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गुजरात दंगा: ब्रिटिश नागरिकों की हत्या के मामले में 6 लोग बरी, हाईकोर्ट ने दिया सबूतों के अभाव का हवाला

Gujarat Riots: गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद साल 2002 में भड़के गुजरात दंगों के दौरान तीन ब्रिटिश नागरिकों की हत्या के मामले में छह लोगों को बरी कर दिया गया है. गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूतों का अभाव है.

 गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा. गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा.
aajtak.in
  • अहमदाबाद,
  • 02 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 4:15 PM IST

गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद साल 2002 में भड़के गुजरात दंगों के दौरान तीन ब्रिटिश नागरिकों की हत्या के मामले में छह लोगों को बरी कर दिया गया है. गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूतों का अभाव है. न्यायमूर्ति ए. वाई कोगजे और समीर जे. दवे की खंडपीठ ने 6 मार्च को यह आदेश पारित किया था, जिसे हाल ही में उपलब्ध कराया गया है.

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गुजरात हाईकोर्ट ने गवाहों और जांच अधिकारी की गवाही पर विचार किया. इस दौरान पाया कि उसे 27 फरवरी, 2015 को हिम्मतनगर में साबरकांठा के प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित फैसले और बरी करने के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है. सत्र न्यायालय ने बचाव पक्ष की इस दलील को स्वीकार करने से पहले सबूतों और प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पर विचार किया था.

कोर्ट ने कहा, "यहां तक ​​कि एफआईआर में भी आरोपी का कोई विवरण नहीं दिया गया था. इसलिए सत्र न्यायालय ने सही निष्कर्ष निकाला है कि इस तरह की पहचान (डॉक) दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं हो सकती है." प्रत्येक आरोपी पर एफएसएल यानी फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री रिपोर्ट का निष्कर्ष उन्हें संदिग्ध होने से मुक्त करता है. इसके साथ ही जांच की शुरुआत एक गुमनाम फैक्स संदेश पर आधारित थी.

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साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर में सत्र न्यायालय द्वारा बरी किए जाने के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा ये बातें कही हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने साल 2002 में भारत आए तीन ब्रिटिश नागरिकों की हत्या के लिए छह लोगों मिथनभाई चंदू उर्फ ​​प्रहलाद पटेल, रमेश पटेल, मनोज पटेल, राजेश पटेल और कलाभाई पटेल के खिलाफ जांच के बाद केस चलाया था.

शिकायतकर्ता इमरान मोहम्मद सलीम दाऊद के अनुसार, 28 फरवरी 2002 को वो और उसके दो चाचा सईद सफीक दाऊद और सकील अब्दुल दाऊद ब्रिटिश नागरिकों के साथ आगरा और जयपुर की यात्रा पूरी करने के बाद कार से वापस आ रहे थे. उसी शाम करीब 6 बजे एक भीड़ ने उनके वाहन को रोक लिया. उन पर हमला कर दिया. वे भागने की कोशिश कर रहे थे, तब भीड़ ने उनके वाहन को आग लगा दी.

इस दौरान ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई. एक शख्स को पुलिस द्वारा बचाए जाने के बाद अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया. शिकायतकर्ता के चाचा सईद सफीक दाऊद और सकील अब्दुल दाऊद की भी मृत्यु हो गई. इसके बाद ब्रिटेन से उनके रिश्तेदारों ने तत्कालीन ब्रिटिश उप उच्चायुक्त और प्रांतिज पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मियों के साथ उस स्थान का दौरा किया, जहां वाहन जलाया गया था. सबूत पाए गए थे.

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मुंबई में ब्रिटिश उप उच्चायुक्त को इन सबूतों को भेजा गया और वहां से हैदराबाद में एक फोरेंसिक लैबोरेट्री में भेजा गया. 24 मार्च, 2002 को तत्कालीन ब्रिटिश उप उच्चायुक्त को प्राप्त एक गुमनाम फैक्स में प्रवीणभाई जीवाभाई पटेल नामक व्यक्ति का नाम भीड़ में शामिल बताया गया था, जिस पर शिकायतकर्ता के चाचाओं की हत्या का आरोप लगा. तत्कालीन ब्रिटिश उप उच्चायुक्त ने गुजरात पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखा.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने साल 2003 में गुजरात सरकार को इस मामले सहित साल 2002 के 9 दंगों के मामलों में  एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया था. दिसंबर 2008 में एसआईटी ने अपीलकर्ता का बयान दर्ज किया. साल 2009 में सत्र न्यायालय ने 5 आरोपियों के आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए. इनमें हत्या, जानबूझकर चोट पहुंचाना, दंगा और गैरकानूनी एकत्र होना शामिल है.
 

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