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दो गैंग, गलत शिकार और दिनदहाड़े कत्ल... बस्ती से दिल्ली के अस्पताल तक पहुंची गैंगवार की पूरी कहानी!

शाम करीब चार बजे के आस-पास वार्ड में भर्ती रियाजुद्दीन के पास उसकी बहन तरन्नुम और डॉक्टर मौजूद थे. तभी 18-20 साल की उम्र के चार लड़के वॉर्ड में दाखिल होते हैं. पिस्टल निकालते हैं और बेड पर लेटे रियाजुद्दीन को एक के बाद एक पांच गोली मारते हैं और वहां से भाग जाते हैं.

पुलिस ने इस शूटआउट के बाद दो लोगों को पकड़ लिया है पुलिस ने इस शूटआउट के बाद दो लोगों को पकड़ लिया है
हिमांशु मिश्रा/राम किंकर सिंह/चिराग गोठी
  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 3:12 PM IST

दिल्ली के एक नामी अस्पताल में चार लड़के दाखिल होते हैं. उन्हें वार्ड के बेड पर लेटे एक ऐसे मरीज की तलाश थी, जिसके पेट पर पट्टियां बंधी थीं और उसके पास एक महिला बैठी थी. कुछ देर की तलाश के बाद उन्हें वो मरीज मिल जाता है. और इससे पहले कि वहां मौजूद लोग कुछ समझ पाते, वो चारों लड़के उस मरीज के करीब जाते हैं और उसके जिस्म में पांच गोलियां उतार देते हैं. मगर बाद में उन चारों कातिलों को न्यूज़ चैनल की खबर देखकर पता चलता है कि उनसे गलती हो गई. मारना किसी को था और वो किसी और को मार आए.   

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14 जुलाई 2024, वार्ड नंबर 24, जीटीबी अस्पताल, दिल्ली
दिल्ली के नामचीन जीटीबी अस्पताल के वार्ड नंबर 24 में ज्यादातर वो मरीज भर्ती थे, जो पेट की बीमारी के शिकार थे. इनमें से भी ज्यादातर वो मरीज थे, जो ऑपरेशन के बाद वार्ड में रिकवर हो रहे थे. इसी वॉर्ड के एक बेड पर दिल्ली के ही खजूरी खास का रहने वाला एक शख्स रियाजुद्दीन भी भर्ती था. पेट में इनफेक्शन के बाद ऑपरेशन हो चुका था. अब वो रिकवर कर रहा था. शायद अगले कुछ दिनों में उसे अस्पताल से छुट्टी भी मिल जाती. उस दिन शाम को अस्पताल में रियाजुद्दीन की देखभाल के लिए उसकी बहन तरन्नुम मौजूद थी. शाम करीब चार बजे के आस-पास डॉक्टर रियाजुद्दीन का बैंडेज भी बदल चुके थे. रियाजुद्दीन के पास अब भी उसकी बहन तरन्नुम और डॉक्टर मौजूद थे. 

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बेड पर लेटे मरीज को मार दी गोली
तभी ठीक उसी वक़्त 18-20 साल की उम्र के चार लड़के वॉर्ड में दाखिल होते हैं. इधर-उधर नजर दौड़ाते हैं और फिर अचानक उनकी नजर रियाजुद्दीन के पेट पर बंधी पट्टी, बराबर में खड़ी एक महिला यानी तरन्नुम पर पड़ती है. अब वो तेजी से बेड की तरफ बढ़ते हैं और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वे पिस्टल निकाल कर बेड पर लेटे रियाजुद्दीन को एक के बाद एक पांच गोली मारते हैं. इससे पहले कि वार्ड में कोई कुछ समझ पाता, चारों तेज़ी से वापस निकल जाते हैं.

