
भारत में नाट्यकला कैसे सामने आई और फिर कैसे विकसित हुई, यह कहना कठिन है, लकिन यह जरूर है कि जिस तरह से भारत में वेदों और पुराणों को एक-पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर करने के लिए श्रुति परंपरा रही है, इसी समय कहानी को और प्रभावी ढंग से कहे जाने की जरूरत ने दृश्य दिखाए जाने को जरूरी समझा होगा.
किसी कथा का दृश्य रूपांतरण ही आगे जाकर नाटक हो गया होगा और इस कला का विकास वैदिक और पौराणिक परंपरा के विकास के साथ ही हुआ. यही वजह रही होगी कि भरत मुनि का नाट्यशास्त्र एक अलग ही वेद की संज्ञा के साथ प्रचारित हुआ, हालांकि यह खुद सामवेद का ही हिस्सा है, जहां गीत और नृत्य की विधाओं का ज्ञान समाया हुआ है. इस तरह भारतीय नाट्य कला का कम से कम 8000 सालों का अलिखित इतिहास तो रहा ही होगा, ऐसा माना जा सकता है.
भारतीय नाट्यकला की परंपरा किसी सागर की तरह गहरी और अनंत है, जो कम से कम 5000 वर्षों से (अपने लिखित इतिहास के साथ) अपनी लहरों के साथ मानव मन को मंत्रमुग्ध करती आ रही है. यह केवल एक कला नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन दर्शन है, जिसमें साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है.
जब हम इसकी जड़ों में झांकते हैं, तो हमें भरत मुनि का वह पवित्र ग्रंथ "नाट्यशास्त्र" मिलता है, जिसे नाट्यकला का व्याकरण कहा गया. यह विश्व की पहली पुस्तक थी, जो नाट्य के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है. इसका रचनाकाल 2000 ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच माना जाता है, जो इसकी प्राचीनता और गहनता का प्रमाण है.
नाट्यकला की कथात्मक शुरुआत
भारत में नाट्यकला का उद्भव एक कथात्मक शैली के रूप में हुआ. गायन, वादन और नृत्य इसके अभिन्न अंग बन गए. यह कथात्मकता ही थी, जिसने भारतीय रंगमंच को प्रारंभ से ही नाटकीय और जीवंत बनाया. यहाँ का थिएटर केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि यह जीवन के रस को चखने और समझने का माध्यम था. यहाँ साहित्य की गहराई, माइम की सूक्ष्मता, संगीत की मधुरता, नृत्य की लय, चित्रकला की रंगीनता और मूर्तिकला की स्थिरता एक साथ मिलकर "नाट्य" नामक उस अनुपम कला को जन्म देती थी, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा बन गई.
शास्त्रीय संस्कृत नाट्यकला: एक स्वर्णिम युग
भारतीय नाट्यकला का सबसे प्रारंभिक और शास्त्रीय रूप संस्कृत नाट्यकला थी. यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईस्वी के बीच उभरी और पहली से दसवीं शताब्दी तक अपने चरम पर रही. यह वह काल था, जब भारत में सापेक्ष शांति थी और सैकड़ों नाटकों की रचना हुई. ग्रीक और रोमन थिएटर के बाद और एशियाई थिएटर के उदय से पहले, संस्कृत नाट्यकला ने विश्व मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई.
संस्कृत नाटकों को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया: लोकधर्मी और नाट्यधर्मी. लोकधर्मी नाटक दैनिक जीवन और मानव व्यवहार को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करते थे, जबकि नाट्यधर्मी नाटक शैलीगत इशारों और प्रतीकों के माध्यम से कला को अधिक कलात्मक और भावनात्मक बनाते थे. यह द्वैत भारतीय नाट्यकला की विविधता और समृद्धि का प्रतीक था.
महान संस्कृत नाटककार और उनकी कालजयी रचनाएं
संस्कृत नाट्यकला के इतिहास में कई नाटककारों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी. सबसे पहले अश्वघोष का नाम आता है, जिन्होंने "सारिपुत्रप्रकरण" लिखा. यह नाटक एक वैश्या के इर्द-गिर्द घूमता है, जो हास्य और बौद्ध शिक्षाओं का अनोखा मिश्रण प्रस्तुत करता है. इसके बाद भास आए, जिनकी तेरह रचनाएं आज भी जीवित हैं. उनकी "स्वप्नवासवदत्ता" एक ऐसी कृति है, जो प्रेम और स्वप्न के बीच की महीन रेखा को छूती है. भास ने रामायण, महाभारत और पुराणों से प्रेरणा ली, जिससे उनके नाटक कालातीत बन गए.
शूद्रक ने "मृच्छकटिका" के माध्यम से एक नया आयाम जोड़ा. उनके नाटकों में नायक-नायिका के साथ-साथ खलनायक की मौजूदगी उन्हें विशिष्ट बनाती है. यह संघर्ष का तत्व संस्कृत नाटकों में दुर्लभ था. फिर आए कालिदास, जिन्हें संस्कृत साहित्य का शिरोमणि माना जाता है. उनके "शाकुंतलम", "मालविकाग्निमित्र" और "विक्रमोर्वशी" नाटक प्रेम, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं की ऐसी अभिव्यक्ति हैं, जो आज भी हृदय को स्पर्श करती हैं.
