Advertisement

जब राजनीति छोड़कर सरकारी ठेकेदार बनना चाहते थे नीतीश कुमार

नीतीश कुमार बिहार की सत्ता की आज वो धुरी हैं जिसके इर्द-गिर्द ही बीते 20 सालों से राज्य की राजनीतिक हो रही है. लगभग दो दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे नीतीश कुमार ने वो दौर भी देखा है जब उन्हें चुनाव में बार-बार हार का सामना करना पड़ा था और उन्होंने राजनीति को त्याग देने का मन बना लिया था. नीतीश कुमार राजनीति छोड़कर ठेकेदार बन जाना चाहते थे.

राजनीति छोड़ना चाहते थे नीतीश कुमार राजनीति छोड़ना चाहते थे नीतीश कुमार
कुणाल कौशल
  • पटना,
  • 30 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 11:03 AM IST

साल 2005 से लेकर 2024 तक यानी कि बीते 19 साल में अगर सिर्फ़ 9 महीने को छोड़ दें तो नीतीश कुमार लगभग बीते दो दशकों से बिहार की सत्ता पर क़ाबिज़ हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री है. इस दौरान वहां विपक्ष बदलता रहा है लेकिन सीएम नीतीश कुमार ही रहे हैं.

एक बार फिर वो पीएम मोदी से कंधे से कंधा मिलाकार देश के सबसे बड़े चुनावी महासमर में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन क्या आपको पता है एक वक्त ऐसा भी था जब नीतीश कुमार राजनीति से संन्यास लेकर बिहार में सरकारी विभागों के ठेकेदार बनना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने कोशिशें भी शुरू कर दी थीं.

Advertisement

बात 1977 की है. बिहार में इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान छात्र राजनीति से दो नेता उभर कर सामने आए जिसमें एक नीतीश कुमार और दूसरे लालू यादव थे, आपाताकाल को 2 साल बीत चुके थे और दोनों ही बिहार में अपने भविष्य की राजनीति के लिए रास्ता तलाश रहे थे. 

इसी दौरान साल 1977 में आपातकाल विरोधी लहर पर सवार होकर राजनीति में लालू यादव का सूरज चढ़ने लगा और वो छपरा से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए. वहीं नीतीश कुमार उसी साल बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी घरेलू सीट हरनौत से बुरी तरह चुनाव हार गए. इस चुनाव में हार से नीतीश कुमार अंदर से टूट गए क्योंकि उन्होंने अपने ही इलाक़े में इतनी बुरी तरह हार की कल्पना भी नहीं की थी.

अपनों ने ही हराया पहला चुनाव

Advertisement

नीतीश कुमार के बेहद करीबी, कई यात्राओं में उनके साथी और उनकी जीवनी लिखने वाले संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘अकेला आदमी, कहानी नीतीश कुमार की’ में लिखते हैं कि नीतीश कुमार का शुरुआती चुनाव रिकॉर्ड इतना खराब रहा कि उन्होंने राजनीति छोड़ने का इरादा बना लिया, हरनौत की हालत उनकी बर्बादी का कारण बन गई, उनके प्रभावशाली कुर्मी रिश्तेदार ही चुनाव में एकजुट हो गए थे, नीतीश को इस बात से बड़ा धक्का लगा कि उन नाते रिश्तेदारों में उनके अपने ससुराल वाले भी शामिल थे.

नीतीश इस हार से उबर नहीं पाए थे और बिहार में जातीय संघर्ष का दौर शुरू हो चुका था. 1977 में पटना से चंद किलोमीटर की दूरी पर बेलछी गांव में एक बड़ा नरसंहार हो गया जिसकी तपिश पटना तक ही नहीं बल्कि दिल्ली तक पहुंच गई. ये हिंसा कुर्मी-कोइरी और उस समय के दुसाध वर्ग के बीच में हुई थी. 

नीतीश कुमार ने उस दौरान हिंसा की वजह से कुर्मियों का प्रतिनिधित्व करने से इनकार कर दिया जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें साल 1980 के विधानसभा चुनाव में फिर भुगतना पड़ा. नीतीश कुमार को फिर से हार का मुंह देखना पड़ा जबकि इसी चुनाव में लालू यादव ने सोनपुर सीट से जीत हासिल कर ली.

नीतीश कुमार को इस चुनाव में उसी भोला प्रसाद सिंह ने पटखनी दी थी जिसने शादी होने के बाद नीतीश कुमार और उनकी दुल्हन मंजू को अपनी कार में बिठाकर उनके घर बख्तियारपुर छोड़ने गए थे.

Advertisement

संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘अकेला आदमी, कहानी नीतीश कुमार की’ में लिखते हैं कि तीन सालों में लगातार दूसरी हार से नीतीश कुमार बुरी तरह टूट गए और कुछ ही दिनों बाद उन्होंने राजनीति छोड़ देने का ऐलान कर दिया. कह दिया कि अब बहुत हो गई राजनीति.

‘अकेला आदमी, कहानी नीतीश कुमार की’ में संकर्षण ठाकुर आगे लिखते हैं कि वह राजनीति छोड़कर सरकारी कामों का ठेकेदार बन जाना चाहते थे. किताब के मुताबिक़ नीतीश ने उस वक्त कहा कि कुछ तो करें, ऐसे जीवन कैसे चलेगा. उन्होंने उसके लिए कोशिश भी शुरू कर दी थीं.

