
Indian Penal Code: भारतीय दंड संहिता में ऐसे अधिकारियों को लेकर भी प्रावधान मौजूद हैं, जो खुद भी किसी ना किसी तरह से जुर्म के भागीदार बन जाते हैं. आईपीसी की धारा 129 में ऐसे ही लोक सेवक के बारे में प्रावधान किया गया है, जो लापरवाही से युद्धकैदी का निकल भागना सहन करता है. चलिए जान लेते हैं कि IPC की धारा 129 इस तरह के अधिकारी के विषय में क्या कहती है?
आईपीसी की धारा 129 (Indian Penal Code Section 129)
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 129 (Section 129) में उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना बताया गया है, जो युद्धबंदी या राजकैदी हो. IPC की धारा 129 के अनुसार, जो कोई लोक सेवक (Public Servant) होते हुए और किसी राजकैदी या युद्धकैदी (War prisoner) को अभिरक्षा में रखते हुए उपेक्षा (Ignore) से ऐसे कैदी का किसी ऐसे परिरोध स्थान (Confinement space) से जिसमें ऐसा कैदी परिरुद्ध (Confined) है, निकल भागना सहन (Tolerate) करेगा, वह अपराध का भागीदार (Partner of crime) माना जाएगा.
सजा का प्रावधान (Provision of punishment)
ऐसे करने वाले लोक सेवक को दोषी (Guilty) पाए जाने पर साधारण कारावास (Simple imprisonment) से दंडित किया जाएगा, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकती है. उस पर आर्थिक जुर्माना (Monetary penalty) भी लगाया जाएगा. अगर न्यायलय चाहे तो उसे दोनों प्रकार से दंडित किया जाएगा.
इसे भी पढ़ें--- IPC Section 128: किसी युद्धबंदी को भगाने वाले लोक सेवक पर लागू होती है ये धारा
क्या होती है आईपीसी (IPC)
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.
अंग्रेजों ने लागू की थी IPC
ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.
ये भी पढ़ेंः