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चीन ने कॉरपोरेट को नहीं दी खेती, जानें-फिर भी कैसे कर दी क्रांति 

साल में 1979 हुए कृषि सुधारों की बदौलत चीन का कृषि उत्पादन लगातार बढ़ता गया और चीन अगर दुनिया की प्रमुख इकोनॉमी बना है तो इसमें इन कृषि सुधारों का भी रोल है. कृषि उत्पादन बढ़ने से बड़े पैमाने पर जनसंख्या की खाद्य जरूरतों की पूर्ति में भी चीन आत्मनिर्भर हुआ. 

चीन की खेती में संरचनात्मक बदलाव भी आये हैं (फाइल फोटो: Reuters) चीन की खेती में संरचनात्मक बदलाव भी आये हैं (फाइल फोटो: Reuters)
दिनेश अग्रहरि
  • नई दिल्ली ,
  • 16 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 2:10 PM IST
  • चीन ने 1979 में ही खेती की व्यवस्था में आमूल बदलाव किया
  • लेकिन चीन सरकार ने खेती कॉरपोरेट को नहीं सौंपी
  • इन सुधारों से चीन में कृषि पैदावार में कई गुना बढ़त

भारत में आज जब कृषि सुधारों और इसमें कॉरपोरेट के संभावित दखल को लेकर बवाल छिड़ा हुआ है, यह जानना बहुत दिलचस्प है कि हमारे पड़ोसी देश चीन ने खेती को कॉरपोरेट को दिये बगैर कैसे इसमें क्रांति कर दी है. साल में 1979 हुए कृषि सुधारों की बदौलत चीन का कृषि उत्पादन लगातार बढ़ता गया और चीन अगर दुनिया की प्रमुख इकोनॉमी बना है तो इसमें इन कृषि सुधारों का भी रोल है. 

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सबसे बड़ी क्रांति HRS 

एक कम्युनिस्ट देश होने के नाते चीन के लिए यह आसान था कि कोई भी पॉलिसी बनाए और उसे पूरे देश में लागू कर दे. साल 1979 में के दशक में चीन ने ऐसा ही एक क्रांतिकारी आइडिया अपनाया. उसने खेती में एचआरएस सिस्टम लागू किया.

एचआरएस का फुल फॉर्म है हाउसहोल्ड रिस्पांसिबिलिटी सिस्टम यानी खेती हर परिवार की जिम्मेदारी. चीन सरकार ने खेती कॉरपोरेट को  नहीं दी, बल्कि इसे कॉन्ट्रैक्ट पर पूरे गांव को सौंप दिया और गांव में सबकी जिम्मेदारी हो गयी इस खेती को आगे बढ़ाने की. 

इसकी शुरुआत 1979 में हुई और इसे पूरी तरह से 1982 से आधिकारिक रूप से लागू कर दिया गया. इसमें गांव की पूरी खेती की जमीन पर गांव का ही संयुक्त मालिकाना हक होता है. तो हर गांव की खेती एक उद्यम के रूप में हो गयी और इसको घाटे-मुनाफे में लाने की जिम्मेदारी गांव के हर परिवार की हो गयी.

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बंटता है मुनाफा 

यानी गांव की खेती सामूहिक रूप से होने लगी और उत्पादन एवं प्रबंधन का जिम्मा कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक गांव के परिवारों को दे दिया गया. तो सरकार को तय एक निश्चित टैक्स के बाद बाकी पूरा मुनाफा गांव के किसानों में बांट दिया जाता है. इसके अलावा फसलों का एक हिस्सा सरकार को देना होता है जिसके लिए सरकार एक पूर्व निर्धारित कीमत देती है जो भारत के एमएसपी जैसा है.

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साल 1984 तक वहां करीब 99 फीसदी खेती की जमीन परिवारों को कॉन्ट्रैक्ट पर दे दी गयी. इसमें इस बात का ध्यान  रखा जाता है कि परिवार का आकार क्या है और उसमें कितने लोग श्रम करने में सक्षम हैं.

सरकार ने इसके लिए बनाया माहौल 

इससे किसानों की कृषि और गैर कृषि दोनों तरह की आमदनी बढ़ी. नकदी फसलों और अनाज, दोनों का उत्पादन बढ़ा. सरकार ने ग्रामीण उद्योगों का विकास किया. लेकिन सरकार ने यह क्रांति यूं ही नहीं कर दी, चीन सरकार ने इसके साथ ही पूरा माहौल तैयार किया. किसानों को अपनी फसलें या पशुधन की बिक्री के लिए ग्रामीण बाजार स्थापित किये गये. इसके अलावा शहरों में सरकारी और निजी दोनों तरह के फ्री मार्केट उपलब्ध कराये गये. 

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क्या हुआ सुधारों का असर 

चीन की आर्थिक तरक्की में वहां कृषि में हुए सुधारों की अहम भूमिका रही. इनकी वजह से चीन में औद्योगीकरण तो बढ़ा ही, कृषि उत्पादन बढ़ने से बड़े पैमाने पर जनसंख्या की खाद्य जरूरतों की पूर्ति में भी चीन आत्मनिर्भर हुआ. 

इन सुधारों के बाद चीन में अनाज चावल, गेहूं, मक्का का उत्पादन 1978 के 24.7 करोड़ टन  से बढ़कर 2008 में 47 करोड़ टन हो गया है. आमतौर पर चीन में किसान अपना उत्पादन बेचने के लिए बाहर नहीं जाते, बल्कि व्यापारी ही ट्रक लेकर गांव पहुंच जाते हैं और सीधे किसान से उनकी पैदावार खरीदते हैं. 


हालांकि बाकी देशों की तरह इस दौरान चीन की जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगातार घटता गया है और इंडस्ट्री और सर्विसेज सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ी है. सुधार के शुरुआती पांच साल में वहां के एग्रीकल्चर जीडीपी में बढ़त 7 फीसदी तक पहुंच गयी. हालांकि पिछले एक दशक में यह 3 से 4 फीसदी के बीच टिकी है.

वहां की कृषि में इससे काफी संरचनात्मक बदलाव भी आए हैं. सुधारों के समय से अब तक वहां कृषि में फसलों का हिस्सा 82 फीसदी से घटकर 51 फीसदी तक आ गया है, जबकि पशुधन का हिस्सा 14 से बढ़कर 35 फीसदी हो गया है. इसी तरह इस दौरान मत्स्यपालन का हिस्सा 2 फीसदी से बढ़कर 10 फीसदी तक तक पहुंच गया है.

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