
तिहाड़ जेल ना सिर्फ देश की बल्कि पूरे साउथ ईस्ट एशिया का सबसे बड़ी जेल मानी जाती है. कहते हैं इसी तिहाड़ जेल में देश के सबसे खूंखार कैदी बंद हैं. इन कैदियों में खतरनाक आतंकियों से लेकर, अंडरवर्ल्ड डॉन और कई कुख्यात गैंगस्टर तक शामिल हैं. अब जब ये जेल इतने खतरनाक कैदियों का ठिकाना है, तो फिर इसकी सिक्योरिटी भी उतनी ही कड़ी होनी चाहिए. लेकिन इन दिनों तिहाड़ की ये सुरक्षा सिर्फ कागजों पर ही नजर आती है. कैदियों के बीच गैंगवार, कत्ल, नशे की बरामदगी से लेकर रिश्वतखोरी तक. तिहाड़ के माथे पर एक नहीं सैकड़ों कलंक हैं. जानिए, तिहाड़ के अतीत से लेकर वर्तमान तक की पूरी कहानी.
तिहाड़.. एक ऐसा लफ़्ज, जिसके कानों में पड़ते ही ऊंची-ऊंची दीवारों, कंटीले तारों और हर तरफ पुलिस वालों से घिरी एक ऐसी जगह की तस्वीर जेहन में उभरती है, जहां कोई नहीं जाना चाहता. वजह ये कि ये जगह इंसान से सांसों के बाद उसकी दूसरी सबसे कीमती चीज यानी उसकी आज़ादी छीन लेती है. वजह ये कि इस इमारत के अंदर रहनेवाले तमाम लोग दुनियावी जिंदगी की छोटी-बड़ी सुविधाओं और कई बार बुनियादी जरूरतों तक से महरूम रह जाते हैं. वजह ये कि यहां देश के एक से बढ़ कर एक छंटे हुए और खूंखार बदमाश यहां रहते हैं और वजह ये कि यहां एक बार जाने पर बदनामी ताउम्र इंसान का पीछा करती है.
क्या सच में ऐसी ही है तिहाड़ जेल?
अब सवाल उठता है कि क्या वाकई तिहाड़ ऐसा ही है? क्या एक जेल की सुरक्षा, वहां मौजूद पाबंदी, वहां की सख्ती, वहां के कायदे कानून वैसे ही हैं, जैसा कि कहा जाता है? क्या वाकई तिहाड़ पर ये जुमला फिट बैठता है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता? या फिर तिहाड़ का सच कुछ और है? और उस सच में तमाम कायदे-कानूनों पर करारे-करारे हरे और गुलाबी नोट भारी पड़ जाते हैं? क्या वाकई वीआईपी और रसूख वाले लोगों के सामने इस जेल की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं? क्या वाकई तिहाड़ में ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ पैसा चलता है? तो तिहाड़ को क़रीब से जाननेवाले लोगों की मानें तो फिलहाल इस जेल का सच कुछ ऐसा ही है.
मजाक बन कर रह गई तिहाड़ जेल
जानकार बताते हैं कि तिहाड़ इस वक्त अगर वहां रहनेवाले करीब 18 हजार बंदियों, 30 छोटे बड़े क्रिमिनल गैंग्स के सरगनाओं और गुर्गों, आतंकियों और अलग-अलग किस्म के समाज कंटकों को मैनेज करने की चुनौती से रोजाना जूझता है, तो भ्रष्टाचार के आगे रोज़ मलिन पड़ती अपनी छवि को बचाने की समस्या से भी दो-चार होता है. जहां तिहाड़ को लेकर ये धारणा तेजी से बनने लगी है कि ये जेल, अब जेल ना रह कर एक मज़ाक बन कर रह गई है.
तिहाड़ की साख पर बट्टा
साल दर साल तिहाड़ की चारदिवारी से छन-छन कर आती कभी गैंगवार, तो कभी क़त्ल की खबरें. कैदियों के ऐशो-आराम की तस्वीरें और भ्रष्टाचार के आरोप में पूरे के पूरे जेल के नप जाने के वाकयों ने वाकई तिहाड़ की साख पर बट्टा लगा दिया है. लेकिन तिहाड़ के इस स्याह सच में और गहरे उतरने से पहले तिहाड़ को बनाने के मकसद और इसके इतिहास को जान लेना जरूरी है.
