
India-Canada Diplomatic Tensions: कनाडा में प्रमुख खालिस्तानी अलगाववादियों की मौजूदगी और गतिविधियों ने भारत और कनाडा के बीच संबंधों को और भी तनावपूर्ण बना दिया है, जिसके नतीजे हाल ही में हाई-प्रोफाइल घटनाओं और कूटनीतिक मतभेदों के रूप में सामने आए हैं. खालिस्तानी आतंकी खालिस्तान का सपना देखते हैं, जिसका अर्थ है 'खालसा की भूमि.' असल में भारत में पंजाब के सिख अलगाववादी कार्यकर्ताओं के प्रस्तावित राज्य का नाम ही खालिस्तान है.
1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में चरम पर पहुंचे इस आंदोलन ने पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा और अन्य पड़ोसी राज्यों सहित भारत के उत्तरी क्षेत्रों में एक स्वतंत्र सिख राज्य की मांग की. हालांकि भारत में सरकार ने सेना और पुलिस की मदद से इसे काफी हद तक दबा दिया, लेकिन खालिस्तानी अलगाववादी आंदोलन ने सिख प्रवासियों के बीच, विशेष रूप से कनाडा में खासी गति पकड़ी. वहां तेजी से खालिस्तान समर्थकों की संख्या में इजाफा दर्ज किया गया.
खालिस्तानी आंदोलन का बड़ा चेहरा था निज्जर
कनाडा में रहने वाला हरदीप सिंह निज्जर, खालिस्तान टाइगर फोर्स (KTF) का नेता था. वह कथित तौर पर पंजाब भर में हिंसक गतिविधियों में शामिल था. उसके खिलाफ टारगेट किलिंग और बम धमाकों से जुड़े आरोप हैं. साल 2023 में कनाडा में उसकी हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड ने एक अंतरराष्ट्रीय विवाद को जन्म दिया. दरअसल, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने निज्जर की हत्या के लिए भारतीय एजेंसियों की मिलीभगत होने का आरोप लगाया. हालांकि भारत ने इन आरोपों को बेतुका बताते हुए खारिज कर दिया था. उल्टे भारत ने पंजाब में कई हिंसक घटनाओं के लिए निज्जर को जिम्मेदार ठहराया और उसे भारत का वांछित आतंकवादी करार दिया.
अर्शदीप सिंह उर्फ अर्श डल्ला की करतूत
खालिस्तान के अन्य प्रभावशाली और अलगाववादी व्यक्ति के बारे में अगर बात की जाए तो अर्शदीप सिंह उर्फ अर्श डल्ला के नाम से जाना जाता है, जिसने खुद को खालिस्तान कमांडो फोर्स के भीतर एक लीडर के रूप में स्थापित किया. कनाडा में मौजूद अर्श डल्ला कथित तौर पर जबरन वसूली और संगठित अपराध के नेटवर्क की देखरेख करता है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह पंजाब में अलगाववादी गतिविधियों के लिए फंडिग करता है. निज्जर और डल्ला दोनों आतंकवाद को भड़काने और वित्तपोषित करने में अपनी कथित भूमिका के लिए भारत की मोस्ट वांटेड सूची में हैं.
जुर्म की दुनिया में अर्श का पहला कदम
पंजाब के मोगा के डल्ला गांव के रहने वाले अर्श डल्ला ने बालिग होने से पहले से ही जरायम की दुनिया में कदम रख दिया था. पहले चोरी जैसी छोटी घटनाओं को अंजाम देने वाला डल्ला जल्द ही रंगदारी मांगने और लोगों को जानलेवा हमले की धमकी देना शुरू कर दिया. साल 2018 के बाद अपराध जगत में उसकी सक्रियता तेजी से बढ़ने लगी. अपहरण और हत्या जैसे संगीन जुर्म में उसका नाम आने लगा. इसी बीच उसका संपर्क कनाडा में बैठे गैंगस्टर गोल्डी बराड़ से हुआ. उसके इशारे पर उसने पंजाब में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर दिया. उसकी काली करतूतों की वजह से आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की उस पर नजर पड़ी.
केटीएफ मॉड्यूल का गठन
साल 2021 में हरदीप सिंह निज्जर ने अर्श डल्ला के साथ मिलकर तीन सदस्यीय खालिस्तानी टाइगर फोर्स यानी केटीएफ मॉड्यूल का गठन किया. उसी साल जुलाई में निज्जर के इशारे पर मोगा स्थित सनशाइन क्लॉथ स्टोर के मालिक तेजिंदर उर्फ पिंका की हत्या कर दी गई. बरगारी बेअदबी के आरोपी शक्ति सिंह के अपहरण और हत्या का प्रयास किया गया. लेकिन जिस शूटर भोला सिंह को उन लोगों ने भेजा वो वारदात को अंजाम देने से पहले ही पुलिस की पकड़ में आ गया. साल 2022 में अर्श डल्ला के निर्देश पर उसके गुर्गे गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी ने सुखप्रीत सिंह उर्फ सुख ग्रीस को पंजाब से पाकिस्तान में घुसपैठ कराने के लिए चंडीगढ़ भेजा था.
