
दुनिया भर में एक बार फिर से आर्थिक मंदी (Recession) का खतरा मंडराने लगा है. इस खतरे से अर्थशास्त्रियों की नींदें तो खराब हो ही रही हैं, दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति एलन मस्क (Elon Musk) को भी इसकी चिंता सता रही है. मस्क समेत कई लोगों का मानना है दुनिया खासकर अमेरिका (US) जैसे विकसित देश मंदी की कगार पर खड़े हैं. कई ऐसे फैक्टर हैं, जिनसे लग रहा है कि एक बार फिर से ग्लोबल इकोनॉमी (Global Economy) का आर्थिक मंदी की चपेट में आना लगभग तय है. आइए जानते हैं कि वे कौन से फैक्टर हैं, जिनके कारण दुनिया के ऊपर आर्थिक मंदी का खतरा मंडरा रहा है...
उससे पहले हम यह जान लेते हैं कि आर्थिक मंदी यानी रिसेशन क्या बला है? अगर किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) में लगातार कुछ महीनों तक गिरावट आती है, तो इस दौर को अर्थशास्त्र में आर्थिक मंदी कहा जाता है. आम तौर पर दो तिमाही यानी छह महीने को मानक माना जाता है. वहीं जीडीपी की ग्रोथ रेट (GDP Growth Rate) का लगातार घटना इकोनॉमिक स्लोडाउन (Economic Slowdown) यानी आर्थिक सुस्ती का दौर कहलाता है. इनके अलावा अर्थशास्त्र में इसी तरह का एक टर्म है 'डिप्रेशन यानी महामंदी'. यह दरअसल रिसेशन यानी मंदी का ही सबसे खराब रूप है. अगर किसी देश की जीडीपी में 10 फीसदी से ज्यादा गिरावट आती है, तो उसे डिप्रेशन कहा जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1930 के दशक में सबसे भयानक महामंदी आई थी, जिसे The Great Depression कहा जाता है.
कोरोना महामारी (Covid-19): पूरी दुनिया 2019 से कोरोना महामारी की मार झेल रही है. इस महामारी ने दुनिया भर में हेल्थ क्राइसिस से ज्यादा इकोनॉमिक क्राइसिस पैदा किया है. अभी फिर से दुनिया की फैक्ट्री यानी चीन महामारी की नई लहर से जूझ रहा है. शंघाई जैसे इंडस्ट्रियल हब कड़े लॉकडाउन से गुजर रहे हैं. इसके कारण कई कंपनियों के प्लांट फिर से बंद हो गए हैं. पहले से ही सप्लाई चेन की दिक्कतों का सामना कर रही दुनिया के लिए इस नई लहर ने सप्लाई साइड की समस्या को और विकराल बना दिया है.
रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War): रूस और यूक्रेन फरवरी के अंतिम सप्ताह से युद्ध में उलझे हुए हैं. लंबी तनातनी और सैन्य तनाव के बाद रूस ने फरवरी के अंतिम दिनों में यूक्रेन के ऊपर हमला कर दिया. पहले माना जा रहा था कि यह युद्ध लंबा नहीं चलेगा और रूस को कुछ ही सप्ताह में जीत मिल जाएगी. हालांकि सारे अनुमान गलत निकले और महीनों बीत जाने के बाद भी युद्ध जारी है. इस युद्ध के कारण दुनिया भर में कई जरूरी कमोडिटीज की कमी का संकट उत्पन्न हो गया है. रूस और यूक्रेन दोनों ही गेहूं और जौ जैसे कई अनाजों के बड़े निर्यातकों में से है. युद्ध के चलते इनका निर्यात प्रभावित हुआ है. अभी हालात ऐसे हैं कि कई देशों के सामने फूड क्राइसिस की स्थिति है. पड़ोसी देश श्रीलंका इसी तरह के संकटों से जूझ रहा है.
दशकों की सबसे ज्यादा महंगाई (Record High Inflation): बहुत सालों से महंगाई खबरों की सुर्खियां नहीं बन पाई थीं, लेकिन अब फिर से पुराना दौर लौट आया है. भारत की ही बात करें तो बीते महीने थोक महंगाई और खुदरा महंगाई दोनों ही कई साल के हाई लेवल पर पहुंच चुकी हैं. अप्रैल में सालों बाद थोक महंगाई 15 फीसदी के पार निकली और नवंबर 1998 के बाद सबसे ज्यादा हो गई. खुदरा महंगाई पहले ही मई 2014 के बाद के सबसे उच्च स्तर पर है. अप्रैल में अमेरिका में खुदरा महंगाई कुछ कम होकर 8.3 फीसदी पर आई, लेकिन यह अभी भी कई दशकों के उच्च स्तर पर है. इससे पहले मार्च में अमेरिका में महंगाई की दर 8.5 फीसदी रही थी, जो बीते 41 साल में सबसे ज्यादा था.
महंगा होता कर्ज (Rising Capital Cost): महंगाई को कंट्रोल करने के लिए दुनिया भर के सेंट्रल बैंक लगातार ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं. भारत की बात करें तो रिजर्व बैंक ने इसी महीने एमपीसी की आपात बैठक की और रेपो रेट को 0.40 फीसदी बढ़ा दिया. भारत में ब्याज दरें दो साल से स्थिर थीं और 4 साल में पहली बार इसे बढ़ाया गया है. जानकारों का मानना है कि इस फाइनेंशियल ईयर में अभी रेपो रेट को 01 फीसदी और बढ़ाया जा सकता है. अमेरिका में फेडरल रिजर्व भी आक्रामक तरीके से ब्याज दरें बढ़ा रहा है. फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने मंगलवार को कहा था कि जब तक महंगाई काबू में नहीं आ जाती है, ब्याज दरें बढ़ती रहेंगी.
क्रूड ऑयल में उबाल (Costly Crude Oil): पिछले कुछ महीने से कच्चे देल के दाम में आग लगी हुई है. यह लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है. बुधवार को भी इसमें रैली देखने को मिली. ब्रेंट क्रूड 01 फीसदी उछलकर 113.08 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इसी तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 1.4 फीसदी चढ़कर 114.02 डॉलर प्रति बैरल पर चला गया. दरअसल क्रूड ऑयल के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक रूस के ऊपर अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों ने कई प्रतिबंध लगा दिए हैं. इनमें रूसी तेल व गैस पर प्रतिबंध भी शामिल है. अप्रैल में रूस का कच्चा तेल का प्रोडक्शन करीब 9 फीसदी कम हुआ. दूसरी ओर ओपेक देश भी तय मानक से कम उत्पादन कर रहे हैं. महंगे क्रूड ऑयल से भारत व चीन जैसे उन विकासशील देशों को नुकसान हो रहा है, जो कच्चा तेल के आयात पर निर्भर हैं.