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Chandra Shekhar Azad Jayanti: भगत सिंह से दोस्ती के बाद अंडा खाना सीखा, साधु बनकर जंगल में रहे... चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े अनसुने किस्से

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश की छोटी-सी रियासत अलीराजपुर के भंवरा गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी व माता का नाम जगरानी देवी था. आज चंद्रशेखर आज़ाद की जयंती पर हम आपको उनके जीवन के अनसुने किस्सों के बारे में बताने जा रहे हैं.

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ था चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ था
स्वराज श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 23 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 2:27 PM IST

एक गुरुजी अपने दो छात्रों को होम ट्यूशन दे रहे थे. गुरुजी पढ़ाते वक्त हमेशा अपने साथ एक छड़ी रखा करते थे. एक दिन जाने क्या सूझी, उन्होंने दोनों बच्चों को पढ़ाते समय जानबूझकर एक शब्द गलत बोल दिया. तभी उनमें से एक छात्र ने छड़ी उठाई और गुरुजी को दो छड़ी जमा दी. इतना होते ही घर में हंगामा मच गया. बच्चे के पिता गुस्से में आए और उसे मारने ही वाले थे कि गुरुजी ने रोक दिया. अध्यापक ने बच्चे से पूछा कि तुमने आखिर ऐसा क्यों किया? बच्चा बोला- 'गुरुजी आप हमारी गलती पर हमें मारते हैं इसलिए आपकी गलती पर मैंने आपको मार दिया. क्योंकि न्याय तो सबके लिए एकसमान होना चाहिए.'

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शायद आपको ये कहानी पढ़कर ज्यादा कुछ समझ न आया हो लेकिन अगली कहानी जो हम आपको बताने जा रहे हैं, उसे पढ़ते ही आप इस बच्चे का नाम तपाक से बता देंगे.

दरअसल, कहानी ऐसी है कि गुरुजी की गलती पर उन्हें दो डंडे जमा देने वाला ये बच्चा जब कुछ बरस बाद अदालत के कठघरे में खड़ा हुआ तो जज ने उसका नाम पूछा.
लड़के ने उत्तर दिया- 'आज़ाद'
'तुम्हारे पिता का नाम?'
'स्वाधीनता'
'तुम्हारा घर कहां है?'
'जेलखाना'

जी हां, बिल्कुल सही समझा आपने. ये कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद की है. 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भंवरा गांव में जन्मे चंद्रशेखर आज़ाद अपने माता-पिता के लाडले थे. उनके पिता सीताराम तिवारी नौकरी से रिटायर होकर 8 रुपये की मासिक तनख्वाह पर उद्यानों के सुपरिन्टेन्डेन्ट नियुक्त हुए थे.
इसी गांव के एक विद्यालय में पढ़ते हुए आज़ाद ने भील लड़कों के साथ तीर-धनुष चलाना सीखा. लेकिन जल्द ही तीर-कमान की जगह पिस्तौल ने ले ली.

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मास्टर रुद्रनारायण सिंह की पत्नी के साथ चंद्रशेखर आज़ाद

अहिंसा से मोहभंग और क्रांति का मार्ग

एक बार अदालत वाली कहानी पर वापस लौटते हैं. चंद्रशेखर आज़ाद के जवाब से जज इतना आगबबूला हुआ कि उसने उन्हें 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई. शुरुआती दस कोड़े तक तो आज़ाद वंदे मातरम चिल्लाते रहे, लेकिन जैसे ही 11वीं बार बेंत उनके पीठ पर पड़ी, उनके मुंह से निकला- 'महात्मा गांधी की जय'

लेकिन महात्मा गांधी की जयकार करने वाले आज़ाद ने जल्द ही गांधी का दिखाया मार्ग छोड़ दिया. कुछ ही समय बाद चंद्रशेखर आज़ाद को समझ आ गया कि अहिंसा के मार्ग से स्वतंत्रता नहीं मिल सकती. इस बीच, उत्तर प्रदेश में काशी विद्यापीठ क्रांतिकारियों का गढ़ बना हुआ था. इस दल के नेता रामप्रसाद बिस्मिल थे. लिहाजा आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गए.

