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विनिवेश की राह पर मोदी सरकार, जल्द बेच सकती है रेल मंत्रालय की ये कंपनी!

केंद्र सरकार बहुत जल्द रेल मंत्रालय की एक कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेच सकती है. इस साल सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने में पिछड़ना नहीं चाहती, इसलिए शुरुआत से ही इस दिशा में काम कर रही है.

सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 10:48 AM IST
  • वित्त मंत्रालय दे चुका मंजूरी
  • घट सकती है लैंड लाइसेंस फीस
  • पिछले साल तैयार हुआ प्रस्ताव

चालू वित्त वर्ष में सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को हर हाल में पूरा करना चाहती है. इसलिए वित्त वर्ष की शुरुआत से ही वह इस काम में जुट गई है. ऐसे में सरकार इसी महीने रेल मंत्रालय की एक कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचने की दिशा में आगे बढ़ सकती है.

घटाएगी लाइसेंस फीस
बिजनेस टुडे टीवी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल बहुत जल्द भारतीय रेलवे की भूमि लाइसेंस फीस को कम करने के प्रस्ताव पर विचार कर सकता है. वित्त मंत्रालय ने इस शुल्क को भूमि के बाजार मूल्य के 6% से घटाकर 3% करने का प्रस्ताव तैयार किया है. सूत्रों का कहना है कि सरकार के इस कदम से कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Concor) के प्राइवेटाइजेशन में मदद मिलेगी.

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वित्त मंत्रालय दे चुका मंजूरी
पिछले साल रेल मंत्रालय अपनी लैंड लीज पॉलिसी पर एक मसौदा कैबिनेट नोट तैयार किया था. इसमें लाइसेंस फीस को घटाकर 2% तक लाने की बात कही गई थी. वित्त मंत्रालय इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे चुका है और उम्मीद की जा रही है कि इस महीने के आखिर तक केंद्रीय मंत्रिमंडल से इसे मंजूरी भी मिल जाएगी.

ऐसे मिलेगी कॉनकोर को बेचने में मदद
भारतीय रेल ने अप्रैल 2020 में अपनी लैंड लाइसेंस फीस की व्यवस्था शुरू की थी. इसके हिसाब से रेलवे की भूमि का औद्योगिक काम के लिए उपयोग किया जा सकता है. बाद में ये व्यवस्था कॉनकोर के लिए भी लागू कर दी गई. इससे पहले तक कॉनकोर रेलवे को हर कंटेनर के हिसाब से भूमि के उपयोग के लिए लीज रेंट देता था, जो काफी सस्ता था. जबकि लाइसेंस फीस एक सालाना शुल्क है जो रेलवे अपनी भूमि के उपयोग के बदले वसूलती है.

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नवंबर 2019 में कॉनकोर में सरकार की 30.8% हिस्सेदारी के साथ-साथ मैनेजमेंट कंट्रोल प्राइवेट सेक्टर को देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. लेकिन 2020 में नई लैंड लाइसेंसिग फीस नीति आने से कॉनकोर के लिए लागत बढ़ गई. इससे निवेशकों के बीच कॉनकोर की हिस्सेदारी खरीदने को लेकर रूझान कमजोर पड़ गया.

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