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वेद-पुराणों में वर्णन, अवतार का कॉन्सेप्ट और डेली रुटीन में शामिल... भारतीयों के बीच कैसे विकसित हुई नाट्यकला

नाटक क्या है और इस कला का विकास कब, कैसे और किस तरह से हुआ, इन सभी सवालों का जवाब देता है, प्राचीन ऋषि भरतमुनि द्वारा लिखा गया महान ग्रंथ नाट्यशास्त्र. अग्निपुराण में भी नाटक के लक्षण और उसकी प्रकृति दर्ज है. अग्निपुराण में दृश्य काव्य के 27 प्रकार बताए गए हैं. यानी नाटक को हम जितना सिर्फ एक शब्द से समझते हैं, वह सिर्फ इस पूरी कला का एक छोटा सा प्रकार भर है.

भारत में पौराणिक कथाओं से नाटकों का विकास भारत में पौराणिक कथाओं से नाटकों का विकास
विकास पोरवाल
  • नई दिल्ली,
  • 14 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 9:59 AM IST

करीब डेढ़ सौ साल पुराना किस्सा है, गांव के एक स्कूल में निरीक्षण के लिए अफसर पहुंचे. छठवीं क्लास के बच्चों की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने पांच शब्द बोले जिसकी स्पेलिंग लिखनी थी. एक बच्चे ने चार शब्दों की स्पेलिंग तो सही लिखी थी, लेकिन एक शब्द गलत लिखा. टीचर ने उसकी कॉपी देखी और धीरे से इशारा करके बोले कि बगल वाले लड़के की कॉपी देखकर स्पेलिंग ठीक कर लो, लेकिन उस बच्चे ने ऐसा नहीं किया. ये बच्चा कोई मामूली बच्चा नहीं था, ये थे मोहन दास जो आगे चलकर इतिहास के पन्नों पर अमर हो गए.    

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महात्मा गांधी ने देखा था सत्य हरिश्चंद्र नाटक
आखिर मोहनदास ने नकल करके स्पेलिंग क्यों ठीक नहीं की? गांधी जी इस बारे में जवाब देते हुए कहा था कि इस वाकये के कुछ दिन पहले ही मैंने सत्य हरिश्चंद्र नाटक देखा था. नाटक इतना प्रभावशाली था और उसकी कथावस्तु ने मुझ पर ऐसा असर डाला था कि मैंने तय कर लिया था कि झूठ का सहारा नहीं लूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए. महात्मा गांधी की लिखी पुस्तक 'मेरे सत्य के प्रयोग' में सत्य का यही मंत्र देखने को मिलता है. वह जीवन भर जिस सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चले, उस राह पर चलने का दर्शन उन्हें इसी नाटक से मिला था.

गीता में श्रीकृष्ण ने क्या कहा?
नाटक... गीता में श्रीकृष्ण जब अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान देते हैं तब उसे समझाते हुए जो भी बातें कह रहे होते हैं, उनका सार ऐसा है कि 'जो हो चुका है, जो होने वाला है और जो भी आगे घटित होगा, वह सब कुछ पहले से निश्चित है. तुम बस अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उसी लक्ष्य की ओर बढ़ो. कृष्ण ने यहां जीवन को महज एक अभिनय कहा है और हर जीव को किरदार, जो माया के इस खेल में अपने-अपने पात्र की भूमिका निभा रहा है. इस माया से पार पाना कठिन है.'

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वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

कहा जा सकता है कि धरती पर जीवन की शुरुआत हुई तो वह एक नाटक के तौर पर ही आगे बढ़ा. इसी अभिनय में संघर्ष भी है, करुणा भी है, हिंसा, क्रोध, प्रेम, शृंगार, आस्था और विश्वास सब कुछ है. हर तरह की भावना से भरे हुए इस जीवन रूपी इस नाटक को कौन देख रहा है? ये सवाल जब अबूझ हो गया तो ऋषियों-मनीषियों ने इसकी खोज में वेद गढ़े, पुराण रचे, उपनिषद लिखे और लिखे गए कई तरह के भाष्य, टीका ग्रंथ और उपवेद भी. इस ज्ञान को जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर करने की बारी आई तो इसके लिए माध्यम बने, श्रव्य और दृष्य.

