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कहानी उस 'बूढ़े साधु' की, जिसकी प्रेरणा से बनी मशहूर Old Monk रम

रम के शौकीन लोगों के बीच ओल्ड मंक की अलग जगह है. कई लोग इसे प्यार से 'बूढ़ा साधु' भी कहते हैं. हैरानी की बात ये है कि सिर्फ माउथ पब्लिसिटी के सहारे ओल्ड मंक को बरसों तक भारत के आम जनमानस में 'नेशनल ड्रिंक' सरीखा दर्जा मिलता रहा. आइए जानते हैं कैसे इसका नाम पड़ा ओल्ड मंक

Bottle of Old Monk (Pic Credit: Pexels) Bottle of Old Monk (Pic Credit: Pexels)
अभिषेक भट्टाचार्य
  • नई दिल्ली,
  • 05 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 4:34 PM IST

ओल्ड मंक रम महज शराब नहीं, एक एहसास है. अमीर हों या गरीब, सभी वर्ग के लोग इसके मुरीद रहे हैं. इतनी सस्ती कि आम मध्यम वर्गीय भी आसानी से खरीद ले. तासीर ऐसी कि करोड़पति-अरबपति भी सामाजिक दिखावे को दरकिनार कर इसकी कुछ घूंट लेने का मोह न छोड़ पाएं. यह हिंदुस्तानियों के दिल के इतनी करीब है कि हर आयु वर्ग में मौजूद इसके प्रशंसक इसे प्यार से 'बूढ़ा साधु' भी कहते हैं. 1954 से लेकर आजतक यह वैसी की वैसी है. हाल फिलहाल के कुछ बदलावों और नए प्रोडक्ट्स को छोड़ दें तो यह अभी भी दशकों पुरानी एक खास डिजाइन की खुरदुरी सी बोतल में बाजार में उपलब्ध है. प्रशंसक कहते हैं कि इसमें मौजूद वनीला, किशमिश और दूसरे मसालों का फ्लेवर कुछ ऐसा है कि यह आज भी किसी अधेड़ शराब प्रेमी को नॉस्टॉलजिक कर दे. इसकी एक घूंट किसी को भी उसकी कॉलेज लाइफ, हॉस्टल की चकल्लस, सेना में जॉइनिंग, पहली नौकरी के जश्न, जवान होने के एहसास, पहली बार छिपकर शराब पीने जैसी यादों से सीधे कनेक्ट कर दे. 

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कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि जैसे डेटॉल शरीर के बाहरी जख्मों को ठीक करता है, ठीक वैसे ही शरीर के अंदरूनी और दिल के जख्मों पर ओल्ड मंक असर करती है. हैरानी की बात ये है कि हद दर्जे की इस लोकप्रियता को पाने के लिए इसे बनाने वाली कंपनी ने कभी क्लब सोडा, म्यूजिक सीडी या दूसरे किस्म के छद्म विज्ञापनों पर पैसा नहीं बहाया. सिर्फ माउथ पब्लिसिटी के सहारे ओल्ड मंक को बरसों तक भारत के आम जनमानस में 'नेशनल ड्रिंक' सरीखा दर्जा मिलता रहा. 50-60 के दशक में जब हरक्यूलिस जैसे रम ब्रांड का दबदबा था, तब ओल्ड मंक ने बाजार में जोरदार एंट्री मारी. यह आर्मी कैंटीन में भी उपलब्ध था. पुराने लोग कहते हैं कि सेना से कनेक्शन की वजह से यह युवाओं में भी लोकप्रिय हो गया. इसके बाद, इसका खुमार लोगों पर कुछ ऐसा चढ़ा कि ओल्ड मंक भारतीय बाजार के शीर्ष पर पहुंच गया. एक वक्त ऐसा भी था जब बार-रेस्तरां में ओल्ड मंक विद कोक सबसे आम ड्रिंक ऑर्डर होता था. वहीं, बहुत सारे घरों में ओल्ड मंक की चौकोर बोतल में मनी प्लांट लगे नजर आते थे. 

