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कोरोना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार कराना पति का मिशन, साथ देने को पत्नी ने छोड़ी नौकरी

मधुस्मिता कोलकाता के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में नर्स का जॉब कर रही थीं. 9 साल की नौकरी छोड़कर मधुस्मिता पिछले साल भुवनेश्वर आ गईं. उनके पति प्रदीप कुमार प्रुस्टी पहले से ही लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कराते रहे थे.

पति-पत्नी मिलकर शवों का अंतिम संस्कार करते हैं (फोटो- आजतक) पति-पत्नी मिलकर शवों का अंतिम संस्कार करते हैं (फोटो- आजतक)
मोहम्मद सूफ़ियान
  • भुवनेश्वर,
  • 24 मई 2021,
  • अपडेटेड 6:49 PM IST
  • भुवनेश्वर के प्रदीप और मधुस्मिता पेश कर रहे हैं मानवता की मिसाल
  • पत्नी ने छोड़ी 9 साल पुरानी नौकरी

कोरोना की इस भयावहता के बीच ऐसी खबरों की कमी नहीं कि कोविड-19 पॉजिटिव मरीज की मौत के बाद अपने सगे-संबंधियों ने ही अंतिम संस्कार करने से मुंह मोड़ लिया, जिस बेटे को जन्म दिया उसी ने संक्रमण के डर से मरी मां को मुखाग्नि देने से इनकार कर दिया.

लेकिन इन सब के बीच मानवता की मिसाल पेश करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी छोड़कर एक महिला इन दिनों अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक मिशन को अंजाम दे रही है. ये मिशन है कोरोना से संक्रमित लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कराना. 

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मधुस्मिता कोलकाता के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में नर्स का जॉब कर रही थीं. 9 साल की नौकरी छोड़कर मधुस्मिता पिछले साल भुवनेश्वर आ गईं. उनके पति प्रदीप कुमार प्रुस्टी पहले से ही लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कराते रहे थे. इनमें रेलवे ट्रैक, हाइवे पर मिली लाशें या खुदकुशी वाली ऐसी लाशें शामिल रहती थीं जिनके अंतिम संस्कार के लिए कोई रिश्तेदार सामने नहीं आता था.  

प्रदीप जब बच्चे थे तो उनकी मां की भी रेलवे ट्रैक पर मौत हुई थी. प्रदीप की मां का शव पड़ा रहा था और कोई अंतिम संस्कार के लिए आगे नहीं आया था.  

प्रदीप जैसे बड़े हुए उन्होंने तय कर लिया कि वे अब किसी और शव के साथ ऐसा नहीं होने देंगे जैसा कि उनकी मां के साथ हुआ. उन्होंने ठान लिया कि उनकी जानकारी में कोई भी लावारिस शव भी आएगा तो उसका पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे.  

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प्रदीप एक बार रेलवे ट्रैक पर खुदकुशी वाली एक लाश को उठवा रहे थे तभी उनका पैर फिसल गया. इससे उनकी टांग फ्रैक्चर हो गई. इस हादसे के बाद दो महीने तक लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार का उनका मिशन रुका रहा. ये बात प्रदीप को कचोटने लगी. 

उस वक्त उनका कोई मित्र या करीबी शख्स लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभालने नहीं आया. ऐसी हालत में पति को परेशान देखकर मधुस्मिता ने बड़ा फैसला किया और कोलकाता से अपना जॉब छोड़कर हमेशा के लिए भुवनेश्वर आ गईं और पति के मिशन को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठा लिया. 

टांग में फ्रैक्चर होने के बाद प्रदीप अब पहले जैसी तेजी से मूवमेंट नहीं कर पाते लेकिन उनका अपने मिशन को लेकर हौसला अब भी पहले जैसा है.  

मधुस्मिता ने आजतक को बताया, मै कोलकाता के फोर्टिस अस्पताल में पेडियाट्रिक डिपार्टमेंट में सीनियर नर्स की पोस्ट पर थी. 2011 से वहां मेरी जॉब थी. पति की टांग में चोट आने के बाद मैंने ओडिशा लौटने का फैसला किया जिससे गरीबों-वंचितों की सेवा के लिए अंतिम संस्कार का मिशन बिना किसी रुकावट चलता रहे.  

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अभी तक पति-पत्नी पिछले एक साल में 300 से ज्यादा कोविड शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. वैसे भुवनेश्वर में उन्होंने पिछले ढाई साल में कुल मिलाकर 500 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार किया, जिनमें गैर कोविड शव भी शामिल रहे. 

मधुस्मिता के मुताबिक एक महिला के लिए अंतिम संस्कार करना मुश्किल काम है, समाज से कई तरह की बातें सुनने के बावजूद उन्होंने पति के मिशन में साथ देना जारी रखा.  

मधुस्मिता ने बताया कि इसी मिशन के लिए पति के नाम पर प्रदीप सेवा ट्रस्ट बना हुआ है. प्रुस्टी दंपति ने भुवनेश्वर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के साथ लिखित एग्रीमेंट कर रखा है. कोविड-19 महामारी ने पिछले साल जब से दस्तक दी है, ये दंपति एंग्रीमेंट के मुताबिक कोविड शवों को अस्पताल से भुवनेश्वर में निर्धारित श्मशान गृह तक ले जाते हैं और वहां कोविड प्रोटोकॉल के मुताबिक अंतिम संस्कार करते हैं. 

मिशन पर होने वाला खर्च और घर के अन्य खर्च कैसे चलते हैं, इस प्रदीप बताते हैं कि उनकी सब्जियों की दुकान है, जो इन दिनों कोरोना से जुड़ी बंदिशों की वजह से सुबह 7 बजे से सुबह 11 बजे तक खुलती है. प्रदीप के पास एक ऑटो रिक्शा भी था जो उन्हें पिछले साल लॉकडाउन के दौरान बेचना पड़ा. 

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