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तीन बर्बाद, चौथे का Tata ने लगाया बेड़ा पार... भारतीय एयरलाइंस इंडस्ट्री के संकट की कहानी

वाडिया ग्रुप की एयरलाइन कंपनी Go First ने 2005 में एविएशन सेक्टर में एंट्री की थी. शुरुआत में महज दो विमान पट्टे पर लिए गए थे, जो अब बढ़कर 61 विमान हो गए हैं. इनमें 56 A320 नियो और 5 विमान A320 CEO शामिल हैं. शुरुआत में वाडिया ग्रुप ने Go Air लॉन्च करके विमानन उद्योग में प्रवेश किया था, जिसे बाद में Go First के रूप में रि-ब्रांडेड किया गया था.

गो-फर्स्ट से पहले किंगफिशर और जेट एयरवेज हो चुकी हैं दिवालिया गो-फर्स्ट से पहले किंगफिशर और जेट एयरवेज हो चुकी हैं दिवालिया
दीपक चतुर्वेदी
  • नई दिल्ली,
  • 03 मई 2023,
  • अपडेटेड 2:43 PM IST

भारतीय एयरलाइंस सेक्टर में एक और बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है. देश में तीसरी एयरलाइन कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुकी है. Budget Airlines Go-First ने खुद एनसीएलटी (NCLT) में वॉलंटरी इनसॉल्वेंसी प्रॉसीडिंग (Voluntary Insolvancy Proceedings) के लिए अप्लीकेशन दी है. इससे पहले जेट एयरवेज (Jet Airways) साल 2019 में दिवालिया हो गई थी, जबकि इससे पहले भगोड़े कारोबारी विजय माल्या के नेतृत्व वाली किंगफिशर एयरलाइंस (Kingfisher Airlines) डिफॉल्ट हो चुकी है.

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एक ओर जहां ये तीन कंपनियां बर्बाद हुईं, तो वहीं दूसरी ओर एविशेसन सेक्टर में इंडिगो (IndiGo) लगातार अपना दायरा बढ़ाती जा रही है, जबकि 69 साल बाद फिर से टाटा ग्रुप की झोली में आई एयर इंडिया (Air India) भी आगे की ओर बढ़ रह है. आइए जानते हैं इनकी कहानी...

कोई कंपनी कैसे होती है दिवालिया? 
सबसे पहले बात कर लेते हैं कि आखिर किसी कंपनी का दिवालिया (Default) होना आखिर होता क्या है? तो बता दें दिवालियापन एक वित्तीय स्थिति होती है. जबकि कोई शख्स या कंपनी अपने उधार और देनदारियों को चुकाने या वापस भुगतान करने में सक्षम नहीं होती है. ऐसे समय में वह खुद को दिवालिया घोषित कर सकती है. इसके बाद दिवालिया संपत्ति या कंपनी के लिए अदालत की तरफ से नियुक्त अधिकारी उसकी बिक्री करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. इस बिक्री से मिली रकम को ऋणदाताओं के बीच बांट दिया जाता है. यहां सबसे बड़ा पेंच ये होता है कि एक बार अगर कोई कंपनी या व्यक्ति दिवालिया घोषित हो जाता है, तो उसे कर्ज देने वाली संस्था या व्यक्ति उसे बकाया चुकाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता.

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ये तीन एयरलाइंस हो चुकी हैं डिफॉल्ट

Kingfisher Airline
विजय माल्या द्वारा स्थापित की गई किंगफिशर एयरलाइंस दिवालिया होने वाली बड़ी विमानन कंपनियों की लिस्ट में पहले नंबर पर आती है. इसे साल 2003 में लॉन्च किया गया था और एयरलाइन ने 2005 में सिंगल क्लास इकोनॉमी के रूप में परिचालन शुरू किया था. इसकी शुरुआत के बाद कुछ साल बाद तक ये जबरदस्त तरीके से मुनाफा कमा रही थी. यही कारण है कि साल 2011 में भारत के डोमेस्टिक मार्केट की किंगफिशर की दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी थी. इस बीच किंगफिशर ने साल 2007 में  कर्ज में डूबी एयर डेक्कन को खरीदने का फैसला किया और 2008 में इस डील को पूरा किया. 

