
आज के दिन 21 नवंबर 1783 को फ्रांसीसी चिकित्सक जीन-फ्रांकोइस पिलात्रे डे रोजियर और मार्क्विस डी' अर्लैंडेस, फ्रांकोइस लॉरेंट ने पहली बार गर्म हवा के गुब्बारे में बैठकर उड़ान भरी थी. लगभग 25 मिनट तक दोनों पेरिस के ऊपर 5.5 मील तक उड़ते रहे. इस घटना ने इंसानों के उड़ने के सपने को काफी हद तक सच कर दिया था.
इस पहले हॉट एयर बैलून के कपड़े के को फ्रांसीसी कागज बनाने वाले भाइयों जैक्स-एटिने और जोसेफ-मिशेल मोंटगोल्फियर ने तैयार किया था, जो दुनिया के पहले सफल गर्म हवा के गुब्बारे के आविष्कारक थे. काफी पहले से इंसान ने उड़ान भरने के सपने देखते रहे हैं.
हजारों साल से इंसान देखते रहे थे उड़ने का सपना
ग्रीक पौराणिक कथाओं में डेडलस के बारे में बताया गया है, जिसने मोम के पंख बनाए थे और लियोनार्डो दा विंची ने 15वीं शताब्दी में उड़ने वाली मशीनों के डिजाइन बनाए और हेलीकॉप्टर की अवधारणा की कल्पना की. हालांकि, 1780 के दशक तक मानव उड़ान एक वास्तविकता नहीं बन पाई थी.
पेरिस की उड़ान से पहले भी हुए थे कई प्रयोग
पहला सफल उड़ान उपकरण शायद मोंटगोल्फियर गुब्बारा नहीं बल्कि एक 'ऑर्निथॉप्टर' था. एक ग्लाइडर जैसा विमान जिसके पंख फड़फड़ाते थे. एक धुंधले रिकॉर्ड के अनुसार, जर्मन वास्तुकार कार्ल फ्रेडरिक मीरवीन 1781 में ऑर्निथॉप्टर में जमीन से उड़ान भरने में सफल रहे. इस रिकॉर्ड की सत्यता चाहे जो भी हो, मीरवीन की उड़ान मशीन कभी भी उड़ान का एक व्यवहारिक साधन नहीं बन पाई. ये मोंटगोल्फियर भाई ही थे जिन्होंने पहली बार लोगों को आसमान में उड़ाया.
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आग के ऊपर रखे कागज के थैले के उड़ने से मिली प्रेरणा
जोसेफ और एटियेन मोंटगोल्फियर दक्षिणी फ्रांस के विडालोन शहर में कागज का व्यवसाय चलाते थे. उनकी सफलता ने उन्हें वैज्ञानिक प्रयोगों में अपनी रुचि को वित्तपोषित करने की अनुमति दी. 1782 में उन्होंने पाया कि हल्के कागज या कपड़े के थैले के नीचे जलने वाले ज्वलनशील पदार्थ थैले को हवा में ऊपर उठा देते हैं.
दोनों भाईयों ने इंसानों को उड़ाने से पहले किये कई प्रयोग
इस घटना से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि धुआं गुब्बारे को ऊपर उठाता है. वास्तव में यह गर्म हवा थी जो गुब्बारों को ऊपर उठाती है, लेकिन उनकी गलती ने उनकी बाद की उपलब्धियों में बाधा नहीं डाली. 4 जून, 1783 को, भाइयों ने अपनी खोज का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया. भूसे और ऊन को जलाकर एक मानवरहित गुब्बारे को उड़ाया जो 3,000 फीट ऊपर हवा में उठा और फिर लगभग दो मील दूर जाकर ज़मीन पर आ गिरा.
ब्राजील में भी हुई थी गुब्बारे से उड़ने की असफल कोशिश
हॉट-एयर बैलून के अपने परीक्षण में, मोंटगोल्फियर्स से पहले ब्राज़ील के पुजारी बार्टोलोमू लौरेंको डी गुस्माओ ने भाग लिया था, जिन्होंने 1709 में पुर्तगाल के राजा के महल में एक छोटा हॉट-एयर बैलून लॉन्च किया था. हालांकि, मोंटगोल्फियर्स लौरेंको के काम से अनजान थे और जल्दी ही उनसे आगे निकल गए.
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इंसानों से पहले दोनों भाईयों ने जानवरों को गुब्बारे में उड़ाया
19 सितंबर को, मोंटगोल्फियर ने पहली मानवयुक्त उड़ान की प्रस्तावना में अपने एक गुब्बारे में एक भेड़, एक मुर्गा और एक बत्तख को ऊपर भेजा. नीले रंग से रंगा हुआ और सुनहरे फूलों से सजा हुआ गुब्बारा, राजा लुई सोलहवें की मौजूदगी में वर्सेल्स के महल के प्रांगण से ऊपर उठा. खलिहान के जानवर आठ मिनट तक हवा में उड़ते रहे और दो मील दूर सुरक्षित रूप से उतर गए.
पहले रस्सियों से बांधकर उड़ाया गया था गुब्बारा
15 अक्टूबर को, जीन-फ्रांकोइस पिलात्रे डे रोजियर ने मोंटगोल्फियर गुब्बारे की एक बंधी हुई परीक्षण उड़ान भरी, जो धरती पर लौटने से पहले कुछ देर के लिए हवा में ऊपर उठा. पहली बार बिना बंधे हुए हॉट-एयर बैलून ने 21 नवंबर को पेरिस में एक बड़ी और उत्सुक भीड़ के सामने उड़ान भरी. पिलात्रे और डी'अर्लांडस, एक कुलीन, बोइस डी बोलोग्ने में शाही शैटॉ ला मुएट के मैदान से उठे और लगभग पांच मील की उड़ान भरी. ऐसा कर इंसानों ने आखिरकार आकाश पर विजय प्राप्त कर ली थी.
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मोंटगोल्फियर भाइयों को उनकी उपलब्धियों के लिए फ्रेंच एकेडमी डेस साइंसेज डेस साइंसेज द्वारा सम्मानित किया गया. बाद में उन्होंने वैमानिकी पर किताबें प्रकाशित कीं और अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किया.
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प्रमुख घटनाएं
21 नवंबर 1871 में मोजेज़ गेल ने सिगार लाइटर को पेटेंट कराया था.
21 नवंबर 1921 में प्रिंस ऑफ़ वेल्स (जो बाद में किंग एडवर्ड अष्टम कहलाए) बंबई पहुंचे थे और कांग्रेस ने देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया था.
21 नवंबर 1947 में आज़ादी के बाद देश में पहली बार डाक टिकट जारी किया गया था.
21 नवंबर 1962 में भारत-चीन सीमा विवाद के दौरान चीन ने संघर्षविराम की घोषणा की थी.
21 नवंबर 1963 में केरल के थुंबा क्षेत्र से पहला रॉकेट छोड़ा गया था.