तिहाड़ जेल बनने की कहानी
साल 1957... यानी आजादी के ठीक दस साल बाद. वैसे तो दस साल का वक्त अपने-आप में काफी लंबा होता है, लेकिन अगर किसी मुल्क के मुस्तकबिल को संवारने की बात करें, तो दस साल कुछ भी नहीं होते. वो भी तब जब मुल्क लुटेरों और आंक्राताओं की मार झेल कर पहले ही कई साल पीछे चला गया हो. कुछ इन्हीं दिनों में और इन्हीं हालात के बीच 1957 में दिल्ली के पश्चिमी छोर पर तिहाड़ की इमारत बन कर तैयार हुई. फिर अपने बनने से लेकर नौ साल तक इस जेल को चलाने की जिम्मेदारी पंजाब के पास रही. मगर आगे चल कर इसकी कमान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी दिल्ली के हवाले कर दी गई. साल 1984 के आते-आते इस जेल का काफी विस्तार हुआ और तब पूरे कांप्लेक्स को ही तिहाड़ जेल का नाम दे दिया गया. असल में ये जेल चाणक्यपुरी से करीब 7 किलोमीटर दूर दिल्ली के तिहाड़ गांव के करीब बनाई गई थी, ऐसे में इसके साथ शुरू से ही तिहाड़ का नाम जुड़ा रहा.
आईपीएस किरण बेदी ने बदली तस्वीर
करीब 400 एकड़ में फैले इस जेल का नाम तब पहली बार पूरी दुनिया में अच्छी वजह से चर्चाओं में आया, जब इंस्पेक्टर जनरल ऑफ प्रिजन्स के तौर पर इसकी कमान देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी के हाथों में आई. किरण बेदी ने सही मायने में पाप से घृणा करो, पापी से नहीं वाली धारणा को यहां अमल में लाने की कोशिश की और इसका नाम तिहाड़ जेल से बदल कर तिहाड़ आश्रम कर दिया. उन्होंने जेल में बंद कैदियों और वहां के मुलाजिमों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत करने के साथ-साथ विपश्यना मेडिटेशन का भी आगाज़ किया, ताकि अपराधियों को जुर्म की स्याह दुनिया से ज्यादा से ज्यादा दूर कर समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके.
जुर्म के अंधेरे में गुम होती गई पहचान
इन योजनाओं का ही असर था कि साल 2014 में इस जेल के 66 कैदियों को उनकी क्षमता और अच्छे चाल-चलन के मद्देनजर सीधे देश की कई नामी कंपनियों में नौकरी मिली और तो और एक बंदी ने जेल में रहते हुए यूपीएससी का इम्तेहान भी पास कर लिया और नई शुरुआत की. लेकिन ये भी सच है कि धीरे-धीरे हर गुजरती तारीख के साथ तिहाड़ की ये साख मानों फिर से जुर्म के अंधेरे में गुम होने लगी.
क्षमता से दोगुने कैदी बने परेशानी
फिलहाल तिहाड़ जेल परिसर में कुल नौ सेंट्रल जेल मौजूद हैं, जबकि इसके अलावा तिहाड़ जेल की दो शाखाएं रोहिणी और मंडोली भी हैं. इनमें रोहिणी में जहां एक सेंट्रल जेल है, वहीं मंडोली में 6 सेंट्रल जेल. लेकिन इतना होने के बावजूद तिहाड़ के सामने क्षमता से ज्यादा कैदियों की समस्या विकराल रूप लेकर खड़ी है. ऊपर से जेल की क्षमता से यहां करीब दो गुने कैदियों के बंद होने की मजबूरी ने मानों सारा का सारा खेल बिगाड़ कर रख दिया. साल 2019 के तथ्यों के हवाले से बात करें, तो तिहाड़ जेल क्षमता कुल 10 हज़ार 26 कैदियों की है, जबकि इस जेल में फिलहाल कुल 17 हज़ार 534 यानी यानी लगभग 18 हजार कैदी बंद हैं और ये आंकड़ा अपने-आप में क्षमता के मुकाबले करीब दोगुनी ज्यादा है.