भवभूति ने "उत्तररामचरित्र" के साथ शास्त्रीय काल के उत्तरार्ध में अपनी पहचान बनाई. यह नाटक राम के जीवन के उस हिस्से को दर्शाता है, जो दुख और त्याग से भरा है, फिर भी इसमें एक गहरी भावनात्मक सुंदरता है. शूद्रक, हर्ष, विशाखदत्त, भास, कालिदास और भवभूति – ये छह नाटककार संस्कृत नाट्यकला के आधार स्तंभ हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं से इस कला को अमर बना दिया.
संस्कृत नाटकों के प्रकार और संरचना
नाट्यशास्त्र में नाटकों को दस प्रकारों में वर्गीकृत किया गया: नाटक, प्रकर्ण, अंक, व्यायोग, भाना, संवकार, विथि, प्रहसन, दिमा और इथमग्र. इनमें से "नाटक" और "प्रकर्ण" सबसे प्रमुख थे. "नाटक" पांच से सात अंकों के होते थे, जो गहरी कथाओं को प्रस्तुत करते थे, जबकि "प्रकर्ण" लेखक की मौलिक कल्पना पर आधारित होते थे. "शाकुंतलम" और "उत्तररामचरित्र" जैसे नाटक इस श्रेणी में आते हैं.
संस्कृत नाटकों की प्रस्तुति एक अनुष्ठान की तरह होती थी. यह "पूर्वरंग" से शुरू होती थी, जिसमें संगीत और नृत्य के साथ मंच तैयार किया जाता था. सूत्रधार और उनके सहायक थिएटर के देवता की पूजा करते थे, ताकि नाटक की सफलता सुनिश्चित हो. इसके बाद प्रस्तावना में नाटक का समय, स्थान और लेखक का परिचय दिया जाता था. यह संरचना नाटक को एक पवित्र और भावनात्मक अनुभव बनाती थी.
संस्कृत नाट्यकला का पतन
हर स्वर्णिम युग की तरह, संस्कृत नाट्यकला का भी पतन हुआ. इसके कई कारण थे. जैसे-जैसे नाटककारों का झुकाव कविता की ओर बढ़ा, नाटकीयता गीतात्मकता में खोने लगी. कठोर रूढ़िवादिता ने नए रचनाकारों की स्वतंत्रता छीन ली. धार्मिक क्षेत्र तक सीमित होने के कारण यह जनसामान्य से दूर होती गई. और अंततः, मुस्लिम आक्रमणों ने इस कला को और पीछे धकेल दिया. लेकिन इसका प्रभाव और इसकी आत्मा कभी खत्म नहीं हुई.
भारतीय लोक नाट्यकला: जन-जन की आवाज
जहाँ संस्कृत नाट्यकला शास्त्रीयता की ऊंचाइयों को छूती थी, वहीं लोक नाट्यकला ने जन-जीवन की मिट्टी से अपनी जड़ें मजबूत कीं. वैदिक काल और बौद्ध साहित्य में इसके बीज दिखते हैं, लेकिन मध्यकाल में यह पूर्ण रूप से फला-फूला. 15वीं-16वीं शताब्दी में यह पुराणों, महाकाव्यों और मिथकों के चित्रण के रूप में उभरा.
लोक नाट्यकला कथात्मकता में रची-बसी थी. यहां नृत्य, संगीत, मुखौटे और कोरस के साथ कहानियाँ जीवंत हो उठती थीं. भारत के हर राज्य में इसके अपने रंग-रूप हैं – तमिलनाडु का "थेरुक्कुत्तु", महाराष्ट्र का "तमाशा", गुजरात का "भवाई" या बंगाल का "जात्रा". यह नाट्यकला केवल मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह संस्कृति और परंपरा का जीवंत दस्तावेज थी.
नौ रसों का समन्वय
भारतीय नाट्यकला में "नौ रस" – श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत – का अद्भुत समावेश देखने को मिलता है. लोक नाट्यकला ने इन रसों को जन-जन तक पहुँचाया, तो शास्त्रीय नाट्यकला ने इन्हें परिष्कृत किया. यह रस ही भारतीय नाट्य को विश्व की अन्य परंपराओं से अलग करता है.
भारतीय नाट्यकला केवल एक कला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है, जो प्राचीन काल से आधुनिक युग तक अनवरत चल रही है. यह वह दर्पण है, जिसमें हम अपनी सभ्यता, संवेदनाएँ और सपने देखते हैं. संस्कृत नाट्यकला की शास्त्रीयता हो या लोक नाट्यकला की जीवंतता, दोनों ने मिलकर भारतीय रंगमंच को एक ऐसा स्वरूप दिया, जो समय की सीमाओं को पार कर आज भी हमें प्रेरित करता है. यह परंपरा न केवल हमारे अतीत का गर्व है, बल्कि भविष्य के लिए एक अनमोल धरोहर भी.