राजनीति छोड़ ठेकेदारी करना चाहते थे नीतीश

दरअसल नीतीश कुमार की शादी को सात साल बीत चुके थे और उन्होंने अपनी पत्नी मंजू को कभी एक पैसे नहीं दिए थे. संकर्षण ठाकुर किताब में लिखते हैं कि हालात ऐसे थे कि उन्हें देखकर लगता नहीं था कि वह जल्दी कमा-धमाकर ला सकेंगे. उनके पास क़रीब बारह बीघे जमीन थी जिसकी उपज से महज घर चल सकता था, धीरे-धीरे मंजू (उनकी पत्नी) ऐसे पति से उबने लगी जिसे घर आने की फ़ुरसत नहीं मिलती थी और जब भी आते थे तो खाली हाथ ही आते थे.

दूसरी तरफ नीतीश कुमार ठेकेदार बन जाना चाहते थे और अपने समय के साथियों के चुनाव में जीत और अपनी हार से ज्यादा परेशान थे, इसी वजह से उस समय वो चिड़चिड़े हो गए थे और घर से दूरी बनाकर ज्यादा समय अपने दोस्तों के साथ ही गुजारते थे. इसी दौरान उनकी पत्नी मंजू ने बेटे निशांत को जन्म दिया लेकिन नीतीश कुमार के पास उस वक़्त इतने पैसे नहीं थे कि वो अपने बेटे का सही से लालन-पालन कर पाते.

Advertisement

चंद्रशेखर ने बदल दी नीतीश की क़िस्मत

संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘अकेला आदमी, कहानी नीतीश कुमार की’ में लिखते हैं कि इस दौरान तीन साल का समय बीत गया और नीतीश कुमार अपने भविष्य की तलाश करते रहे. साल 1983 में नीतीश कुमार ने मथुरा में उस वक़्त के कद्दावर नेता चंद्रशेखर की बहुचर्चित भारत यात्रा के अंतिम चरण में हिस्सा लिया और अपनी बातों से उन्हें बेहद प्रभावित किया.

इसके बाद चंद्रशेखर ने उन्हें सहायता और राजनीतिक संरक्षण का वचन दिया जिसके बाद एक बार फिर नीतीश कुमार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर आशान्वित हो गए. नीतीश कुमार ने इस दौरान आदर्शवाद को छोड़कर राजनीति के यथार्थ और समय की ज़रूरत को समझा और उसी तरह की राजनीति करने लगे.

पत्नी को दिया वचन

बिहार में साल 1985 का विधानसभा चुनाव आया और नीतीश कुमार उसकी तैयारी में जुट गए . हालांकि इसके पहले उन्होंने अपनी पत्नी मंजू को वचन दिया की यदि इस बार वो चुनाव हार गए तो हमेशा के लिए राजनीति त्याग देंगे और परंपरागत काम-धंधा या नौकरी ढूंढकर अपने गृहस्थ जीवन में पूरी तरह रम जाएगा. नीतीश कुमार के इस वादे पर उनकी पत्नी मंजू ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए अपने बड़ी मुश्किल से बचाए बीस हज़ार रुपये भी दे दिए.

Advertisement

ये चुनाव नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन गई थी. अब नीतीश कुमार के पास संसाधन की कमी नहीं थी जिस वजह से वो दो चुनाव हार चुके थे. उस समय के दो सबसे बड़े नेता चंद्रशेखर और देवीलाल का उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल चुका था और उन्होंने उन्हें लड़ने के लिए धन भी उपलब्ध कराया.

पहली बार चखा जीत का स्वाद

संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘अकेला आदमी, कहानी नीतीश कुमार की’ में लिखते हैं कि लोक दल से चुनाव लड़ रहे नीतीश कुमार ने इसे अस्तित्व की लड़ाई बना ली और इसमें साम, दाम, दंड, भेद वाली रणनीति अपनाई. बैलेट पर होने वाले चुनाव में बूथ लुटने से बचाने के लिए अपने हथियारबंद कार्यकर्ताओं को तैनात किया.

चौधरी देवी लाल ने लगातार चुनाव प्रचार करने के लिए हरियाणा से एक सुंदर सी आरामदायक विलिस कार नीतीश के लिए भिजवा दी जिसकी मदद से वो कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्र में घूम सके और अपने लिए प्रचार किया. आख़िरकार नीतीश को उनकी मेहनत का फल मिला और इस बार उन्होंने हरनौत सीट से 22000 वोटों के अंतर से पहली बार जीत का स्वाद चखा और विधानसभा पहुंच गए.

संकर्षण ठाकुर किताब में लिखते हैं कि इसके बाद नीतीश कुमार को कभी चुनाव में जीत के लिए तरसना नहीं पड़ा और न ही वैवाहिक जीवन की शपथ निभाने के लिए कभी अपनी पत्नी मंजू से ये कहना पड़ा कि वो राजनीति त्याग देंगे. इसी संघर्ष की वजह से नीतीश कुमार बीते 20 सालों से बिहार के राजनीति की धुरी बने हुए हैं.

Advertisement


 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement