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महंत नरेंद्र गिरि की मौतः डर के साए में हैं कई साधु संत, जानें क्या है बोधगया-वाराणसी कनेक्शन

बोधगया मठ के महंत रमेश गिरि अपनी जान जाने के डर से बोधगया के मठ में नहीं रहते हैं. महंत रमेश गिरि को डर है कि बोधगया मठ में असामाजिक तत्व उनकी जान ले सकते हैं. पिछले आठ 10 महीनों से वह अपनी जान को बचाते हुए इधर-उधर भटक रहे हैं.

महंत नरेंद्र गिरि की मौत ने साधु संतों को परेशान कर दिया है महंत नरेंद्र गिरि की मौत ने साधु संतों को परेशान कर दिया है
श्रेया चटर्जी/रोशन जायसवाल
  • बोधगया/वाराणसी,
  • 23 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 7:59 PM IST
  • कई साधु संतो को सता रहा है जान का खतरा
  • बोधगया मठ के महंत रमेश गिरि ने वाराणसी में ली है शरण
  • महंत नरेंद्र गिरि ने बनाया था लखनऊ काली मंदिर मठ का अध्यक्ष

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की मौत के बाद देश के कई साधु संत सहमे और डरे हुए हैं. बिहार के बोधगया शंकराचार्य मठ के महंत रमेश गिरि ने कहा कि उनकी जान को खतरा है, इसी डर से वह मठ में नहीं रह रहे हैं. क्योंकि बोधगया शंकराचार्य मठ में जमीनी विवाद काफी सालों से चला आ रहा है, महंत नरेंद्र गिरि ने बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड को मठ के विवाद सुलझाने के लिए पत्र भी लिखा था.

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नोएडा के ब्रह्मचारी अखाड़े के महंत ओम भारती ने आजतक/इंडिया टुडे को बताया कि महंत नरेंद्र गिरि खुद दुर्गा पूजा के बाद बोधगया मठ जाने वाले थे. बोधगया मठ में चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए वहां के महंत रमेश गिरि ने उनसे मदद मांगी थी. रमेश गिरि पिछले 5 महीनों से वाराणसी के मठ में शरण लिए हुए हैं. उन्होंने यूपी सरकार से भी सुरक्षा की गुहार लगाई है.

बोधगया मठ के महंत रमेश गिरि अपनी जान जाने के डर से बोधगया के मठ में नहीं रहते हैं. महंत रमेश गिरि को डर है कि बोधगया मठ में असामाजिक तत्व उनकी जान ले सकते हैं. बिहार धर्मिक न्यास बोर्ड आज भी रमेश गिरि को ही बोधगया मठ का महंत मानता है धार्मिक न्यास बोर्ड़ ने 2 दिसम्बर 2020 को बोधगया थाना पुलिस को रमेश गिरि की सुरक्षा का इंतजाम करने के लिए कहा था. बोर्ड ने पुलिस को निर्देशित किया गया था कि महंत रमेश गिरि तत्काल सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए. पिछले आठ 10 महीनों से वह अपनी जान को बचाते हुए इधर उधर भटक रहे हैं.

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महंत रमेश गिरि

रमेश गिरि के मददगार थे महंत नरेंद्र गिरि

बनारस में महंत रमेश गिरि ने बताया कि महंत नरेंद्र गिरि उनके बहुत बड़े सहयोगी थे. लखनऊ काली मंदिर मठ के मामले में महंत नरेंद्र गिरि ने उनकी बहुत मदद भी की थी. इसके बाद नरेंद्र गिरी को लखनऊ के काली मंदिर मठ का अध्यक्ष भी बना दिया था. नरेंद्र गिरी के जाने से उनको बहुत तकलीफ और पीड़ा है. नरेंद्र गिरी अगर रहते हैं तो बिहार के बोधगया मठ के मामले में उनकी काफी मदद भी करते. उन्होंने आगे बताया कि इसी नवरात्र में महंत नरेंद्र गिरि उनके मठ में आने वाले थे और बोधगया मठ को लेकर चल रहे विवाद पर चर्चा भी होने वाली थी. रमेश गिरि का कहना है कि उनके मठ के बहुत सारे उपद्रवी उन्हें परेशान कर रहे हैं. उन लोगों ने बिहार के बोधगया मठ में कब्जा कर लिया है. वहां अपना अड्डा जमा लिया है. रमेश गिरि का कहना है कि उन लोगों के खिलाफ काफी लिखा भी गया है, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है.

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दरअसल, बोधगया मठ के महंत रमेश गिरि ने बोधगया थाने में उनके साथ मारपीट किए जाने और अवैध तरीके से मठ की जमीन पर कब्जा किए जाने के संबंध में थाने पर 17 अप्रैल 2021 को एक प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई थी. महंत रमेश गिरि के मठ की संपत्ति न केवल बिहार, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों और बनारस में भी मौजूद है. इसलिए वे बनारस में शरण लिए हुए हैं. जानकारी के अनुसार महंत नरेंद्र गिरि ने रमेश गिरि की विवादों से निकलने में कई बार मदद की थी. साथ रमेश गिरि अपने काली मंदिर मठ लखनऊ के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी. 

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महंत त्रिवेणी गिरि

महंत त्रिवेणी गिरि के आरोप

वहीं बोधगया शंकराचार्य मठ के वर्तमान महंत त्रिवेणी गिरि ने बताया कि बोधगया मठ चार सौ साल से ज्यादा पुराना है और इसका महत्व बहुत ज्यादा है. वहां शिव को पूजा जाता है. बोधगया शंकराचार्य मठ का विवाद यह था कि मठ के पास बहुत जमीन है. सरकार ने एक टीम बनाई और इसकी जांच शुरु कर दी. इसके खिलाफ आंदोलन हुआ. मठ ने बहुत सारी जमीन स्कूल और कॉलेज को भी दी है. महंत रमेश गिरि को इस बात की कोई समझ नहीं थी. जो मठ के बारे उन्हें सलाह देते थे, वो उनकी बातों को सुनते नहीं थे. वे गलत लोगों को मठ में बुलाते गए और मठ को बेचने लगे थे. उनके समय में बाहर के लोगों को दुकान बनाकर दी गई थी. वो अच्छा काम नहीं कर रहे थे. सभी लोगों ने न्यास बोर्ड को लिखना शुरु कर दिया और बोर्ड ने निर्देश दिया कि मठ में जो कुछ भी करना है, धार्मिक न्यास बोर्ड से अनुमति लेकर किया जाएगा. जब उन्होंने बोर्ड की बात नहीं मानी तो धार्मिक न्यास बोर्ड ने ऐसी कार्रवाई पर रोक लगा दी. 

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धर्मिक न्यास बोर्ड की जांच में आरोप सही निकले
 
बोधगया मठ में रहने वाले त्रिवेणी गिरि के शिष्य विवेकानंद गिरि ने बताया कि 1590 से मठ का लिखित इतिहास उनके पास उपलब्ध है. मगर पिछले चार पांच सालों में बोधगया मठ विवादों में रहा है. पिछले महंत रमेश गिरि और उनके साथ रहने वाले कुछ लोग मठ का नुकसान कर रहे थे. अब बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड की अनुमति के बिना कोई भी कार्य नहीं किया जाता है. मगर महंत रमेश गिरि ने धार्मिक न्यास बोर्ड की अनुमति के बिना ही दुकानों का निर्माण करा दिया था और दुकानें दूसरे लोगों को दे दी थी. दूसरे लोगों को मठ की जमीन के लिए अधिकृत कर दिया था. जमीनों के अधिकारी दूसरे लोगों को दे दिए थे. जिसको लेकर स्थानीय लोगों ने और मठ के पुराने लोगों ने दो तीन साल तक लगातार धार्मिक न्यास बोर्ड में इनके खिलाफ शिकायतें दी. जितने भी आरोप रमेश गिरि पर लगे थे, वह धर्मिक न्यास बोर्ड की जांच में सिद्ध हो चुके थे. 

बौधगया मठ

किसी अखाड़े से संबंधित नहीं बोधगया मठ

विवेकानंद गिरि के मुताबिक इसके बाद धार्मिक न्यास बोर्ड ने एक समिति बनाई थी. जिसने सारे गलत कार्यों के लिए रमेश गिरि को दोषी माना. बोधगया मठ में परम्परा रही है कि महंत पद पर जिस व्यक्ति का चयन होगा, वो बोधगया मठ के लोगों द्वारा पंचायत के माध्यम से स्थानीय सामाजिक लोगों के माध्यम से चुना जाए. इसी परम्परा के अनुसार वर्तमान महंत त्रिवेणी गिरि को पद पर आसीन किया गया. इसके लिए बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड में आवेदन दिया गया है. जो प्रक्रिया में है. बोधगया मठ स्वतंत्र मठ है. जिसका किसी भी अखाड़े से संबंध नहीं है.

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महंत नरेंद्र गिरि अखाडा परिषद् के अध्यक्ष थे. कहीं भी किसी महात्मा को संकट आता था. मठ या मंदिर में अव्यवस्था होती थी. किसी को मदद मांगनी होती थी, तो लोग महंत नरेंद्र गिरि से मदद मागंते थे. बोधगया मठ में जो विवाद था, उसको लेकर भी उन्हें जानकारी दी गई थी. इसके बाद महंत नरेंद्र गिरि ने बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड को एक पत्र भी लिखा था.

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सभी अखाड़ों को साथ लेकर चलते थे महंत नरेंद्र गिरि

बोधगया आए अग्नि अखाड़ा  के कमला नन्द ब्रह्मचारी ने बताया कि महंत नरेंद्र गिरि जी के पास उनका आना-जाना लगा रहता था. वह एक अच्छे व्यक्ति थे. महात्माओं के बीच उनकी अच्छी छवि थी. वह बड़े ही प्रेम से देश के 13 अखाड़ों को साथ लेकर चलते थे. बाद में छोटा-मोटा विवाद सुनने में आया था. उनकी आत्महत्या की बात सुनकर सभी साधु संतो को दुख हुआ है. उन्होंने ने जो अपना वसीयत नामा लिखा है, वह उतना लिखते नहीं थे, इसलिए जांच अच्छे की जानी चाहिए.

(बोधगया से पंकज कुमार का इनपुट)


 

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