
करीब 2 दशक बाद फिर से चारों तरफ आर्थिक मंदी (Economic Recession) की चर्चा होने लगी है. अर्थशास्त्री (Economist) हों या बिजनेसमैन (Businessman)... यहां तक कि अब तो कुछ देशों की सरकारें भी मान चुकी हैं कि आने वाले कुछ महीनों में ही मंदी के कयास सच हो सकते हैं. आर्थिक मंदी जब भी आती है, जनजीवन पर व्यापक असर छोड़ जाती है. कई बार तो मंदी के असर से उबरने में दुनिया को दसियों साल लगे हैं.
यह न सिर्फ जीडीपी (GDP) का साइज घटाती है, बल्कि रोजमर्रा के खर्चे इसके कारण बेतहाशा बढ़ जाते हैं और दूसरी ओर आमदनी (Income) गिर जाती है. कंपनियां पैसे बचाने के लिए भारी पैमाने पर लोगों को निकालने लगती हैं. आइए आज हम आपको बताते हैं कि मंदी का खतरा कितना गंभीर है और अगर यह सच होने वाला है तो इसके असर से अधिकतम बचाव के लिए आपको क्या उपाय करने चाहिए...
जानें महामंदी, मंदी और सुस्ती में क्या फर्क
सबसे पहले यह समझ लेना जरूरी है कि मंदी दरअसल है क्या और यह आम लोगों के जीवन पर किस तरह से असर डालती है. अगर किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) में लगातार छह महीने यानी 2 तिमाही तक गिरावट आती है, तो इस दौर को अर्थशास्त्र में आर्थिक मंदी कहा जाता है. वहीं अगर जीडीपी की ग्रोथ रेट (GDP Growth Rate) लगातार कम होती है तो यह इकोनॉमिक स्लोडाउन (Economic Slowdown) यानी आर्थिक सुस्ती का दौर कहलाता है. अब बारी आती है 'डिप्रेशन यानी महामंदी' की. यह दरअसल रिसेशन यानी मंदी का ही सबसे भयावह रूप है. अगर 2 तिमाही के दौरान किसी देश की जीडीपी में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आती है, तो उसे डिप्रेशन कहा जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1930 के दशक में सबसे भयानक महामंदी आई थी, जिसे The Great Depression कहा जाता है. अभी तक रिकॉर्डेड हिस्ट्री में दुनिया ने एक ही बार डिप्रेशन का सामना किया है.
इन मौकों पर भारत झेल चुका है मंदी का ताप
भारत के संदर्भ में बात करें तो आजादी के बाद हमारे देश पर अब तक 2 बार मंदी की मार पड़ी है. भारत ने पहली बार भयानक आर्थिक संकट का सामना किया 1991 में. उस समय भारत की स्थिति की सही तस्वीर समझने के लिए अभी के श्रीलंका का उदाहरण देख सकते हैं. 1991 में आए संकट के कारण आंतरिक थे. उस समय भारत के पास इतनी ही विदेशी मुद्रा बची थी कि महज 3 सप्ताह के आयात के खर्चे भरे जा सकते थे. भारत कर्जों की किस्तें चुकाने में असफल हो रहा था. देश का सोना बिक रहा था. हालांकि तब नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े कदम उठाकर देश को संकट से बाहर निकाला. दूसरी बार 2008 में भारत को इस मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उस संकट के लिए बाहरी फैक्टर जिम्मेदार थे. तब भारत में आर्थिक मंदी तो नहीं आई थी, लेकिन अमेरिका समेत अन्य देशों के संकट से भारत अछूता नहीं रह पाया था.
इन कारणों से सता रहा महामंदी का डर
मौजूदा संकट की बात करें तो भारत के ऊपर मंदी का सीधा जोखिम नहीं है. हालांकि अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं का मंदी में फंसना लगभग तय लग रहा है. सिंगापुर के प्रधानमंत्री Lee Hsien Loong ने हाल ही में कहा है कि अगले 2 साल के भीतर दुनिया मंदी का सामना करेगी. इससे पहले दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने एक इंटरव्यू में कहा था कि इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत तक अमेरिका में मंदी आने की प्रबल संभावनाएं हैं. चीन अभी कोरोना महामारी की नई लहर से जूझ रहा है और इस कारण वहां फिर से लॉकडाउन जैसी कड़ी पाबंदियों का दौर लौट आया है. दुनिया की फैक्ट्री कहे जाने वाले देश चीन की 'जीरो कोविड' पॉलिसी ने हजारों कल-कारखानों का शटर फिर से डाउन कर दिया है. यह ऐसे समय हुआ है, जब ग्लोबल सप्लाई चेन के ऊपर रूस-यूक्रेन जंग का बुरा असर पड़ रहा है. एनालिस्ट इस हालात को ग्रेट डिप्रेशन के समय की स्थितियों से जोड़कर देख रहे हैं. दुनिया ने तब भी महामारी और विश्व युद्ध का एक साथ सामना किया था.
