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अडानी के बाद अब OCCRP के निशाने पर Vedanta, जानिए क्या-क्या लगे हैं आरोप

अपनी एक फ्रेश रिपोर्ट में OCCRP ने दावा किया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान वेदांता प्रमुख पर्यावरण नियमों को कमजोर करने के लिए 'गुप्त' लॉबिंग अभियान के पीछे थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार ने बिना पब्लिक कंसल्टेशन के खनन से जुड़े बदलावों को मंजूरी दे दी.

वेदांता पर OCCRP ने किए कई बड़े खुलासे. वेदांता पर OCCRP ने किए कई बड़े खुलासे.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 01 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 2:27 PM IST

आर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट्स (OCCRP) की रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप के बाद अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता ग्रुप (Vedanta Group) पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं. अपनी एक फ्रेश रिपोर्ट में OCCRP ने दावा किया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान वेदांता ग्रुप प्रमुख पर्यावरण नियमों को कमजोर करने के लिए 'गुप्त' लॉबिंग के पीछे था. पब्लिश हुई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार ने बिना पब्लिक कंसल्टेशन के ही खनन से जुड़े बदलावों को मंजूरी दे दी. रिपोर्ट का दावा है कि एक्सपर्ट्स के अनुसार, बदलावों को अवैध तरीके से लागू किया गया था. 

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खनन उत्पादन को बढ़ाने के लिए पैरवी

OCCRP ने कहा कि जनवरी 2021 में वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने पूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से कहा था कि सरकार, खनन कंपनियों को नई पर्यावरणीय मंजूरी के बिना उत्पादन को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की अनुमति दे सकती है. इससे सरकार भारत की आर्थिक सुधार में 'गति' ला सकती है. जॉर्ज सोरोस समर्थित OCCRP ने दावा किया कि वेदांता के ऑयल बिजनेस केयर्न इंडिया ने भी सरकारी नीलामी में जीते गए ऑयल ब्लॉकों में खोजपूर्ण ड्रिलिंग के लिए सार्वजनिक सुनवाई को रद्द करने की सफलतापूर्वक पैरवी की थी.

विवाद वाले प्रोजेक्ट्स को मिली मंजूरी

OCCRP की रिपोर्ट में कहा गया है कि तब से राजस्थान में केयर्स के छह विवाद वाले ऑयल प्रोजेक्ट्स को स्थानीय विरोध के बावजूद मंजूरी दे दी गई है. OCCRP ने दावा किया कि उसने इंफॉर्मेशन रिक्वेस्ट की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर प्राप्त किए गए हजारों भारतीय सरकारी दस्तावेजों का विश्लेषण किया है. इन दस्तावेजों में इंटरनल ज्ञापनों और बंद दरवाजे में हुई मीटिंग के मिनट्स, यहां तक कि वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के पत्र भी रिकॉर्ड्स में शामिल हैं.

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OCCRP ने रिपोर्ट में दावा किया है कि जनवरी 2021 में अनिल अग्रवाल ने तत्कालीन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि सरकार खनन कंपनियों को नए पर्यावरण मंजूरी को सुरक्षित किए बिना उत्पादन को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की अनुमति देकर भारत की आर्थिक सुधार में 'गति' जोड़ सकती है.

OCCRP की रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादन और आर्थिक विकास को तुरंत बढ़ावा देने के अलावा, यह सरकार के लिए भारी राजस्व उत्पन्न करेगा और बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा करेगा. अग्रवाल ने सुझाव दिया था कि बदलाव 'एक साधारण नेटिफिकेशन' के जरिए किया जा सकता है.

प्रकाश जावड़ेकर ने लिखा पत्र

अनिल अग्रवाल द्वारा प्रकाश जावड़ेकर को लिखे पत्र के दो सप्ताह बाद पर्यावरण मंत्रालय को फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री लॉबी समूह के प्रमुख से एक पत्र मिला, जिसमें इसी तरह का अनुरोध किया गया था. दोनों ने बताया कि सरकार ने कुछ साल पहले कोयला खदानों के लिए ये काम किया था. इसलिए अन्य प्रकार के खनन के लिए नियमों को लागू करना एक साधारण मामला होगा. रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रकाश जावड़ेकर ने जल्दी से पत्र पर लिखकर अपने मंत्रालय के सचिव और फॉरेस्ट्री के महानिदेशक को नीतिगत मुद्दे पर चर्चा करने का निर्देश दिया.

