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पुलिस एंड इंटेलिजेंस

पंचकुलाः आईटीबीपी ने 17 श्वानों को दिए भारतीय नाम, गलवान और दोलत भी शामिल

कमलजीत संधू/जितेंद्र बहादुर सिंह
  • 30 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 4:05 PM IST
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हरियाणा के पंचकुला में नेशनल ट्रेनिंग सेंटर फॉर डॉग्स (एनटीसीडी) में आइटीबीपी के 17 श्वानों का विशेष नामकरण समारोह आयोजित किया गया. जिसमें श्वानों को भारतीय नाम दिए गए हैं. जिनमें से अधिकांश नाम लद्दाख के महत्वपूर्ण इलाकों पर आधारित हैं, जहां आइटीबीपी पिछले 6 दशकों से देश की सीमा की सुरक्षा कर रही है.

रिपोर्ट- कमलजीत संधू / जितेंद्र बहादुर सिंह

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पंचकुला के भानु इलाके में नेशनल ट्रेनिंग सेंटर फॉर डॉग्स (एनटीसीडी) में नामकरण परेड के दौरान पुरानी परंपरा पर आधारित पाश्चात्य नामों को दरकिनार करते हुए भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने पहली बार अपने पप्स को देसी नाम देने का प्रचलन शुरू किया है. किसी भी सशस्त्र बल में ऐसा पहली बार किया गया है. आईटीबीपी में के9 विंग के इन श्वानों को एक नामकरण समारोह में नामित करके इन्हें देश की सुरक्षा में लगे जवानों को समर्पित किया है, जो बहुत मुश्किल हालात में भी देश की सुरक्षा कर रहे हैं. 

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इन सभी श्वानों का जन्म करीब 2 महीने पहले हुआ था. इन योद्धा मैलिनोईस श्वानों के पिता का नाम गाला और माताओं के नाम ओलगा और ओलिशिया हैं. वो दोनों बहने हैं. इन श्वानों के नए नाम आनेला, गलवान, ससोमा, सिरिजाप, चिपचाप, सासेर, चार्डिंग, रेजांग, दौलत, सुल्तान-चुस्कू, इमिस, रांगो, युला, मुखपरी, चुंग थुंग, खार्दुंगी और श्योक रखे गए हैं. 

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के9 के इन श्वान योद्धाओं को 100 फीसदी स्थानीय नाम दिए गए हैं. स्वतंत्रता के बाद पहली बार आईटीबीपी में के9 विंग के श्वानों को देसी विरासत और नामों से जाना जाएगा. इससे पहले श्वानों के परंपरागत पाश्चात्य नाम जैसे सीजर, ओलगा, एलिजाबेथ, बेट्टी, लीजा आदि होते थे. लेकिन अब आईटीबीपी के डॉग हैंडलर गर्व से अपने श्वानों को उनके देसी नाम से पुकारेंगे. 

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भारत-तिब्बत सीमा पर आइटीबीपी की तैनाती होती है और बहुत ही कठिन परिस्थितियों में बल के हिमवीर अपनी ड्यूटी करते हैं. वहीं इन श्वानों को भेजा जाएगा. आईटीबीपी ने ये योजना भी बनाई है कि अब से नवजात श्वानों का नामकरण इसी प्रकार सीमा पर स्थित इलाकों के नामों पर किया जाएगा. 
 

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नक्सल रोधी अभियानों में आईटीबीपी ने पहली बार एक दशक पूर्व मैलिनोईस श्वानों को तैनात किया था और अब सुरक्षा बलों में इन श्वानों की बढ़ती मांग को देखते हुए आईटीबीपी ने इन श्वानों की वैज्ञानिक पद्धति से ब्रीडिंग भी प्रारंभ कर दी है. कई अन्य सुरक्षा बलों ने आईटीबीपी से इन श्वानों की उपलब्ध कराने के लिए अनुरोध किया है. बताते चलें कि 1962 में भारत-चीन सीमा संघर्ष के दौरान गठित आईटीबीपी में फिलहाल लगभग 90000 जवान हैं, सीमा सुरक्षा के अलावा आईटीबीपी कई अन्य सुरक्षा कर्तव्यों में तैनात है.
 

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