
चीन के साथ 1962 की जंग में भारत को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा. लद्दाख के अक्साई चिन का एक बड़ा हिस्सा छिन गया. 62 साल बाद भी भारतीय सेना और चीन की PLA लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गतिरोध में फंसे हुए हैं. 2020 से संघर्ष काफी ज्यादा बढ़ गया. दोनों पक्षों के बीच दर्जनों दौर बातचीत हुई.
नतीजा ये निकला की गलवान और पैंगॉन्ग में बफर जोन बने. सैनिकों को अपनी सीमा में वापस बुलाया जाए. लेकिन चीन अप्रैल 2020 की स्थिति में वापस लौटने को तैयार नहीं था. बफर ज़ोन में भारतीय इलाके से बड़े पैमाने पर जमीन काटी गई है. उत्तरी लद्दाख के उत्तर में देपसांग प्लेन और दक्षिण में देमचोक. यहां पर सैनिक पेट्रोलिंग करेंगे.
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भारत और चीन के बीच सीमा बरसों से विवाद है. पूरा हिस्सा विवादित है. दोनों देश सीमा के निर्धारण पर सहमत नहीं हैं. चीन ज्यादातर भारतीय इलाकों पर अपना दावा करता है. चीन भारत के पूर्वोत्तर में 90,000 वर्ग km क्षेत्र पर दावा करता है, जिसे वह दक्षिण तिब्बत कहता है. यह अरुणाचल प्रदेश के पास का इलाका है.
क्या होते हैं बफर जोन?
सीमा विवाद में लगभग चार साल से गतिरोध बना हुआ है. बफर ज़ोन बनाने से तनाव कम हुआ है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच तनाव बना हुआ है. दोनों पक्ष अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं. नए हथियार तैनात कर रहे हैं. इस गतिरोध को सुलझाने के प्रयासों के बावजूद, सीमा युद्ध की संभावना अब भी बनी है. बफर जोन असल में सीमा के पास के वो इलाके हैं, जहां पर पहले विवाद हो चुके हैं. संघर्ष हुआ है. उसे रोकने के लिए उसे बफर जोन कहते हैं. दोनों देशों के सैनिक बफर जोन के अपने-अपने साइड में पेट्रोलिंग करते हैं. गलवान में यह 3 किलोमीटर लंबा है. जबकि पैंगॉन्ग में 10 किलोमीटर. डेपसांग में 14 से 19 किलोमीटर लंबा है.
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1962 से लेकर अब तक...
भारत 1962 के युद्ध में चीन को खोए 38,000 वर्ग km क्षेत्र के अलावा, जम्मू-कश्मीर के शाक्सगाम घाटी में 5,300 वर्ग km क्षेत्र पर दावा करता है, जिस पर पाकिस्तान ने 1947-48 में कब्जा किया था. 1963 में चीन को सौंप दिया था. 1962 के युद्ध के बाद, भारत और चीन के बीच कई जगहों पर टकराव हुए - नाथू ला और चो ला (1967), तुलुंग ला (1975) और सुमदोरोंग चू (1986-1987). इसके बावजूद, 1990 के दशक से 2000 के मध्य तक वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास की स्थिति शांत थी.
ये शांति-समझौते भी हुए...
1993 में शांति और शांति बनाए रखने के समझौते. 1996 में सैन्य विश्वास-निर्माण उपाय. 2005 में सीमा लिए राजनीतिक मानक और मार्गदर्शक सिद्धांत और 2013 में सीमा रक्षा सहयोग. इन समझौतों ने LAC पर शांति बनाए रखने में मदद की. लेकिन 2013-2014 में यह बदलना शुरू हुआ. चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की. अप्रैल-मई 2013 में चीनी सैनिक डेपसांग घाटी में 19 km तक घुस गए. 21 दिनों तक गतिरोध बना रहा.
क्या है नया समझौता...
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है. जिसमें दोनों देशों ने लद्दाख के डेपसांग मैदान और डेमचोक में गश्तीकी बहाली पर सहमति व्यक्त की है. इसके तहत, भारतीय सेना अपनी सीमा के साथ गश्त करेगी. ऐसा ही 2020 से पहले था. यानी दो महीने में दो बार पेट्रोलिंग होगी.
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इस समझौते के मुख्य बिंदु
- डेपसांग मैदान और डेमचोक में गश्ती की बहाली.
- भारतीय सेना की गश्त अपनी सीमा के साथ. 2020 से पहले की स्थिति में.
- दो महीने में दो बार गश्त की आवृत्ति.
- गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो में स्थिति यथावत रहेगी.
- पूर्वी थिएटर में अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील क्षेत्रों में भी समझौता हुआ है
यह समझौता भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को कम करने में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन अब भी कई चुनौतियां हैं, जिन्हें दोनों देशों को सुलझाना होगा. सामान्य तौर पर गश्ती के समय 13 से 18 जवान रहते हैं. लेकिन टकराव को रोकने के लिए अब 14-15 जवान ही गश्ती करेंगे.
दोनों पक्ष अपने गश्त कार्यक्रमों का आदान-प्रदान करेंगे और यदि कोई तारीख या समय टकराव होता है, तो उसे आपसी सहमति से बदला जाएगा. सूत्रों का कहना है कि गश्त दोनों पक्षों के बीच अच्छी तरह से कॉर्डिनेटेड होगी और. वे एक दूसरे को सूचित करेंगे. यह समझौता भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को कम करने में एक महत्वपूर्ण कदम है.