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कैसे हुई नाटक की उत्पत्ति? 

श्रव्य माध्यम से कविता-साहित्य का जन्म हुआ और दृश्य यानी देखे जाने लायक माध्यम, यानी दृष्य माध्यम बना नाटक. नाट्य शास्त्र भी कहता है कि नाटक, काव्य का एक रूप है और यह रचना का वह भाग है जो श्रवण (सुनने से) से नहीं, बल्कि आंखों से देखे जाने के जरिए हृदय में रसों का अहसास कराता है. नाटक को इसीलिए प्राचीन ग्रंथों में दृश्य-काव्य कहा गया है. नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है.

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नाट्य कला के 27 भेद
नाटक क्या है और इस कला का विकास कब, कैसे और किस तरह से हुआ, इन सभी सवालों का जवाब देता है, प्राचीन ऋषि भरतमुनि द्वारा लिखा गया महान ग्रंथ नाट्यशास्त्र. अग्निपुराण में भी नाटक के लक्षण और उसकी प्रकृति दर्ज है. अग्निपुराण में दृश्य काव्य के 27 प्रकार बताए गए हैं. यानी नाटक को हम जितना सिर्फ एक शब्द से समझते हैं, वह सिर्फ इस पूरी कला का एक छोटा सा प्रकार भर है.

ये 27 भेद ऐसे हैं: नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अंक, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, विलासिका, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीनिगदित, नाटयरासक, रासक, उल्लाप्यक और प्रेक्षण.

अग्निपुराण में है नाटक का विवरण
अग्निपुराण के इस संदर्भ से सामने आता है कि, भारत में अभिनय-कला और रंगमंच का विकास वैदिक काल में ही हो चुका था. वेदों की ऋचाओं के जरिए संस्कृत रंगमंच बहुत उन्नति और प्रगति मिली. बहुत प्राचीन समय में भारत में संस्कृत नाटक धार्मिक अवसरों, सांस्कृतिक पर्वों, सामाजिक समारोहों का हिस्सा रहे हैं. बाद में संस्कृत जब राजकीय बोलचाल की भाषा नहीं रही तो संस्कृत नाटकों का मंचन भी धीरे-धीरे खत्म होता चला गया.

नट-नटी और नाट्यकला
पौराणिक ग्रंथों की बात करें तो भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के अलावा, रामायण, महाभारत के साथ ही हरिवंश पुराण में भी नट शब्द आया है और नाटक का विस्तार से उल्लेख होता है. संस्कृत व्याकरण के आचार्य पाणिनि ने जब नाटकों के संदर्भ ग्रंथ लिखे तो उन्होंने खासतौर पर दो नाम लिए हैं जो नटसूत्रकार कहलाते हैं. इनमें स्त्री पात्र का नाम है 'शिलाली' और पुरुष पात्र का नाम कृशाश्व है.

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शतपथ ब्राह्मण में भी मिलता है वर्णन
शिलाली का नाम शुक्ल यजुर्वेद के साथ शतपथ ब्राह्मण में मिलता है और सामवेदीय अनुपद सूत्र में भी इस नटी का जिक्र आता है. शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ को 4000 साल से अधिक प्राचीन बताया गया है. हालांकि यूरोपीय एलीट दावा करते रहे हैं कि नाटकों का जन्म और विकास ग्रीस-एथेंस में हुआ था. लेकिन इन दावों को कई बल नहीं मिलता है. उनके इस दावे का आधार प्राचीन ओलंपिक खेलों से जुड़ी मान्यताएं हैं. जब एक सार्वजनिक समारोह में किसी प्राचीन युद्ध की नकल की जाती थी. यही नकल यूरोप में नाट्य की शुरुआत हो सकती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है.