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जून में वेदांता के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सुनील दुग्गल ने सीधे पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर तर्क दिया कि वह पर्यावरणीय मंजूरी देने के मौजूदा तरीकों को खत्म करके 'तुरंत आर्थिक इंजन को गति दे सकते हैं.' उन्होंने वादा किया कि इससे न केवल विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि नौकरियां पैदा होंगी और देश के 'पिछड़े' इलाकों में 'गरीबी कम करने' में मदद मिलेगी.

नियमों में ढील

रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएमओ ने पत्र को पर्यावरण सचिव को भेज दिया गया, जो इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए पहले से ही काम कर रहे थे. लेकिन ओसीसीआरपी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस विचार को आंतरिक विरोध का सामना करना पड़ा. रिपोर्ट के अनुसार, 2022 की शुरुआत में बंद दरवाजे की बैठकों की एक सीरीज के बाद भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने खनन कंपनियों को 'सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने की आवश्यकता के बिना' 50 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ाने की अनुमति देने के लिए नियमों में ढील दे दी.

अधिकारियों को किस बात का था डर?

जुलाई में हुई एक मीटिंग के डिटेल्स से पता चलता है कि अधिकारियों को डर था कि नियमों में ढील देने से कानून टूटेगा और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित खनन को खुली छूट मिल जाएगी. मंत्रालय के अधिकारियों और खनन विशेषज्ञों से बनी संयुक्त विशेषज्ञ वैल्यूएशन समिति की एक आंतरिक बैठक में इन बातों का जिक्र किया गया. बैठक में कहा गया कि खनन उत्पादन में किसी भी बढ़ोतरी के लिए किसी न किसी रूप में सार्वजनिक परामर्श की आवश्यकता होनी चाहिए.

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अक्टूबर में पर्यावरण मंत्रालय ने एक ज्ञापन प्रकाशित किया जिसमें सार्वजनिक सुनवाई के बिना खदानों को केवल 20 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ाने की अनुमति दी गई. तब मंत्रालाय की कमान मौजूदा पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव के हाथों में आ गई थी. लेकिन खनन की ये अनुमति अनिल अग्रवाल और उद्योग लॉबी समूह की मांग के आधे से भी कम थी.

वेदांता की लॉबिंग प्रमुख

लेकिन यह मुद्दा तब फिर से चर्चा में आ गया जब कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने सरकारी लालफीताशाही को कम करने के लिए आंतरिक प्रयास किया. राजीव गौबा सीधे पीएम मोदी को रिपोर्ट करते हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एक उद्योग लॉबी समूह के प्रमुख और भारत के खनन सचिव ने भी नियमों में ढील देने के लिए दबाव डाला था.

लेकिन आंतरिक दस्तावेजों और सरकारी सूत्रों ने बताया कि वेदांता की लॉबिंग प्रमुख थी. पर्यावरण मंत्रालय ने तब अपनी वेबसाइट पर एक ऑफिस ज्ञापन प्रकाशित करके नियमों को बदल दिया, जिसका इस्तेमाल इंटरनल ऑफिस कॉम्युनिकेशन के लिए किया जाना था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक मंच पर पीएम मोदी ने 2030 तक भारत के कार्बन उत्सर्जन को एक अरब टन तक कम करने और उसके बाद 40 वर्षों के भीतर नेट जीरो उत्सर्जन तक पहुंचने का संकल्प लिया है. ओसीसीआरपी के निष्कर्षों की समीक्षा करने वाले विशेषज्ञों ने कहा है कि नई रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में तेल और खनन कंपनियों के हितों को प्राथमिकता दी है.

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