
क्राइम सॉल्विंग की दुनिया में जब भी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की बात होती है, तो डीएनए, फिंगरप्रिंट और साइबर फॉरेंसिक्स सबसे पहले जेहन में आते हैं. लेकिन एक ऐसी तकनीक भी है, जो धीरे-धीरे पुलिस और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स के लिए बेहद अहम बनती जा रही है, वो है इयर प्रिंट फॉरेंसिक्स. दिल्ली यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता लोकेश चुग के नेतृत्व में हुए शोध में साबित हुआ कि इंसान के कान का प्रिंट भी फिंगरप्रिंट की तरह यूनिक होता है. इस तकनीक ने कई हाई-प्रोफाइल केसों में पुलिस की मदद की है और बड़े क्राइम्स सुलझाने में अहम भूमिका निभाई है.
कैसे काम करता है इयर प्रिंट फॉरेंसिक्स?
जब कोई अपराधी किसी घर या ऑफिस की दीवार, दरवाजे या खिड़की पर कान लगाकर अंदर की हलचल सुनता है तो वह वहां एक इयर प्रिंट छोड़ जाता है. ठीक वैसे ही जैसे फिंगरप्रिंट छूटते हैं. यह प्रिंट ऑयल, पसीने और त्वचा की संरचना की वजह से बनता है. फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स खास कैमिकल्स और हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग टेक्नोलॉजी से इसे कैप्चर करके सॉल्वड केस के डेटा से मिलाते हैं.
दुनिया के वो क्राइम केस, जब 'कान के प्रिंट' बने सबसे बड़ा सबूत
ब्रिटेन का बैंक डकैती केस (2005)
इंग्लैंड के एक बैंक में डकैती हुई लेकिन वहां अपराधियों ने कोई फिंगरप्रिंट नहीं छोड़ा. पुलिस को दरवाजे के पास एक इयर प्रिंट मिला, जिसे स्कैन करके डाटाबेस से मैच किया गया और अपराधी तक पहुंचा गया.
इटली का सीरियल बर्गलर (2018)
इटली में एक चोर लगातार अमीर लोगों की कोठियों में सेंध लगाता था, लेकिन उसके हाथ साफ होने की वजह से कोई फिंगरप्रिंट नहीं मिल रहा था. फिर पुलिस ने घरों की खिड़कियों से इयर प्रिंट इकट्ठा किए और आखिरकार अपराधी को पकड़ लिया गया.
फ्रांस की मर्डर मिस्ट्री (2021)
एक महिला की हत्या के बाद पुलिस को घटनास्थल के पास एक इयर प्रिंट मिला. फिर डीएनए एविडेंस और इयर प्रिंट को मिलाकर क्रिमिनल को ट्रैक किया गया और उसे उम्रकैद की सजा हुई.
क्या है साइबर फॉरेंसिक्स और कान के प्रिंट का कनेक्शन
अब बात आती है टेक्नोलॉजी की तो जब कोई व्यक्ति डिजिटल क्राइम करता है तो वह सिर्फ ऑनलाइन ट्रेल ही नहीं, बल्कि फिजिकल एविडेंस भी छोड़ सकता है. कुछ साइबर क्रिमिनल्स चोरी के प्लान बनाते वक्त जगह-जगह अपने इयर प्रिंट छोड़ देते हैं. ऐसे मामलों में साइबर फॉरेंसिक्स और इयर प्रिंट एनालिसिस मिलकर काम करते हैं.
इयर प्रिंट फॉरेंसिक्स देता है सटीक रिजल्ट
वैज्ञानिक रिसर्च से साबित हुआ है कि हर इंसान का कान अलग होता है, जिससे पहचान की संभावना 100% तक बढ़ जाती है. इसे नॉन-इंट्रूज़िव एविडेंस माना जाता है क्योंकि डीएनए टेस्टिंग में सैंपल की जरूरत होती है, लेकिन इयर प्रिंट बिना किसी सीधा संपर्क लिए लिए जा सकते हैं. इसके अलावा फिंगर प्रिंट की तुलना में इयर प्रिंट में बहुत कम फॉल्स पॉजिटिव केस सामने आते हैं.
अभी सामने हैं ये दो बड़ी चुनौतियां
अभी तक दुनिया में फिंगरप्रिंट की तरह इयर प्रिंट का बड़ा डाटाबेस नहीं बना है.
इयर प्रिंट हर सतह पर क्लियर नहीं बनता, खासकर अगर दीवार चिकनी न हो.
शोध में कैसे हुई पुष्टि
शोधकर्ता लोकेश चुग ने बताया कि मैंने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों और ब्राह्मणों के अलावा दिल्ली के जाटव जाति के 600 लोगों के कान के सैंपल लिए. इसके लिए मैंने ऐसे ही लोगों को चुना जिनके तीन पीढ़ियों की शादी उनके ही समाज में हो रही है. सैंपल हर आयु वर्ग के लोगों के लिए गए. इन सैंपल का अध्ययन करने पर पाया गया कि किसी के कान के प्रिंट दूसरे से नहीं मिलते. बस इसको एनालाइज करने का तरीका थोड़ा टाइम टेकिंग है, इसलिए आज भी कोर्ट में डीएनए को सबूत के तौर पर ज्यादा एडमिसिबल है, लेकिन अगर इसे सही से कैलकुलेट किया जाए तो इसे भी सबूत के तौर पर मान्यता मिली हुई है.
भविष्य में कैसे बदलेगी क्राइम सॉल्विंग
डॉ लोकेश चुग कहते हैं कि फॉरेंसिक साइंस लगातार एडवांस हो रही है और अब कान के प्रिंट को भी उतनी ही अहमियत दी जा रही है, जितनी फिंगरप्रिंट या डीएनए को. लोकेश चुग और उनकी टीम के रिसर्च से यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में पुलिस और जांच एजेंसियां इस तकनीक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करेंगी. भविष्य में अपराधी को उसके इयर प्रिंट के जरिये दबोचा जा सकता है.