पौराणिक ग्रंथों में कई जगह मिलता है नाटक का विवरण
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में तो कई कथाएं ऐसी हैं, जिनमें नाटक, नृत्य और चित्रकला की ही तरह किरदार की तरह शामिल होते हैं और कथानक को आगे बढ़ाने वाले रहे हैं. हरिवंश पुराण में दर्ज है कि जब प्रद्युम्न, सांब आदि यादव राजकुमार वज्रनाभ की नगरी में गए थे तब वहां उन्होंने 'रामजन्म' और 'रंभाभिसार' नाटक खेले थे. इस पुराण में यह भी दर्ज है कि किस-किस राजकुमार ने कौन से किरदार निभाया था.

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जब श्रीकृष्ण के कुल के लोगों ने किया रामकथा का मंचन
नाटक का कथानक उस प्रसंग से निकलता है, जब रावण ने नलकुबेर की व्याहता रंभा के साथ दुष्कर्म किया था और नल कुबेर उसे श्राप देता है कि, 'अगर रावण ने आगे कभी किसी स्त्री के साथ जबरन संबंध स्थापित किए तो उसके सिर में विस्फोट हो जाएगा.' इस नाटक में राजकुमार शूर रावण बना था. मनोवती ने रंभा का किरदार निभाया था. कृष्ण के बड़े पुत्र प्रद्युम्न ने नलकुबेर का किरदार निभाया तो वहीं कृष्ण और जांबवंती के पुत्र सांब ने विदूषक की भूमिका निभाई थी.

पुराणों की वो कथाएं जिनमें किरदार का काम करता है नाटक
पुराणों में नाटक के और भी उदाहरण मिलते हैं. स्कंद पुराण में जब मोहिनी अवतार का जिक्र होता है, तब वह भगवान विष्णु द्वारा मोहिनी अवतार में खेला गया एक नाटक ही था. इसी तरह भस्मासुर वाले प्रकरण में भी विष्णु मोहिनी बनकर आए थे. वह एक नाटक ही था. राम अवतार में रावण, साधु बनकर सीता का हरण करता है, यह रावण द्वारा खेला गया नाटक ही था. कृ्ष्ण की रासलीलाएं शृंगार प्रधान आध्यात्मिक नाटक का स्वरूप हैं. बल्कि बहुत विस्तार से देखा जाए तो पुराणों की सभी अवतार कथाएं, अपने आप में एक नाटक ही हैं. इसलिए यह तय कर पाना तो कठिन ही है पहला नाटक कौन सा रहा होगा और कैसे किया गया होगा. यहां श्रीकृष्ण का गीता ज्ञान ही काम आता है, जहां वह कहते हैं कि यह जीवन ही एक नाटक है.

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भारतीय नाटकों के दो सबसे प्राचीन आधार रामलीलाएं और रासलीलाएं हैं. इनकी प्राचीनता का अंदाजा ऐसे भी लगा सकते हैं कि भारत में सिकंदर के आगमन के बाद मंचीय व्यवस्था में पर्दा प्रथा का आगमन माना जाता है, जिसे संस्कृति में यवनिका कहा गया है, लेकिन रामलीला और रासलीला का मंचन आज भी बिना पर्दे के खुले मंच पर होता है. इसमें आप मंच की लगभग कई एक्टिविटी को दर्शक दीर्घा से देख सकते हैं.

भारतीयों ने खुद किया है नाटकों का विकास
इन सभी विश्लेषणों के आधार पर प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार ऑगस्ट विल्सन भी मानते हैं कि, 'भारत में भारतीयों ने अपने यहां नाटक का विकास खुद से किया. यह उनके लिए रोजाना का हिस्सा था. उनकी संस्कृति ही ऐसी समृद्ध रही है और इसके अलावा शताब्दियों का उनका संघर्ष भी दूसरे मुल्कों के लिए एक गाथा की ही तरह है.' नाटक के इतिहास की तहें भारत की सनातन संस्कृति और उसकी पौराणिक गाथाओं की समृद्धि में है. बाद में ये सारी कहानियां हीं कहीं नृत्य, कभी गीत, कभी राग, कभी चित्र और कभी शिल्प का विषय बनीं. इन कहानियों की दृश्य परंपरा से ही नाटक का विकास हुआ है, जो समय के साथ और भी समृद्ध होता गया है. अगली कड़ी में नाटक की विकास यात्रा पर और गहराई से बात रखेंगे.

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