ISI के इशारे पर बनाई थी हमले की योजना
अर्श डल्ला ने जनवरी 2022 में एक सात सदस्यीय केटीएफ मॉड्यूल गठन किया. जिसका मुख्य लक्ष्य मोहाली स्थित एक इमिग्रेशन कंसल्टेंट प्रीतपाल सिंह बॉबी की हत्या करना था. इतना ही नहीं अगस्त 2022 में उसने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर स्वतंत्रता दिवस पर आतंकी हमले की योजना भी बनाई थी. इस तरह इन वारदातों को अंजाम देने के बाद उसका साहस इतना बढ़ गया कि उसने हरदीप सिंह निज्जर के साथ जनवरी 2022 में मोगा के तत्कालीन एसएसपी हरमनबीर सिंह गिल और सीआईए विंग के दो इंस्पेक्टरों की हत्या की योजना बना डाली. हालांकि, इसमें वो सफल नहीं रहे, लेकिन पुलिस की नजरों में बुरी तरह चढ़ गए.
ऐसे कनाडा भाग गया था अर्श डल्ला
पुलिस का शिकंजा कसता देख अर्श डल्ला साल 2020 में कनाडा भाग गया. उसके पास 1 सितंबर, 2017 को जालंधर में क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय द्वारा जारी किया गया पासपोर्ट है, जो 31 अगस्त, 2027 तक वैध है. वो सरे, ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा में रह रहा है. इसी जगह पर निज्जर भी रहा करता था. उसके सहयोग से ही वो भारत से कनाडा पहुंचा था. कुछ महीने पहले ही खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की अज्ञात लोगों ने हत्या कर दी थी. इसी मामले में भारत और कनाडा के बीच रिश्ते तल्ख चल रहे हैं. लेकिन हत्या से पहले निज्जर ने डल्ला के साथ मिलकर हिंदुस्तान की धरती पर कई वारदातों को अंजाम दिया था.
NDP नेता जगमीत सिंह पर भी इल्जाम
कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) के नेता जगमीत सिंह, हालांकि सीधे तौर पर हिंसक गतिविधियों में शामिल नहीं हैं, लेकिन वह सिख अधिकारों के समर्थक माने जाते हैं और खालिस्तानी वकालत से जुड़े रहे हैं. ऐसी ही वजहों दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध और जटिल हो गए हैं. कनाडा में सिखों का एक बड़ा समूह है, जिनमें से कुछ खालिस्तान के विचार का समर्थन करते हैं, हालांकि भारत में सिखों के बीच इसका व्यापक समर्थन नहीं होता है.
राजनीतिक समर्थन और प्रभाव
कनाडा की राजनीतिक जलवायु कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) के नेता जगमीत सिंह जैसे लोगों से भी प्रभावित रही है. हालांकि हिंसक अलगाववादी गतिविधियों से सीधे जुड़े नहीं होने के बावजूद, जंगमीत सिंह ने सिख अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई है, और खालिस्तान समर्थक वकालत के साथ उनके कथित जुड़ाव ने भारत और कनाडा के बीच और भी तनाव पैदा कर दिया है. कनाडा की बड़ी सिख आबादी, जो दुनिया के सबसे बड़े सिख प्रवासियों में से एक है. इस आबादी ने एक ऐसा आधार तैयार किया है, जहां खालिस्तानी भावनाएं कभी-कभी अभिव्यक्त होती हैं, हालांकि आंदोलन के लिए समर्थन भारत के भीतर सीमित है.
हाल की घटनाएं और बढ़ता तनाव
खालिस्तानी समर्थकों की बढ़ती संख्या ने वैंकूवर और अन्य कनाडाई शहरों में हिंदू मंदिरों पर हमलों सहित घटनाओं को बढ़ा दिया है. भारतीय संस्थानों के खिलाफ़ बर्बरता और धमकियों में बढोत्तरी दर्ज की गई है. जिसने भारतीय अधिकारियों और स्थानीय समुदायों दोनों को चिंतित कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रयास जटिल हो गए हैं. इन घटनाओं के बाद कनाडा की जो प्रतिक्रिया सामने आई है, उसकी भारतीय अधिकारियों ने आलोचना की. साथ ही राजनयिक गतिरोध और राजनयिकों का पारस्परिक निष्कासन भी इसी बात का नतीजा है.
आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ें
खालिस्तानी आंदोलन की जड़ें विभाजन के बाद पनपे असंतोष से जुड़ी हैं, लेकिन 1980 के दशक में एक स्वतंत्र सिख राज्य की स्थापना के उद्देश्य से विद्रोहियों के साथ इसने गति पकड़ी. यह आंदोलन ऑपरेशन ब्लू स्टार के साथ एक महत्वपूर्ण बिंदु पर पहुंच गया, जो 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से अलगाववादी आतंकवादियों को जड़ से उखाड़ने के लिए किया गया एक भारतीय सैन्य अभियान था.
खालिस्तानियों को मिला ISI का साथ
हालांकि 1990 के दशक के मध्य तक विद्रोह कम हो गया था, लेकिन आंदोलन ने सिख प्रवासियों के बीच एक नया जीवन पाया है, विशेष रूप से विदेशी संगठनों और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई से समर्थन मिलने के साथ. कनाडा में खालिस्तान समर्थक गतिविधियों से जुड़ी घटनाओं में वृद्धि के साथ, भारत-कनाडा संबंधों का भविष्य अनिश्चित लगता है, दोनों देश राजनयिक जुड़ाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में चिंताओं को संतुलित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.