भले ही साल 2011 कर भारतीय एविएशन सेक्टर में किंगफिशर की हिस्सेदारी दूसरी सबसे ज्यादा रही हो, लेकिन इसे घाटा होने की शुरुआत 2008 में ही हो गई थी. इसके लिए जहां कंपनी के कर्ज में इजाफा होना जिम्मेदार था, तो वहीं तेल की कीमतों में तेज बढ़ोत्तरी भी बड़ा कारण था. रिपोर्ट्स की मानें तो हर बीतते साल एक समय हालात ये बन गए थे कि किंगफिशर ने अपनी कुल संपत्ति से आधा कर्ज ले लिया था, जबकि प्रॉफिट दर्ज नहीं हो रहा था. भारी-भरकम कर्ज और खर्चों की पूर्ति न कर पाने के कारण साल 2012 में एयरलाइन का लाइसेंस कैंसिल हो गया और सभी परिचालन बंद कर दिए गए. कर्जदारों के बढ़ते दबाव के बीच साल 2014 के अंत में बैंगलोर स्थित United Breweries Holdings Limited (UBHL), जो किंगफिशर एयरलाइंस की गारंटर थी, ने इसे एक विलफुल डिफॉल्टर घोषित कर दिया.

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Jet Airways
नरेश गोयल ने साल 1992 में एयर टैक्सी के रूप में जेट एयरवेज (Jet Airways) की शुरुआत की थी. 1993 तक एयलाइन कंपनी में दो विमानों, बोइंग 737 और बोइंग 300 के साथ जेट एयरवेज ने आसमान की ऊंचाइयां छूना शुरू कर दिया. 2002 में जेट ने घरेलू एयरलाइंस मार्केट में इंडियन एयरलाइंस को भी पीछे छोड़ दिया था. जेट एयरवेज के कदम लगातार बढ़ते गए और साल 2006 में एयर सहारा (Air Sahara) को करीब 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा में इसके बाद जेट एयरवेज के बेड़े में 27 नए विमान जुड़ गए. कंपनी ने कारोबार का विस्तार करते हुए इंटरनेशनल फ्लाइट्स शुरू कर दीं. ये डील कंपनी के लिए एक बड़ी गलती साबित हुए और तब से इसकी फाइनेंशियल परेशानियां लगातार बढ़ती गईं. एविएशन मार्केट में इंडिगो की एंट्री से भी इसे झटका लगा, 2012 के मध्य तक जेट एयरवेज डोमेस्टिक मार्केट शेयर के मामले में इंडिगो से पिछड़ गई थी. 

लगातार घाटा झेलते- झेलते जेट एयरवेज की हालत ये हो गई थी, कि साल 2019 की शुरुआत में एयरलाइंस ने बैंकों से लिए गए लोन की EMI भी नहीं भरी. फंड की दिक्कत के चलते इसका परिचालन भी धीमे-धीमे बंद होता गया. दिसंबर 2018 तक कंपनी के बेड़े में 124 विमान थे, लेकिन इनमें से 4-5 ही आसमान में नजर आ रहे थे, जबकि ज्यादातर ग्राउंडेड थे. भारी घाटे और कर्ज के कारण जेट एयरवेज अप्रैल 2019 में कॉलैप्स हो गई थी. उस समय कंपनी के प्रमोटर नरेश गोयल इतनी रकम भी नहीं जुटा पाए थे कि कर्मचारियों को सैलरी मिल सके. जेट एयरवेज बंद होने के बाद इसके करीब 17 हजार कर्मचारी सड़क पर आ गए थे. इसके बाद जेट एयरवेज को कर्ज देने वाले बैंकों के कंसोर्टियम ने नरेश गोयल को कंपनी के बोर्ड से हटा दिया था. जेट एयरवेज लीज पर मिले विमानों के लिए पेमेंट नहीं कर पाई थी, जिसके चलते उन कंपनियों ने एयरक्राफ्ट वापस ले लिए थे, जिन्होंने लीज पर दिए थे.

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Go First
जेट एयरवेज की विफलता के बाद अब बजट एयरलाइंस गो-फर्स्ट में भी नकदी संकट के चलते हाहाकार मचा हुआ है और कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित करते हुए एनसीएलटी में आवेदन दे दिया है. वाडिया ग्रुप की एयरलाइन कंपनी Go First ने 2005 में एविएशन सेक्टर में एंट्री की थी. शुरुआत में महज दो विमान पट्टे पर लिए गए थे, जो अब बढ़कर 61 विमान हो गए हैं. इनमें 56 A320 नियो और 5 विमान A320 CEO शामिल हैं. शुरुआत में वाडिया ग्रुप ने Go Air लॉन्च करके विमानन उद्योग में प्रवेश किया था, जिसे बाद में Go First के रूप में रि-ब्रांडेड किया गया था. पिछले तीन सालों में प्रमोटरों ने एयरलाइन में भारी भरकम निवेश किया है. ये आंकड़ा 3,200 करोड़ रुपये का है. इसमें बीते दो सालों में बी 2,400 करोड़ रुपये का इन्वेस्ट किया गया है. 