16 मार्च 1986 - तिहाड़ की साख पर पहला धब्बा
यही वो तारीख थी, जब तिहाड़ के दामन पर भ्रष्टाचार, लापरवाही और निकम्मेपन का पहला दाग लगा. कहते हैं कि तिहाड़ में बंद चार्ल्स शोभराज ने यहां रहते हुए एक बार ऐसा जाल बट्टा फैलाया कि जेल के मुलाजिमों को अपने जन्मदिन के नाम पर केक के बहाने नशा देकर जेल से ही फरार हो गया. तिहाड़ के इतिहास में ऐसी लापरवाही का ये पहला मामला था. फिर तो नामालूम साल-दर-साल ऐसे कितने ही मामले सामने आए, जब तिहाड़ का भ्रष्टाचार उजागर हो गया. हाल ही में महाठगी के आरोपी सुकेश चंद्रशेखर का जेल से वायरल वीडियो, उससे की गई रिश्वतखोरी के चलते तकरीबन सौ जेल मुलाजिमों का सस्पेंड हो जाना, जेल में दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन का मालिश मसाज कराना, तिहाड़ की साख पर लगे वो धब्बे हैं, जिन्हें शायद कभी मिटाया नहीं जा सकेगा.
कई अपराधी जेल से ही चलाते हैं जुर्म का काला साम्राज्य
फिलहाल हालत ये है कि तिहाड़ और उसकी दोनों शाखाएं अपराध और अपराधियों का अड्डा बन कर रह गई हैं. यहां बंद गैंगस्टर जेल से ही बैठे-बैठे अपना क्राइम सिंडिकेट चला रहे हैं. वो जेल से ही बैठे-बैठे कारोबारियों, उद्योगपतियों और अपने शिकार लोगों को फोन करते हैं, उनसे रंगदारी मांगते हैं और नहीं देने पर जेल से ही सुपारी देकर उनका काम तमाम करा देते हैं. और ऐसा तब होता है, जब तिहाड़ के साथ हाई सिक्योरिटी जेल होने का टैग जुड़ा है और जब जेल के इर्द-गिर्द मोबाइल फोन के जैमर लगे होने की बात कही जाती है. एक तथ्य के मुताबिक तिहाड़ में इन दिनों कम से कम 20 बड़े और 30 छोटे क्रिमिनल गैंग्स से जुडे खूंखार अपराधी कैद हैं, जो जेल से ही जुर्म काला साम्राज्य चलाते हैं.
तिहाड़ में बंद हैं कई कुख्यात अपराधी
तिहाड़ में बंद बड़े अपराधियों में अगर अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन का नाम आता है, तो सजायाफ्ता आतंकी यासीन मलिक का नाम भी शामिल है. इसके अलावा नामी गैंगस्टर और सरगनाओं में नीरज बवानिया, काला जठेड़ी, नासिर उर्फ छेनू, अनिल भाटी, नवीन बाली, रोहित चौधरी, रोहित मोई, हाशिम बाबा, दीपक बॉक्सर, संपत नेहरा, हड्डी, अट्टे, किकड़ी, बीड़ी, चवन्नी-अट्ठन्नी जैसे तमाम नाम शामिल हैं.
गलत वजहों से ही सुर्खियों में आती है तिहाड़ जेल
जाहिर है इतने खूंखार लोगों को एक जगह पर कैद रखना तिहाड़ प्रशासन के लिए अपने-आप में एक बड़ी चुनौती है. वो भी तब, जब इनमें से ज्यादातर एक दूसरे जानी दुश्मन हों और मौका मिलते ही कातिलाना हमला कर किसी को भी खत्म कर सकते हों. जाहिर है तिहाड़ के लिए ये चुनौती रोज़ की है और इस चुनौती से पार पाने के लिए तिहाड़ में जहां 365 दिन और चौबीसों घंटे सुरक्षाकर्मियों का कड़ा पहरा रहता है, वहीं चप्पे-चप्पे पर लगे करीब 8 हजार सीसीटीवी कैमरे, जैमर, अलार्म, हाई सिक्योरिटी सेल का भी इंतजाम है. मगर सच्चाई यही है कि तिहाड़ में मौजूद क्षमता से ज्यादा कैदी और भ्रष्टाचार का घुन हर इंतजाम को अक्सर नाकाफी साबित कर देता है और अक्सर तिहाड़ ग़लत वजहों से ही सुर्खियों में आता रहता है.
