कोरोना वायरस से निगेटिव घोषित हो जाने के बाद भी बहुत लोगों के शरीर में इस वायरस का बुरा असर मौजूद रहता है. इसे Long Covid भी कहते हैं और इसके लक्षण कई तरह के होते हैं. ऐसे ही एक लक्षण को Brain Fog कहा जा रहा है जिसके कारण कोरोना से बीमार होने वाले लोगों को साफ तौर से सोचने में दिक्कत होती है.
theguardian.com में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर के डॉक्टर कोरोना वायरस से शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि अब भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली निकोलसन कोरोना से बीमार हो गई थीं और उन्हें हॉस्पिटल में भी भर्ती होना पड़ा. शुरुआत में 11 दिन तक उन्हें माइग्रेन से जूझना पड़ा था. लेकिन अब घटना के 7 महीने बाद भी 36 साल की युवती को कई समस्याएं हो रही हैं और सोचने में भी मुश्किलें आ रही हैं.
निकोलसन ने कहा कि यह काफी परेशान करने वाला है. उन्हें कोई भी काम करने में दिक्कत होती है क्योंकि वह साफतौर से सोच ही नहीं पातीं. वह एक दिन में एक से 2 घंटे भी काम नहीं कर पातीं. घर से बाहर जाकर शॉपिंग करना भी आसान नहीं होता.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के डॉक्टर माइकल जैन्दी कहते हैं कि उन्होंने कोरोना के कई ऐसे मरीजों को देखा है जो महीनों बाद भी ब्रेन फॉग से जूझ रहे थे. उन्होंने कहा कि इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो कोरोना से अधिक बीमार नहीं हुए थे और वे घर पर रहकर ही ठीक हो गए थे.
न्यूरोलॉजी के डॉक्टर माइकल जैन्दी कहते हैं कि कोरोना की वजह से दिमागी तकलीफों का सामना करने वाले लोगों का कुल आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है, लेकिन कुछ स्टडी के मुताबिक, यह 20 फीसदी तक हो सकता है. डॉक्टरों का यह भी कहना है कि ब्रेन फॉग मेडिकल टर्म नहीं है और डॉक्टर अभी इसके लक्षणों को परिभाषित भी नहीं कर पाए हैं क्योंकि अभी और स्टडी की जरूरत है.