गोली लगते ही मरीज की मौत
दिल्ली के इतिहास में ये पहली बार था, जब शूटरों ने किसी बड़े और नामी अस्पताल में घुस कर तमाम लोगों की मौजूदगी में यूं किसी को गोली मारी थी. अमूमन शूटआउट के बाद घायल को फौरन अस्पताल ले जाया जाता है. यहां खुद अस्पताल के अंदर गोली मारी गई थी. डॉक्टर बराबर में खड़ा था. गोली खाने वाला पहले से ही अस्पताल के बिस्तर पर था. इसलिए इलाज शुरू होने में भी ना कोई देरी हुई, ना मुश्किल आई. लेकिन ये इलाज भी शुरू होते ही खत्म हो गया. क्योंकि रियाज़ तब तक दम तोड़ चुका था.

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पहले पुलिस को आसान लगा था ये मामला
शूटआउट हो चुका था. अब पुलिस भी अस्पताल पहुंच चुकी थी. खुद पुलिस हैरान थी कि अस्पताल के अंदर इतने तमाम लोगों की मौजूदगी में इतना रिस्क उठा कर आखिर शूटरों ने रियाज को गोली मारी क्यों? रियाज है कौन? पुलिस को यकीन हो चला था कि रियाज पक्का कोई गैंगस्टर होगा और किसी गैंग से जुड़ा होगा और इसी गैंगवार ने उसकी जान ले ली. शुरुआत में पुलिस को लगा कि केस आसान है. चुटकी में सुलझ जाएगा.

रियाजुद्दीन का सच जानकर पुलिस हैरान
चूंकि वार्ड में रियाज की तीमारदारी के लिए उसकी बहन तरन्नुम मौजूद थी और वो इस शूटआउट की भी गवाह थी, लिहाजा पूछताछ का सिलसिला तरन्नुम से ही शुरू हुआ. लेकिन जैसे ही तरन्नुम ने अपनी और अपने भाई की कहानी सुनाई, पुलिस दूसरी बार हैरान हुई. हैरानी की वजह रियाज का सच था. जिस रियाज को पुलिस कोई गैंगस्टर और उसकी मौत को गैंगवार का नतीजा समझ रही थी, वो रियाजुद्दीन तो दिल्ली का ही रहने वाला एक मामूली मजदूर था. कुछ वक़्त पहले उसके पिता की मौत हो गई थी. तब से वो सदमे में था. बाद में उसने ड्रग्स लेनी शुरू कर दी. इसी वजह से उसके पेट में कुछ संक्रमण हो गया था. जिसके इलाज के लिए वो जीटीबी अस्पताल आया था. ऑपरेशन के बाद अब वो ठीक भी हो रहा था.

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सीसीटीवी कैमरों से शूटर्स को पचानने की कोशिश
पुलिस अब तीसरी बार हैरान होने जा रही थी. इस बार हैरानी की वजह ये कि एक मामूली मजदूर को कोई इस तरह से अस्पताल में घुस कर क्यों गोली मारेगा? इस आम से मजदूर से किसी की क्या दुश्मनी हो सकती है? अब इसी लाइन पर पुलिस अपनी तफ्तीश आगे बढ़ाती है. तब तक अलग-अलग टीमें अस्पताल के आस-पास लगे सीसीटीवी कैमरे से कुछ चेहरों को पहचानने की कोशिश करते हैं. चार चेहरे शक के घेरे में थे. 

शूटर्स ने रियाजुद्दीन को क्यों मारी गोली? 
उधर, उसी वक्त पुलिस की एक टीम रियाज और उसके परिवार का सच भी खंगाल रही थी. पर हाथ कुछ नहीं लग रहा था. रियाज का पास्ट और प्रेज़ेंट दोनों बिल्कुल क्लीन था. बहन तरन्नुम समेत घर वाले भी बार-बार यही कह रहे थे कि उनका भाई ऐसा था ही नहीं जो कोई उससे दुश्मनी रखे, तो फिर शूटरों ने रियाज को क्यों निशाना बनाया?

टारगेट रियाज नहीं कोई और था?
तफ्तीश अभी जारी ही थी कि तभी एक ऐसी जानकारी पुलिस के हाथ लगी कि पुलिस अब चौथी बार हैरान होने जा रही थी. दरअसल, रियाज की कुंडली खंगालने के बाद पुलिस को ये यकीन हो चला था कि रियाज जैसे शख्स को मारने के लिए शूटर दिन दहाड़े अस्पताल में घुस कर इतना बड़ा रिस्क नहीं लेंगे. तो क्या टारगेट रियाज नहीं कोई और था? और अगर कोई और था, तो फिर शूटरों ने अनजाने में बिना सोचे समझे उसे एक की बजाय पांच-पांच गोलियां क्यों मारी? 