फिलहाल, गोफर्स्ट Cash & Carry मोड पर चल रही है. यानी इसे जितनी फ्लाइट संचालित करनी हैं, कंपनी को उनके लिए डेली पेमेंट करना होगा. कंपनी ने दिवालिया होने के लिए जो आवेदन किया है, उनके मुताबिक कंपनी पर 6,527 करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है. एयरलाइंस को इजन मुहैया कराने वाली कंपनी प्रैटी एंड एंड व्हिटनी (Pratt & Whitney)ने सप्लाई बंद कर दी है और कंपनी ऑपरेशनल क्रेडिटर्स की पेमेंट में भी चूक गई है. तेल कंपनियों के बकाया का भुगतान न कर पाने के चलते सभी उड़ानों को रद्द करना पड़ा है. 

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गो फर्स्ट, किंगफिशर और जेट एयरवेज के अलावा कई अन्य छोटी बड़ी एयरलाइंस कंपनियां भी ग्राउंडेड होकर बंद हो चुकी हैं या फिर किसी बड़े ग्रुप में इसे शामिल कर लिया गया है. इस लिस्ट में कई नाम शामिल हैं. 

  • Air Costa
  • ModiLuft
  • Vayudoot Airlines 
  • Sahara Airlines
  • Damania Airways 
  • Paramount Airways
  • MDLR Airlines 
  • Air Pegasus
  • East-West Airlines 
  • Archana Airways 
  • Air Deccan  
  • Air Mantra
  • Indus Air

इंडिगो का धमाल जारी, एयर इंडिया को टाटा का सहारा
दूसरी ओर भारतीय एविएशन सेक्टर में IndiGo का धमाल जारी है. इंडिगो एयरलाइंस लगातार मुनाफे में चल रही है और इसके शेयर भी रॉकेट की रफ्तार से भाग रहे हैं. IndiGo Stocks बुधवार को भी खबर लिखे जाने तक 5.20 फीसदी की तेजी के साथ 2174.15 रुपये के लेवल पर कारोबार कर रहे हैं. इस एयरलाइन कंपनी के शेयर ने बीते पांच साल में अपने निवेशकों को जोरदार 84 फीसदी का रिटर्न दिया है. साल 2006 में शुरू हुई इंडिगो के बेड़े में 300 से ज्यादा विमान शामिल हैं, वर्तमान में 76 घरेलू और 26 अंतरराष्ट्रीय डेस्टीनेशंस के लिए संचालित होते हैं. 


आज की तारीख में इंडिगो एयरलाइंस घरेलू सेवा में सबसे बड़ा प्लेयर है. 50 फीसदी से ज्यादा घरेलू मार्केट में इंडिगो का कब्जा है. वित्त वर्ष 2022-23 के मुताबिक घरेलू एविएशन मार्केट में इंडिगो की हिस्सेदारी करीब 55.4% फीसदी रही थी. इसके बाद करीब 10 फीसदी बाजार पर स्पाइसजेट का कब्जा है.

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इसके अलावा घाटे में चल रही एयर इंडिया को Tata ने सहारा देते हुए उसे फिर से आसामान में सरताज बनाने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं. टाटा की एयरलाइन की पहली कॉमर्शियल उड़ान 15 अक्टूबर 1932 को भरी गई थी. इसके बाद साल 1933 में टाटा एयरलाइंस ने यात्रियों को लेकर पहली उड़ान ऑपरेट की. 29 जुलाई 1946 को टाटा एयरलाइंस एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी बन गई और इसका नाम बदलकर उसका नाम एयर इंडिया लिमिटेड कर दिया गया और इसमें 49 फीसदी भागीदारी सरकार ने ले ली.

1954 में जब इसका राष्ट्रीयकरण हुआ, उसके बाद सरकार ने दो कंपनियां बनाईं. इंडियन एअरलाइंस घरेलू सेवा के लिए और एअर इंडिया विदेशी रूट के लिए तय की गई. साल 2000 तक यह कंपनी मुनाफे में रही, लेकिन 2001 में इसे पहली बार 57 करोड़ रुपए का घाटा हुआ. इसके बाद घाटा लगातार बढ़ता गया. सरकार ने जब एयर इंडिया को बेचने का मन बनाया तो टाटा ग्रुप ने इसे वापस पाने के लिए बोली लगाई और बीते साल 2022 में कंपनी की Tata Group में घर वापसी हो गई. 


 

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