भेष बदलने में माहिर थे आज़ाद

चंद्रशेखर आज़ाद के साथी रहे नंदकिशोर निगम अपनी किताब 'बलिदान' में लिखते हैं-
'क्रांति के लिए धन की आवश्यकता थी. इसलिए बिस्मिल ने आज़ाद को साधुओं के एक मठ में शिष्य बनाकर भेजा. इसके पीछे उद्देश्य था कि गुरु के मरने के पश्चात शिष्य बने आज़ाद गद्दी पर बैठ जाएंगे और मठ के धन का उपयोग क्रांति के कामों में किया जाएगा. आज़ाद ने इसके लिए अपना सिर मुंडवा कर गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया और गुरु के मरने का इंतजार होने लगा. धीरे-धीरे समय बीतता गया लेकिन गुरु को कुछ ना हुआ. प्लान फेल होता देख बिस्मिल ने आज़ाद को वापस बुला लिया. उसके बाद धन एकत्रित करने के लिए दूसरा उपाय सोचा जाने लगा और फिर काकोरी की घटना को अंजाम देने पर सहमति बनी.'

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रामप्रसाद बिस्मिल को विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि लखनऊ से एक ट्रेन में लगभग 30 हजार रुपये दूसरे स्टेशनों पर बांटने के लिए ले जाए जाते हैं. इस सरकारी राशि को लूटने की योजना पर काम शुरू हो गया. आज़ाद को जिम्मेदारी मिली कि लूट के बाद रुपये को सुरक्षित लखनऊ तक पहुंचाना. प्लान के मुताबिक काकोरी स्टेशन से कुछ दूरी पर जंजीर खींचकर ट्रेन को रोका गया. फिर उस रकम को जंगल के रास्ते लखनऊ पहुंचाया गया.

इस घटना को याद करते हुए मन्मथनाथ गुप्त अपनी किताब 'आधी रात के अतिथि' में लिखा-
'मैं और आज़ाद लखनऊ शहर में दाखिल हुए. चौक पहुंचने से पहले रुपयों की गठरी बिस्मिल के हवाले कर दी गई. हम दोनों को लखनऊ की कोई खास जानकारी नहीं थी. तभी आज़ाद ने कहा कि क्यों न एक पार्क में सो जाएं. थोड़ी नींद लेकर हम उठे और जैसे ही बाहर निकले, एक अखबार बेचने वाले की आवाज सुनाई दी- काकोरी में ट्रेन डकैती'

काकोरी की घटना के बाद इसमें शामिल क्रांतिकारियों की धरपकड़ तेज हो गई. लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद को पकड़ना अंग्रेजों के बस के बाहर था. वह हर बार पुलिस को चकमा देकर बच निकलते थे. इसकी एक खास वजह थी. आज़ाद हर थोड़े समय के बाद अपनी रहने की जगह बदल देते थे और भेष बदलने में वह माहिर थे ही. इसी क्रम में वह पहले बनारस, फिर प्रयागराज और अंत में झांसी जा पहुंचे. इसके कुछ दिन बाद ही वह झांसी से भी निकल गए और साधु का भेष बनाकर कुछ दिन के लिए आदिवासियों के साथ जंगल में रहने लगे.

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9 अगस्त 1924 को काकोरी कांड को दिया गया था अंजाम

उधार चुकाने के लिए जौहरी को लूटा

चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने एक मित्र से 6 महीने में वापसी का वादा कर 4 हजार रुपये उधार लिए थे. इस बात को अभी 3 महीने ही बीते थे कि एक दिन वह मित्र सुबह-सुबह आज़ाद के पास पहुंच गया और रुपये वापस मांगे. दरअसल, आज़ाद के उस दोस्त ने भी किसी दूसरे से मांगकर ही पैसे दिए थे. अब वह शख्स रुपये वापसी का दबाव बना रहा था. आज़ाद ने थोड़ा सोचकर कहा- 'ठीक है, तुम्हें शाम तक रुपये मिल जाएंगे.'
दोपहर के करीब दो बज रहे होंगे. दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में लोगों की भीड़ जुटी थी. तभी एक जौहरी की दुकान पर एक युवक पहुंचा. देखते ही देखते उस युवक ने जौहरी के माथे पर अपनी पिस्तौल सटा दी. उसके कुछ और साथी भी असलहा लेकर दुकान में पहुंच गए.
दुकान से 14 हजार रुपये की लूट हो चुकी थी. जाते हुए युवक ने कहा-  'सेठ , हमें देश के लिए कुछ पैसों की आवश्यकता है, इसलिए ले जा रहे हैं.' शाम को जब आज़ाद अपने दोस्त को 4 हजार रुपये लौटाने पहुंचे, तब तक उसे लूट की जानकारी हो चुकी थी.