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पुलिस ने खंगाली वार्ड में भर्ती मरीजों की कुंडली 
अब पुलिस की तफ्तीश का रुख अस्पताल के बाहर की बजाय अस्पताल के अंदर की तरफ मुड़ चुका था. पुलिस ने 14 जुलाई यानी रविवार को वार्ड नंबर 24 में भर्ती हर मरीज की कुंडली खंगालने का फैसला किया. लेकिन किसी भी मरीज का रिकॉर्ड ऐसा नहीं मिला, जिससे इस शूटआउट का लिंक उससे जोड़ा जा सकता. लिहाजा, पुलिस ने 14 जुलाई की बजाय 12 और 13 जुलाई को वार्ड नंबर 24 में ही भर्ती उन मरीजों की कुंडली को खंगालने का फैसला किया, जिन्हें 14 जुलाई से पहले या तो छुट्टी दे दी गई या किसी और वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया.

रियाज से पहले उस बेड पर था वसीम
ये तफ्तीश काम कर गई. अब पुलिस पांचवीं बार हैरान होने जा रही थी. पता चला कि वार्ड नंबर 24 के जिस बेड पर रियाज लेटा हुआ था, ठीक एक दिन पहले 13 जुलाई को उसी बेड पर लगभग रियाज की उम्र का ही एक और मरीज लेटा हुआ था. जिसका नाम वसीम था. तफ्तीश के दौरान पता चला कि वसीम के पेट में गोली लगी थी. ऑपरेशन के बाद उसे वार्ड नंबर 24 में ही शिफ्ट किया गया था. लेकिन 13 जुलाई की शाम वसीम को वार्ड नंबर 24 से किसी और वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया. 

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रियाज को नहीं वसीम को गोली मारने आए थे शूटर्स
ये जानकारी पुलिस के लिए बेहद खास थी क्योंकि वसीम नाम के इस मरीज की जैसे ही कुंडली खंगाली गई, सारे सवालों के जवाब एक-एक कर सामने आते गए. जी हां, शूटरों के निशाने पर रियाज नहीं बल्कि वसीम ही था. 14 जुलाई की शाम चार शूटर वार्ड नंबर 24 में वसीम को ही गोली मारने आए थे. और ये सबकुछ गैंगवार का ही मामला था. पर एक सवाल का जवाब मिलना अब भी बाकी था. अगर शूटर वसीम को गोली मारने आए थे, तो रियाज को क्यों गोली मारी?

सीसीटीवी फुटेज से पकड़ में आए दो बदमाश
जाहिर है इस सवाल का जवाब गोली चलाने वाले शूटर या उन शूटर के साथी से ही मिल सकता था. सीसीटीवी कैमरे ने शूटआउट में शामिल दो चेहरों के बेनक़ाब कर दिया था. लोकल पुलिस की मदद से उनकी शिनाख्त भी हो गई. इनमें से एक का नाम फैज़ खान था. जबकि दूसरे का फरहान. दोनों 20-21 साल के लड़के थे. हालांकि शूटआउट के वक्त ये वॉर्ड में मौजूद जरूर थे, पर रियाज पर गोली इनके बाकी दो साथियों ने चलाई थी. जो अभी हाथ आने बाकी हैं. लेकिन गिरफ्तारी के बाद फैज और फरहान ने पुलिस को जो कहानी सुनाई, उसे सुनते ही पुलिस छठी बार हैरान होने जा रही थी.

