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उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर बबलू श्रीवास्तव की रिहाई पर SC ने UP सरकार को दिया ये निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को 1993 के हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे गैंगस्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ ​​बबलू श्रीवास्तव की समयपूर्व रिहाई पर दो महीने के भीतर विचार करने का निर्देश दिया है.

​​बबलू श्रीवास्तव की समयपूर्व रिहाई पर दो महीने के भीतर विचार करने का निर्देश. ​​बबलू श्रीवास्तव की समयपूर्व रिहाई पर दो महीने के भीतर विचार करने का निर्देश.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 5:14 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे गैंगस्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ ​​बबलू श्रीवास्तव की समयपूर्व रिहाई पर 2 महीने के भीतर विचार करने का निर्देश दिया है. जस्टिस अभय एस ओका और नोंग्मीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने राज्य सरकार को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 473 की उपधारा (1) के तहत छूट की मांग करने वाली याचिका पर विचार करने का निर्देश दिया है.

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गैंगस्टर बबलू श्रीवास्तव ने संयुक्त प्रांत परिवीक्षा पर कैदियों की रिहाई अधिनियम 1938 की धारा 2 के तहत राहत मांगी, लेकिन याचिका खारिज कर दी गई. कोर्ट ने कहा कि धारा 2 सीआरपीसी की धारा 432 या बीएनएसएस की धारा 473 से अधिक कठोर है. राज्य सरकार जबतक यह नहीं कर तय कर लेती कि वो दोषी के जेल में आचरण से संतुष्ट है. इसके साथ ही वो रिहाई के बाद अपराध से दूर रहेगा और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करेगा, तब तक रिहा नहीं किया जा सकता.

कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने 28 साल से अधिक समय तक वास्तविक सजा काटी है, इसलिए उसके मामले पर विचार किया जाएगा और अधिकतम दो महीने के भीतर उचित आदेश पारित किया जाएगा. ये आदेश उसको सूचित किया जाना चाहिए. पीठ ने कहा, "हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता के मामले को 10 दिनों की अवधि के भीतर केंद्र सरकार की सहमति के लिए तुरंत अग्रेषित करे. इस पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाएगा.''

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बबलू श्रीवास्तव वर्तमान में बरेली सेंट्रल जेल में बंद है. उसने अपनी समयपूर्व रिहाई पर निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. कभी अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का सहयोगी रहा बबलू बाद में उसका दुश्मन बन गया. उस पर हत्या और अपहरण समेत 42 मामले दर्ज रहे हैं. उसको सिंगापुर में गिरफ्तार किया गया था. 1995 में उसे भारत प्रत्यर्पित किया गया था. 30 सितंबर, 2008 को उसको कानपुर की एक विशेष टाडा अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

साल 1993 में उसने इलाहाबाद में सीमा शुल्क अधिकारी एल डी अरोड़ा की हत्या कराई थी. इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. शुरुआत में उसे प्रयागराज के नैनी सेंट्रल जेल में रखा गया, लेकिन 11 जून 1999 को उसे बरेली सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया. सजा के खिलाफ उसकी अपील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. उसने तर्क दिया कि 26 साल से अधिक जेल में बिता चुका है. उसका आचरण अच्छा रहा है. इसलिए रिहा किया जाना चाहिए.

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