आर्थिक मंदी की आहट से होते हैं ये असर
जब-जब आर्थिक मंदी का दौर आता है, हर कोई सर्वाइवल के प्रयासों में लग जाता है. इन्वेस्टर्स बाजार से पैसे निकालने लग जाते हैं. कंपनियों के सामने कच्ची सामग्रियां महंगी हो जाने और बिक्री कम हो जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है. ऐसे में कंपनियां अपने आप को बचाने के लिए कर्मचारियों को नौकरी से निकालने लगती हैं. लोगों के हाथों में खर्च करने लायक पैसे कम हो जाते हैं, स्वाभाविक है बाजार में डिमांड गिर जाती है. ऐसे में सबसे ज्यादा असर छोटे व्यवसायों पर पड़ता है और बड़े पैमाने पर छोटी कंपनियां मंदी की मार के सामने दम तोड़ देती हैं. अब तक हमने आर्थिक मंदी को जान लिया है और हमें ये भी पता चल गया है कि इसके क्या असर होते हैं...अब जानते हैं बचाव के उपायों के बारे में...
6 महीने के खर्च बराबर इमरजेंसी फंड
सेंटर फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी एंड पब्लिक फाइनेंस (CEPPF) के इकोनॉमिस्ट डॉ सुधांशु कुमार (Dr Sudhanshu Kumar) कहते हैं कि मंदी के खतरे से बचने के लिए सबसे पहले लोगों को अनावश्यक खर्चे कम करने चाहिए. खर्चों को कम कर एक इमरजेंसी फंड तैयार करना बेहद जरूरी है. इस बात का हिसाब निकालिए कि हर महीने आपको सर्वाइवल के लिए कम से कम कितने पैसे की जरूरत है. अब प्रयास ये होना चाहिए कि कम से कम छह महीने के खर्च लायक इमरजेंसी फंड आपके पास हो. मान लीजिए कि आपके जरूरी खर्चे मसलन किराया या ईएमआई, खाने-पीने के सामान आदि को मिलाकर हर महीने 30 हजार रुपये की जरूरत है, तो आपको कम से कम 1.80 लाख रुपये का इमरजेंसी फंड तैयार रखने की जरूरत है.
ऐसी फिजूलखर्चियों पर सख्ती से रोक
अब सवाल उठता है कि इमरजेंसी फंड कैसे बनाएं? यह सवाल जितना स्वाभाविक है, जवाब भी उतना ही सिंपल है...फिजूलखर्ची रोकें. सामान्य दिनों में लोग ठीक-ठाक पैसे ऐसी चीजों पर खर्च कर देते हैं, जिनसे बचे बिना भी जीवन अच्छे से चल सकता है. इसे कुछ उदाहरणों से समझिए. लोग अक्सर कभी रेस्टोरेंट में फैमिली डिनर करने चले जाते हैं, या सिनेमा देखने हॉल चले जाते हैं. इसी तरह लॉन्ग ड्राइव है, आइसक्रीम खाने के लिए गाड़ी से खूब दूर तक निकल जाना है. ये ऐसे खर्च हैं, जो न भी किए जाएं तो जीवन चल सकता है. ऐसा भी होता है कि लोग मार्केट जाते हैं और कोई कपड़ा पसंद आ गया तो खरीद लेते हैं, जबकि पहले से उनके पास कई ऐसे कपड़े होते हैं जिनका बहुत कम इस्तेमाल होता है. मंदी से लड़ाई की तैयारी करने के सबसे प्रमुख हथियारों में है इस तरह के खर्चे रोक देना.
क्रेडिट कार्ड, बीएनपीएल, लोन को कहें 'ना'
अभी भारत में भी क्रेडिट कार्ड का चलन बढ़ा है. अब तो 'बाय नाउ, पे लेटर (BNPL)' जैसी सुविधाएं भी आ गई हैं. इनसे सुविधा तो होती है, लेकिन मुसीबतें भी बढ़ती हैं. तत्काल पैसे नहीं होने के बाद भी लोग क्रेडिट कार्ड या बीएनपीएल से खर्च कर लेते हैं. इससे फिलहाल तो काम हो जाता है, लेकिन आने वाले महीनों के लिए प्रेशर बढ़ जाता है. मंदी से बचाव के उपाय दरअसल आने वाले महीनों को सुरक्षित बनाने के ही उपाय हैं, तो बाद में प्रेशर बढ़ाने वाले काम करने से बचना जरूरी है. कर्ज और ईएमआई के प्रेशर को कम करना भी आवश्यक है, ताकि जब मंदी आ जाए, तब आपके ऊपर देनदारियों का बोझ कम रहे और आपके हाथों में इतने पर्याप्त पैसे बचे रहें, जिनसे सारे जरूरी काम होते रहें.
