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कोरोना

भारत के 10 में से 3 कोविड मरीज नहीं कर पा रहे प्लाज्मा डोनेट, ये है वजह

aajtak.in
  • 14 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 7:17 AM IST
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भारत में डॉक्टरों के सामने एक नई दिक्कत आ रही है. देश में हर 10 में से तीन कोविड मरीज प्लाज्मा डोनेशन करने के लायक ही नहीं हैं. क्योंकि उनके शरीर में पर्याप्त मात्रा में न्यूट्रीलाइजिंग एंटीबॉडीज़ ही नहीं बन रहे हैं. जब तक शरीर में पर्याप्त एंटीबॉडीज नहीं बनेंगे तब तब उनके शरीर से प्लाज्मा नहीं लिया जा सकता. (फोटोः गेटी)

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यह खुलासा किया है भारत के पहले कोवैलेसेंट प्लाज्मा बैंक ने. इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) में स्थित देश के पहले कोवैलेसेंट प्लाज्मा बैंक के डॉक्टरों ने बताया कि हम किसी को प्लाज्मा डोनेशन से मना नहीं कर रहे हैं. लेकिन मरीजों को दो हफ्ते आराम करने के बाद प्लाज्मा डोनेशन करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. (फोटोः गेटी)

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अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक ILBS के डॉ. एसके सरीन ने बताया कि अगर मरीजों में न्यूट्रीलाइजिंग एंटबॉडीज़ तय मात्रा में नहीं बनेंगी तो हम उन्हें दो हफ्ते के बाद दोबारा बुलाएंगे. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मरीज के शरीर में पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज़ बन जाएं. (फोटोः एएफपी)

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अमेरिका के एफडीए के मुताबिक आमतौर पर शरीर में न्यूट्रीलाइजिंग एंटीबॉडीज़ कम से कम 1:160 होना चाहिए ताकि प्लाज्मा डोनेशन किया जा सके. एक्सपर्ट कहते हैं कि 1:80 के स्तर पर भी प्लाज्मा डोनेशन कर सकते हैं अगर कोई विकल्प न हो तो. लेकिन ऐसा करना नुकसानदेह होता है. 10 में से 3 मरीजों के शरीर में 1:160 से कम एंटीबॉडीज़ हैं. (फोटोः एएफपी)

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कुछ कोविड मरीज तो इस स्थिति में है उनके शरीर में 1:40 न्यूट्रीलाइजिंग एंटीबॉडीज़ हैं. यह स्तर इतना कम है कि उनसे प्लाज्मा डोनेशन की बात ही नहीं की जा सकती है. इन्हें दोबारा कोरोना संक्रमण का खतरा बना रहेगा. (फोटोः रॉयटर्स)

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डॉक्टरों का मानना है कि हो सकता है एंटीबॉडी का शरीर में इतना कम होना दोबारा कोरोना संक्रमित न बना दे. लेकिन ये एक चुनौती है. अभी तक पूरी दुनिया में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडीज़ की कितनी मात्रा होनी चाहिए. (फोटोः रॉयटर्स)

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जब से ILBS में प्लाज्मा बैंक खोला गया है तब से उसमें 250 से ज्यादा यूनिट्स जमा किए गए हैं. फिलहाल के लिए इतने यूनिट्स से काम चल जाएगा. कई मरीजों की कोवैलेसेंट प्लाज्मा थेरेपी की जा सकेगी.  (फोटोः रॉयटर्स)

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असल में कोवैलेसेंट प्लाज्मा ट्रीटमेंट चिकित्सा विज्ञान की बेहद बेसिक टेक्नीक है. करीब 100 सालों से इसका उपयोग पूरी दुनिया कर रही है. इससे वाकई में लाभ होता है और कोरोना वायरस के मरीजों में लाभ दिखाई दे रहा है. (फोटोः एएफपी)

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यह तकनीक भरोसेमंद भी है. वैज्ञानिक पुराने मरीजों के खून से नए मरीजों का इलाज करते हैं. होता यूं है कि पुराने बीमार मरीज का खून लेकर उसमें से प्लाज्मा निकाल लेते हैं. फिर इसी प्लाज्मा को दूसरे मरीज के शरीर में डाल दिया जाता है. (फोटोः एएफपी)

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इंसान के खून में आमतौर पर 55 फीसदी प्लाज्मा, 45 फीसदी लाल रक्त कोशिकाएं और 1 फीसदी सफेद रक्त कोशिकाएं होती हैं. प्लाज्मा थेरेपी से फायदा ये है कि बिना किसी वैक्सीन के ही मरीज किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता विकसित कर लेता है. (फोटोः एएफपी)

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इससे वैक्सीन बनाने का समय भी मिलता है. तत्काल वैक्सीन का खर्च भी नहीं आता. प्लाज्मा शरीर के अंदर एंटीबॉडीज बनाता है. साथ ही उसे अपने अंदर स्टोर भी करता है. जब यह दूसरे व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है तब वहां जाकर एंटीबॉडी बना देता है. ऐसे करके कई शख्स किसी भी वायरस के हमले से लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं. (फोटोः एएफपी)

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