
करगिल एयरपोर्ट पर पहली बार रात में भारतीय वायुसेना के विशालकाय C-130J Super Hercules विमान को लैंड कराया गया है. अब तक दिन में ही इस विमान की लैंडिंग 9604 फीट ऊंचे एयरस्ट्रिप पर होती थी. लेकिन पहली बार यह वायुसेना के गरुड़ कमांडो (Garud Commando) के साथ करगिल में रात में उतरा.
भारतीय वायुसेना के पास कुल मिलाकर 12 C-130J Super Hercules ट्रांसपोर्ट विमान है. यह एक टैक्टिकल एयरलिफ्टर है. यानी यह 92 यात्री, 64 एयरबॉर्न ट्रूप्स, 72 मरीज या 42 हजार किलोग्राम वजन का सामान उठा सकता है. चार इंजन वाले इस एयरक्राफ्ट को तीन लोग मिलकर उड़ाते हैं. दो पायलट और एक लोडमास्टर.
करगिल में रात में उतरते समय नाइट विजन कैमरों और यंत्रों का इस्तेमाल किया गया. जिसमें गरुड़ कमांडो बैठे थे. भारतीय वायुसेना ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि इन कमांडो की संख्या कितनी थी. या ये वहां किसलिए गए हैं. लेकिन इतना जरूर कहा कि ये कमांडो एक ट्रेनिंग के लिए करगिल पहुंचे हैं.
रेंज, गति और ताकत... हर चीज में बेहतर है यह विमान
97.9 फीट लंबे और 38.10 फीट ऊंचे विमान की अधिकतम गति 670 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है. सामान्य तौर पर 644 km/hr की स्पीड में उड़ता है. अधिकतम रेंज 3300 किलोमीटर है. ज्यादा से ज्यादा 22 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकता है. एक बात तो तय है कि अगर रात में यह विमान करगिल उतर सकता है, तो चीन और पाकिस्तान से सटी सीमा पर 24 घंटे एयर मिशन संभव है.
अब बात करते हैं गरुड़ कमांडो की...
गरुड़ कमांडो इंडियन एयरफोर्स की स्पेशल घातक फोर्स है. इस फोर्स को फरवरी 2004 में बनाया गया था. इनका मुख्य काम एयर असॉल्ट, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, क्लोज प्रोटेक्शन, सर्च एंड रेसक्यू, आतंकरोधी अभियान, डायरेक्ट एक्शन, एयरफील्ड्स की सुरक्षा आदि.
भारत में जितने भी कमांडो फोर्स हैं, उनमें सबसे ज्यादा लंबी ट्रेनिंग इनकी होती है. ये 72 हफ्तों की ट्रेनिंग करते हैं. गरुड़ कमांडो रात में हवा और पानी में मार करने के लिए एक्सपर्ट होते हैं. हवाई हमले के लिए इन्हें अलग से ट्रेनिंग दी जाती है. फिलहाल इस फोर्स में 1780 गरुड़ कमांडो हैं.
30% ट्रेनी शुरुआती तीन महीनों में छोड़ देते हैं ट्रेनिंग
इस समय आतंकवाद के खात्मे और सरहद पर दुश्मनों से सीधे मुकाबले के लिए वायुसेना के गरुड़ कमांडो को नई ट्रेनिंग भी दी जा रही है. तीन साल की ट्रेनिंग के बाद ही एक गरुड़ कमांडो पूरी तरह ऑपरेशनल कमांडो बनता है. ट्रेनिंग इतनी सख्त होती है कि ट्रेनिंग लेने वालों में से 30 फीसदी ट्रेनी शुरुआती 3 महीनों में ही ट्रेनिंग छोड़ देते हैं.
गरुड़ कमांडो दुश्मन के बीच पहुंचकर चारों तरफ से दुश्मन से मुकाबला करते हैं. गरुड़ कमांडो कई तरह के हथियार चलाने में माहिर होते हैं. इनमें एके 47, आधुनिक एके-103, सिगसोर, तवोर असाल्ट राइफल, आधुनिक निगेव LMG और एक किलोमीटर तक दुश्मन का सफाया करने वाली गलील स्नाइपर शामिल हैं. निगेव एलएमजी से एक बार में 150 राउंड फायर किए जा सकते हैं. तवोर असाल्ट राइफल जैसे आधुनिक हथियारों के साथ साथ गरुड़ कमांडो नाइट विजन, स्मोक ग्रेनेड, हैंड ग्रेनेड आदि भी इस्तेमाल करते हैं.
आतंकवादी हों या जंगल वॉरफेयर... हर युद्ध के लिए दक्ष
आतंकियों से मुकाबले के वक्त रूम इंटरवेंशन की कार्रवाई के दौरान गरुड़ कमांडो घर के अंदर घुसकर आतंकियों का सफाया करते हैं. शहरी क्षेत्रों में ऐसे ऑपरेशन के लिए गरुड़ कमांडो हेलीकॉप्टर से उतरते हैं. इसके लिए इन्हें मिजोरम में काउंटर इन्सर्जन्सी एंड जंगल वारफेयर स्कूल में प्रशिक्षित किया जाता है.
गरुड़ कमांडो को हर तरह से युद्ध के लिए तैयार बनाने के लिए ट्रेनिंग के अंतिम दौर में इन्हें भारतीय सेना के पैरा कमांडो की सक्रिय यूनिट्स के साथ फर्स्ट हैंड बारीकियों को सिखाया जाता है. आमतौर पर इन्हें वायुसेना के अहम ठिकानों की सुरक्षा का जिम्मा दिया जाता है. जहां पर सुरक्षा के हिसाब से जरूरी यंत्र लगे होते हैं.
बता दें कि 2001 में जम्मू-कश्मीर में एयरबेस पर आतंकियों के हमले के बाद वायु सेना को एक विशेष फोर्स की जरूरत महसूस हुई. इसके बाद 2004 में एयरफोर्स ने अपने एयर बेस की सुरक्षा के लिए गरुड़ कमांडो फोर्स की स्थापना की. पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले के वक्त भी आतंकियों से पहला मुकाबला गरुड़ कमांडोज ने किया था.