रुपयों के दम पर जेल में मिल जाती है हर चीज़
साल दर साल यहां होनेवाले गैंगवार, क़त्ल, जेल-बेक की कोशिशें, नशे की खेप की बरामदगी और भ्रष्टाचार की तस्वीरें इस बात का सबूत हैं. तिहाड़ के बारे में ये कहा जाता है कि ये जेल एक ऐसी जगह बन चुकी है, जहां कोई शरीफ आदमी भी अंदर जाकर बदमाश बन जाता है. सच्चाई यही है कि इस जेल से ही अपराधी खुलेआम अपना क्राइम सिंडिकेट चला रहे हैं. रुपयों के दम पर यहां हर वो चीज़ मिलती है, जिसकी आप ख्वाहिश कर सकते हैं. लेकिन सवाल वही है कि आखिर क्यों है तिहाड़ जेल ऐसा?
टिल्लू की हत्या पहला मामला नहीं
मंगलवार को तिहाड़ में हुए गैंगस्टर टिल्लू ताजपुरिया का कत्ल अपने तरह का कोई अकेला मामला नहीं है. बल्कि साल दर साल यहां ऐसी वारदातें होती रही हैं. टिल्लू का कत्ल पिछले 19 दिनों में तिहाड़ जेल में हुआ दूसरी ऐसी वारदात है, जब कैदियों ने गैंगवार में किसी की जान ली है. अब से चंद रोज पहले तिहाड़ के अंदर ऐसे ही प्रिंस तेवतिया की जान ले ली गई थी.
जेल में कभी भी हो सकती है गैंगवार
असल में तिहाड़ में दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के अलग-अलग गैंग एक-दूसरे के साथ गठजोड़ बना कर क्राइम सिंडिकेट की तरह काम कर रहे हैं और अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से ये सारे के सारे गैंग एक-दूसरे से दुश्मनी रखते हैं और इनमें से ज्यादातर गैंग्स के या तो गुर्गे या फिर सरगना अब भी तिहाड़ जेल में बंद हैं. ऐसे में जेल के अंदर कभी भी फिर से गैंगवार हो सकती है.
जेल में दो गुटों के बीच होता रहा है टकराव
दिल्ली पुलिस कि रिकॉर्ड के मुताबिक इनमें जहां एक तरफ लॉरेंस बिश्नोई गैंग, काला जठेड़ी गैंग, जितेंद्र गोगी गैंग, राजस्थान का आनंदपाल गैंग और सुब्बे गुर्जर गैंग का एक सिंडिकेट है. वहीं दूसरी ओर देवेंद्र बंबीहा गैंग, नीरज बवानिया गैंग, टिल्लू ताजपुरिया गैंग, संदीप ढिल्लू गैंग और हरियाणा का कौशल जाट गैंग एकजुट होकर मोर्चा लिए खड़ा हैं. ये सारे के सारे गैंग अक्सर एक दूसरे को चुनौती देते रहते हैं और एक दूसरे से खून के प्यासे हैं. इन्हीं गैंग्स के गुर्गे दशकों से तिहाड़ जेल में एक दूसरे से टकराते और उनकी जान लेते रहे हैं. जेल के बाहर और जेल के अंदर शह मात का सिलसिला जारी है.
कई सरगना जेल में, कई सरहद पार
खास बात ये है कि इन गैंग के ज्यादातर सरगना अभी जेल में बंद हैं. हालांकि आनंदपाल गैंग की कमान संभालनेवाली लेडी डॉन अनुराधा जमानत पर बाहर है और वो गैंगस्टर काला जठेड़ी से शादी कर चुकी है. उधर, गैंगस्टर देवेंद्र बंबिहा एनकाउंटर में मारा जा चुका है, लेकिन अजरबैजान में बैठा लकी पटियाल वहीं से बैठे-बैठे उसका गैंग चलाता है. कुख्यात बदमाश लॉरेंस बिश्नोई भी जेल में है, वो जेल से ही ऑपरेट करता है. उसका गैंग कनाडा में बैठा गोल्डी बराड़ और अमेरिका में बैठा उसका भाई अनमोल बिश्नोई चलाता है.
एनआईए के रडार पर हैं कई गैंगस्टर
नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी यानी NIA ने कुछ महीने पहले दिल्ली के गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और नीरज बवाना समेत दस गैंगस्टरों का एक डॉजियर तैयार किया था. साथ ही एनआईए ने इनके खिलाफ केस भी दर्ज किए थे, क्योंकि इन गैंग्स ने अब आम लोगों के लिए खतरा बनने के साथ-साथ देश के दुश्मनों यानी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और आतंकी संगठनों से भी हाथ मिलाना शुरू कर दिया है, जिसके बाद एनआईए इन्हें लेकर सख्त हो गई है.
(साथ में मनीष झा का इनपुट)