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कातिलों को नहीं थी वसीम की पहचान
दरअसल, दिल्ली के एक गैंग ने वसीम को मारने के लिए चार नए लड़कों को हायर किया था. इन चारों से कहा गया कि उनका टारगेट यानी वसीम दिल्ली के जीटीबी अस्पताल के वार्ड नंबर 24 में भर्ती है. चारों को वसीम को गोली मारने के बाद एग्जिट रूट भी बता दिया गया था. पर जिस वसीम को इन चारों को गोली मारनी थी, इनमें से कोई भी ना उसे जानता था, उससे पहले कभी मिला था. यहां तक कि वसीम की तस्वीर भी उन्हें नहीं दी गई थी. चारों को बस इतना कहा गया था कि वसीम एक मुस्लिम व्यक्ति है, उम्र 35 साल के आस-पास है, वार्ड नंबर 24 में भर्ती है, उसके पेट पर पट्टी बंधी हुई है और उसकी देखभाल के लिए उसकी एक महिला रिश्तेदार उसके पास मौजूद है.

ऐसे मारा गया बेकसूर और बेगुनाह शख्स
बस, इसी जानकारी के साथ शूटर अस्पताल पहुंच गए. इस बात से बेखबर कि लगभग 24 घंटे पहले ही वसीम को वार्ड नंबर 24 से किसी और वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है और उसके बेड पर अब रियाज नाम का एक मरीज भर्ती है. इत्तेफाक से रियाज भी मुस्लिम था. उम्र भी वसीम के बराबर. पेट पर पट्टी भी और तीमारदारी के लिए पास में बैठी बहन भी. बस, यही सब देख कर शूटरों को लगा कि यही वसीम है. और फिर बिना सोचे समझे उन्होंने गोली चला दी. यानी एक गलत पहचान की वजह से एक बेकसूर और बेगुनाह शख्स मारा गया.

दो गैंग और गैंगवार की नई कहानी
अब सवाल ये है कि ये वसीम कौन है? पुलिस ने अब वसीम की कुंडली खंगाली. और इसके साथ ही दिल्ली के दो गैंग और गैंगवार की एक नई कहानी सामने आई. दिल्ली के वेलकम इलाके में दो गैंग हैं. एक हाशिम बाबा गैंग और एक नासिर छेनू गैंग. वसीम कभी हाशिम बाबा गैंग के लिए काम करता था. लेकिन बाद में कुछ अनबन हो गई. तब उसने नासिर छेनू गैंग का दामन थाम लिया. इस दौरान 2023 में जब वो तिहाड़ की मंडोली जेल में बंद था, तब उसने हाशिम बाबा गैंग के तीन लड़कों पर ब्लेड से हमला कर दिया था. बस इसी के बाद से हाशिम बाबा गैंग वसीम से बदला लेना चाहता था. 

वसीम को निपटाना चाहता था हाशिम बाबा गैंग 
इसी साल अप्रैल में वसीम जमानत पर जेल से बाहर आ गया. बाहर आने की खबर हाशिम बाबा गैंग को लगी. अब गैंग के वसीम के पीछे था. 13 जून की रात वेलकम एरिया में वसीम अपने दो दोस्तों के साथ जब बाइक पर जा रहा था, तभी हाशिम बाबा गैंग ने उस पर हमला कर दिया. इस शूटआउट में वसीम को चार गोलियां लगीं. लेकिन वो फिर भी वहां से बच कर निकल भागा. एक गोली पेट में लगी. बाद में इलाज के लिए उसके घर वाले जीटीबी अस्पताल ले गए. जहां ऑपरेशन के बाद गोली निकाल दी गई लेकिन वो अब भी अस्पताल में ही भर्ती था.

रियाज को मिली वसीम के हिस्से की मौत
हाशिम बाबा गैंग को उसके जिंदा बच निकलने की खबर लग गई. फिर उन्हें ये भी पता चला कि वो जीटीबी अस्पताल में भर्ती है और अब खतरे से बाहर है. गैंग ने उस वार्ड नंबर 24 का भी पता लगा लिया, जहां वसीम भर्ती था और इसी के बाद 14 जुलाई की शाम चार शूटरों को वसीम को निपटाने के लिए भेजा. लेकिन अफसोस वसीम के बेड पर तब रियाज था और इस तरह वसीम के हिस्से की मौत रियाज के हिस्से आ गई.

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