
आज भले ही देश में घरों की रंगाई-पुताई की बात आती है, तो जुबां पर एशियन पेंट्स (Asian Paint) का नाम सबसे पहले आता है. देश की सबसे बड़ी पेंट कंपनी का अब तक सफर बेहद दिलचस्प रहा है. आजादी से पहले का इतिहास है और इसके बुलंदियों पर पहुंचने की कहानी भी मिसाल है. इसकी शुरुआत के पीछे एक नहीं बल्कि चार लोगों का दिमाग था और उन्होंने मिलकर इसे बेहद छोटे स्तर पर शुरू किया था. आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी...
आजादी से पहले 1942 में शुरू हुई थी कंपनी
जब देश में अंग्रेजों का शासन था और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चल रहा था. इस बीच अंग्रेजों ने आयात पर बैन लगा रखा था, जिससे भारत में पेंट की दिक्कतें हो रही थीं. उस समय भारत में पेंट विदेशों से आता था और लोगों के पास कुछ ही विकल्प थे. इसी समय चार लोग एक गैराज में बैठकर बिजनेस प्लानिंग में लगे हुए थे. जो चार लोग बिजनेस प्लानिंग कर रहे थे, वो दरअसल देश में पेंट व्यवसाय को नया आयाम देने की तैयारी में थे. ये चार लोग थे चंपकलाल चोकसी, चिमनलाल चोकसी, सूर्यकांत दानी और अरविंद वकील. उन्होंने अपने बिजनेस प्लान को अंजाम देते हुए साल 1942 में मुंबई में एशियन पेंट्स एंड ऑयल प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की थी.
घर-घर पाउच में बेचा जाता था पेंट
जब एशियन पेंट्स की शुरुआत की गई थी, तब ये चार लोगों की टोली अपने यहां बनाए गए पेंट्स को प्लास्टिक पाउच में पैक करके लोगों में उसका प्रमोशन करती थी और घर-घर जाकर इन्हें बेचती थी. जमीनी स्तर पर की गई ये मेहनत धीरे-धीरे रंग लाती गई और कंपनी का कारोबार आगे बढ़ता गया. जब एशियन पेंट्स शुरू की गई थी, तब कंपनी कुछ रंगों के पेंट का ही प्रोडक्शन करती थी. इनमें सफेद, काला, लाल, पीला और हरा रंग शामिल था. लोगों को देशी रंग इतना पसंद आया कि शुरुआत के कुछ सालों बाद मार्केट में एशियन पेंट्स का दबदबा कायम हो गया.
पुरानी रिपोर्ट्स की मानें 80 साल पहले अपनी शुरुआत के तीन साल बाद 1945 में एशियन पेंट्स ने करीब तीन लाख रुपये का कारोबार किया था, लेकिन इसके पांच साल बाद बिजनेस ने रॉकेट सी रफ्तार पकड़ी और इसका रेवेन्यू और प्रॉफिट भी आसमान छूने लगा. 1952 में कंपनी का कुल कारोबार 20 करोड़ रुपये से ज्यादा का हुआ था, जो अपने आप में उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी. अब तक ये लोगों की फेवरेट कंपनी बन चुकी थी. आजादी के बाद एशियन पेंट्स ने प्रमोशन पर ज्यादा जोर दिया और विज्ञापनों का सहारा लिया.
मैस्कॉट गट्टू ने दिलाई अलग पहचान
कंपनी ने अपने पेंट प्रोडक्ट के लिए मशहूर कार्टुनिस्ट आर.के लक्ष्मण से काटून बनवाया था और इसका नाम रखने के लिए एक कॉम्पिटीशन करवाया था. हजारों लोगों ने इसमें हिस्सा लिया और आखिरकार एशियन पेंट्स के पहले कार्टून के लिए मैस्कॉट गट्टू के नाम पर मुहर लगाई गई. इस कार्टून और नाम को कंपनी ने अपने सबसे पॉपुलर ब्रांड टैक्टर डिस्टेंपर के साथ इस्तेमाल किया. ये एक्सपेरिमेंट काफी फायदेमंद साबित हुआ और एशियन पेंट्स का Tractor Brand टॉप पर पहुंच गया.
मुंबई में खु्ला था पहला पेंट प्लांट
कारोबार को मिली रफ्तार के चलते एशियन पेंट्स ने महाराष्ट्र के भांडुप में अपना पेंट प्लांट लगाया और प्रोडक्ट्स की रेंज में इजाफा किया. इसके बाद कंपनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 60 के दशक में एशियन पेंट्स ने फिजी में अपना पहला विदेशी प्लांट स्थापित कर दिया था. अब कंपनी गिने-चुने नहीं, बल्कि हजारों कलर, थीम, टेक्सचर और शेड के पेंट्स बनाने लगी थी और लोगों के पास बेशुमार ऑप्शन हो गए थे. कम दाम से लेकर महंगे पेंट प्रोडक्ट इस कंपनी के पोर्टफोलियो में शामिल थे.
आज 3 लाख करोड़ रुपये की है कंपनी
ब्रिटिश शासन में अर्श से शुरू हुई एशियन पेंट्स अब देश की सबसे बड़ी और एशिया की तीसरी बड़ी पेंट कंपनी बन चुकी है. कंपनी के मार्केट कैपिटलाइजेशन की बात करें तो ये 3 लाख करोड़ रुपये हो गया है और इसका शेयर खबर लिखे जाने तक 3,128.50 रुपये के स्तर पर कारोबार कर रहा था. भारत में पेंट्स के 50 पीसदी से ज्यादा कारोबार पर एशियन पेंट्स का राज है और 16 देशों में इसके प्लांट मौजूद हैं.
अब इसके विज्ञापनों में एक से बढ़कर एक दिग्गज हस्तियां नजर आती हैं. दीपिका पादुकोण से लेकर रणवीर सिंह तक एशियन पेंट्स के एड में अदाएं दिखाते नजर आते हैं. कंपनी की सफलता के पीछे के फलसफे की बात करें तो समय के साथ खुद में बदलाव करते हुए आगे बढ़ने की स्ट्रेटजी ने कंपनी को बुलंदियों पर पहुंचाया और मार्केट का बादशाह बनाया.