उनके दोस्त ने कहा- 'आज़ाद रुपये हासिल करने का ये कोई तरीका नहीं हुआ.'
आज़ाद ने समझाते हुए कहा-  'ये पूँजीपति गरीब व मजलूम लोगों का खून चूसकर रुपया कमाते हैं.  ऐसे में अगर यह रुपया देश के काम आ जाए तो कोई गुनाह तो नहीं हो जाएगा'

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शाकाहारी होकर भी खाने लगे अंडा

चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह बहुत अच्छे दोस्त थे. आज़ाद ब्राह्मण परिवार से आते थे. अपनी जिंदगी में उन्होंने रहने के कई स्थान बदले, लेकिन वह पक्के शाकाहारी थे. हालांकि भगत सिंह से दोस्ती के बाद उन्होंने अंडा खाना शुरू कर दिया था.
एक बार आज़ाद के साथी भगवानदास माहौर ने उन्हें अंडा खाते देखा तो टोक दिया. इस पर आज़ाद ने कहा कि 'अंडे में कोई हर्ज है क्या. वैज्ञानिकों ने इसे फल जैसा बताया है.'
माहौर ठहाका मारकर हंसे. वह जानते थे कि अंडे को फल बताने वाला तर्क भगत सिंह का ही है, तभी वहां भगत सिंह भी पहुंच गए. माहौर और भगत सिंह ने चंद्रशेखर आज़ाद से मजाक किया तो आज़ाद बोले- 'एक तो अंडा खिला रहा है, ऊपर से बातें बना रहा है.'

(फाइल फोटो)

कभी जिंदा नहीं पकड़े गए चंद्रशेखर आज़ाद

आज़ाद की ये प्रतिज्ञा थी कि वह कभी भी जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे. स्वतंत्रता सेनानी सुशीला मोहन लिखती हैं- 'एक बार हमारे एक साथी ने आज़ाद भैया से मजाक में कह दिया कि वह मोटे होते जा रहे हैं, इसलिए सरकार को उन्हें पकड़ने के लिए विशेष हथकड़ी तैयार करनी पड़ेगी. इतने पर आज़ाद का चेहरा लाल हो गया. उन्होंने तुरंत कहा- मेरी कलाई में हथकड़ी लगाना असंभव है. मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे लेकिन मेरे जीवित रहते पुलिस मुझे नहीं पकड़ पाएगी.'
हुआ भी बिल्कुल ऐसा ही. एक दिन आज़ाद अपने एक साथी से मिलने प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पहुंचे. तभी किसी ने पुलिस को इसकी सूचना दे दी. थोड़ी देर बाद पार्क के बाहर एक गाड़ी आकर रुकी. उसमें से एक अंग्रेज अफसर निकलकर आज़ाद के पास आया और पूछा- 'कौन हो तुम लोग?'
आज़ाद ने जवाब देने की बजाय पिस्तौल निकाल कर उस पर गोली चला दी. हालांकि वह अफसर भी पहले से तैयार था. उसने भी गोली चलाई जो सीधा आज़ाद की जांघ पर लगी. आज़ाद ने अपने साथी को वहां से सुरक्षित निकाल दिया और अकेले पुलिस का मुकाबला करने लगे. दोनों तरफ से दनादन गोलियां चल रही थी. थोड़ी देर बाद आज़ाद पीठ के बल गिर गए. अंग्रेज अफसर आज़ाद से इतना खौफ खाते थे कि उनके मरने के बाद भी काफी देर तक वह उसके करीब जाने से घबरा रहे थे. ये जांचने के लिए उन्होंने आज़ाद के पैर पर गोली चलाई और फिर पक्का करने के बाद ही करीब आए.

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आज़ाद की शहादत के बाद उनकी अस्थियां लकड़ी के तख्त पर रखकर पूरे शहर में घुमाई गईं. लोगों ने अस्थियों पर फूल बरसाए. उस दिन पूरे शहर में हड़ताल रही. आज़ाद का निशाना इतना तगड़ा था कि अंग्रेज अफसर भी उनका लोहा मानते थे. विश्वनाथ वैशम्पायन ने अपनी किताब 'अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद' में लिखा है-
'सीआई़डी सुपरीटेंडेंट ने स्वीकार किया कि उन्होंने आज़ाद जैसे निशानेबाज बहुत कम देखे हैं. यदि पहली गोली आज़ाद की जांघ ने न लगी होती तो पुलिस के लिए बहुत मुश्किल खड़ी हो जाती.'

चंद्रशेखर आज़ाद की अंतिम तस्वीर

आज़ाद की पिस्तौल लेकर चला गया अंग्रेज अफसर

अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद पर गोली चलाने वाले अफसर नॉट बॉवर की रिटायरमेंट के बाद सरकार ने उसे आज़ाद की पिस्टल गिफ्ट के तौर पर दे दी और बॉवर उसे लेकर इंग्लैंड चला गया. बाद में लंदन में भारतीय उच्चायोग की कोशिश के बाद ये पिस्टल 1972 में भारत लौटी और इसे पहले लखनऊ और बाद में प्रयागराज के संग्रहालय में रख दिया गया.

 

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