हेल्थ इंश्योरेंस लेने में नहीं करें देर
बीमारी एक ऐसी आपदा है, जो कब आ जाए, किसी को नहीं पता. कहावत भी है कि बीमारियां कभी बताकर नहीं आती. बीमारी के इलाज में खर्चे भी अचानक ही सामने आते हैं. अच्छे अस्पतालों में इलाज कराना, मतलब अपना पूरा बजट बिगाड़ लेने जैसा है. अच्छे अस्पताल में इलाज नहीं कराना, खुद को जानबूझकर खतरे में डालना है. इस स्थिति से निपटने में काम आता है हेल्थ इंश्योरेंस. अगर आपके पास ठीक-ठाक कवरेज वाला हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है, तो बिना देरी किए इसे खरीद लेना समझदारी वाला काम है.
मन लगाकर करें ऑफिस के सारे काम
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, मंदी के दौर में कंपनियां खुद को बचाने के लिए छंटनियां करती हैं. यह दौर अभी ही शुरू हो चुका है. अनएकैडमी, वेदांतु, कार्स24 जैसी भारतीय स्टार्टअप कंपनियां अलग-अलग राउंड में हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं. यहां तक कि फेसबुक, अमेजन और वॉलमार्ट जैसी दिग्गज कंपनियों ने हाइरिंग रोकने, छंटनी करने जैसे उपायों की तैयारी कर ली है. फेसबुक के सीईओ David Wehner ने एक इंटरनल मेमो में बताया है कि पैरेंट कंपनी मेटा ने फिलहाल हाइरिंग रोकने का निर्णय लिया है. नेटफ्लिक्स आर्थिक दिक्कतों का हवाला देकर कई लोगों को नौकरी से बाहर कर चुकी है. अमेजन का कहना है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा लोग हो गए हैं, जिसे छंटनी का साफ इशारा माना जा रहा है. वॉलमार्ट ने भी ठीक ऐसा ही संकेत दिया है. ये निश्चित तौर पर खतरे की घंटी बज जाने जैसा है. अगर आप भी प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं तो इसे झेलने के लिए हमेशा तैयार रहें. बाकी, एक बात की गांठ बांध लेने की जरूरत है कि कोई भी कंपनी बहुत मुश्किल पड़ने पर भी अपने कर्मचारियों को निकालना पसंद नहीं करती है. जब पानी सिर से ऊपर होने लगता है, तो वैसे ही कर्मचारी निकाले जाते हैं, जिनका काम ठीक नहीं होता है. तो मंदी के दौर में छंटनी से बचने के लिए ईमानदारी से काम पर ध्यान देने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है.
शेयर मार्केट और क्रिप्टो से रहें दूर
अब बात आती है इन्वेस्टमेंट की. यह फ्यूचर प्लानिंग का सबसे अहम हथियार है. इन्वेस्टमेंट के माध्यमों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है. पहली कैटेगरी...जिसमें निवेश सुरक्षित है, लेकिन रिटर्न कम है. दूसरी कैटेगरी वोलेटाइल है, लेकिन बंपर रिटर्न दे सकती है. जब मंदी का खतरा मंडरा रहा हो तो दूसरी कैटेगरी से यथासंभव दूर रहना चाहिए. शेयर मार्केट हो या क्रिप्टो...इन्हें इन्वेस्टमेंट और रिटर्न के हिसाब से काफी वोलेटाइल माना जाता है. ये बढ़िया रिटर्न भी देते हैं और पलक झपकते कंगाल भी कर देते हैं. 1930 की महामंदी के समय की इस तस्वीर से आप गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैं, कि शेयर मार्केट मंदी के समय में कितना खतरनाक हो जाता है. महामंदी किस कदर भयावह थी, उसे इन आंकड़ों से समझिए. 24 अक्टूबर 1929 को अमेरिकी शेयर बाजार ने पहली बार मंदी का दंश झेला और एक ही दिन में 12 फीसदी से ज्यादा गिर गया. अगले पांच दिन में अमेरिकी शेयर बाजार 30 फीसदी से ज्यादा के नुकसान में था. बात यहीं तक नहीं संभली. कुछ ही महीनों में शेयर बाजार में पैसे लगाने वाले लोगों की करीब 90 फीसदी संपत्ति स्वाहा हो गई थी.
मंदी में बढ़ जाती है सोने की चमक
मंदी के दौर में या जब इसका खतरा सामने हों, तब इन्वेस्टमेंट के ऐसे साधन देखने चाहिए, जो महंगाई की दर से ज्यादा रिटर्न दे और साथ ही कम समय में कैश किया जा सके. अब इस शर्त पर देखें तो रियल एस्टेट भी बुरा इन्वेस्टमेंट है. पहली बात तो ये कि मंदी के दौर में रियल एस्टेट की वैल्यू गिरती है और दूसरी बात कि अचानक आई आपदा में यह इन्वेस्टमेंट आपके किसी काम का नहीं है. दूसरी ओर गोल्ड ऐसे बुरे समय के लिए बेहद अच्छा इन्वेस्टमेंट साबित होता है. आर्थिक संकट के समय में गोल्ड की वैल्यू बढ़ती है. इसके साथ ही गोल्ड को मिनटों में कैश कराना संभव है. अब तो फिजिकल गोल्ड के बजाय गोल्ड ईटीएफ जैसे विकल्प भी मौजूद हैं.
क्या करें:
क्या नहीं करें: