्कि आत्मा और ब्रह्मांड के बीच संतुलन भी स्थापित कर सकते हैं.