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Pic Credit: Twitter

एक वो दौर भी था, जब बार और लाउंज की शेल्फ में एलीट क्लास की पसंद महंगी सिंगल मॉल्ट्स के बगल में ओल्ड मंक की खुरदुरी बोतल भी चमक बिखेरती थी. गहरे रंग और हाई अल्कॉहल पर्सेंटेज की वजह से इसकी छवि 'मर्दों वाली ड्रिंक' की बनी. बीते दशक में दूसरी शराब कंपनियों के आक्रामक रणनीति, जोरदार विज्ञापनबाजी और वाइट रम की बढ़ती स्वीकार्यता के चलते ओल्ड मंक का बाजार सिमटता चला गया. हालांकि, पुराने प्रेमियों के दिल में आज भी इसके लिए वही खास जगह है. 2019 की हुरून इंडियन लग्जरी कंज्यूमर सर्वे में माना गया कि हाई नेटवर्थ इंडियंस के बीच सबसे मशहूर शराब ब्रांड ओल्ड मंक ही है. वहीं, आम प्रशंसकों को या तो इसका फ्लेवर बेहद पसंद है या फिर उनके लिए यह महंगे सिंगल मॉल्ट का बेहतर विकल्प है. इसे पसंद करने वालों में एक फकीरी है. किसी ने इसके बारे में लिखा है, It is more Press Club of India drink than an Oberoi Hotel drink. इस रम से जुड़े लोगों के अनगिनत अनुभव हैं, जिन्हें यहां शब्दों में समेट पाना बेहद मुश्किल है. हालांकि, यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि समाज के बड़े हिस्से के लिए अछूत रही शराब जैसी चीज को इतना दार्शनिक नाम 'ओल्ड मंक' कैसे मिला?

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Money Plant in Old Monk Bottle (Pic Credit: Facebook)

 

कौन है ओल्ड मंक का जनक 
ओल्ड मंक रम की निर्माता कंपनी का नाम है मोहन मीकिन लिमिटेड. इस कंपनी का भी एक लंबा इतिहास रहा है, जिसके बारे में हम बाद में बात करेंगे. पहले जानते हैं, उस शख्स के बारे में जिसकी वजह से दुनिया को ओल्ड मंक जैसी रम मिली. 2018 में जब मोहन मीकिन लिमिटेड के तत्कालीन चेयरमैन ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) कपिल मोहन का निधन हुआ तो श्रद्धांजलि देने वाले बहुत सारे लोगों ने उन्हें ओल्ड मंक रम का जनक बताया. हालांकि, यह बात सही नहीं थी. ओल्ड मंक के जन्मदाता कपिल मोहन नहीं, बल्कि कर्नल वेद रतन मोहन थे. वेद रतन राज्यसभा सांसद और दो बार लखनऊ के मेयर भी रहे. इसके अलावा, वह फिल्म सेंसर बोर्ड के चेयरमैन भी रहे. 1969 में पिता नरेंद्र नाथ मोहन से कंपनी की बागडोर हासिल करने वाले कर्नल मोहन ने 1954 में ओल्ड मंक रम लॉन्च की थी. इससे पहले, वह यूरोप दौरे पर गए थे जहां वह बेनेडिक्टिन संतों (Benedictine monks) की जीवनशैली और उनके शराब बनाने की क़ाबिलियत से खासे प्रभावित हुए थे. 

ओल्ड मंक के जन्मदाता कर्नल वेद रतन मोहन थे. (Pic Credit: indianrestaurantspy.com)

बेनेडिक्टिन संत जो बने 'ओल्ड मंक' की प्रेरणा 
कहते हैं कि बेनेडिक्टिन संतों के सम्मान के तौर पर ही वेद रतन मोहन ने इस रम का नाम 'ओल्ड मंक' रखा. ज्ञान शंकर की किताब 'ओल्ड मंक' में इसके बारे में कई दिलचस्प जानकारी मिलती है. इन संतों की शांतिपूर्ण जीवनशैली और पहाड़ों में रहकर बेहतरीन शराब तैयार करने की तकनीक से वेद रतन बेहद प्रभावित थे. बेनेडिक्टिन दरअसल इटैलियन इसाई संत सेंट बेनेडिक्ट के अनुयायी हैं. सेंट बेनेडिक्ट ने कुछ नियम बनाए जो 'रूल ऑफ सेंट बेनेडिक्ट' कहलाए. बेनेडिक्टिन मंक्स की जीवन पद्धति इन्हीं 'रूल ऑफ सेंट बेनेडिक्ट' के अनुसरण से जुड़ी है. सेंट बेनेडिक्ट ने इटली में कई मठ बनाए. बाद में बेनेडिक्टिन मिशनरियां इंग्लैंड, जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस भी पहुंचीं और उनके साथ पहुंचा वाइन बनाने का नायाब तरीका. मध्य युग में जब बीयर ही अधिकतर लोगों के लिए पोषण का मुख्य स्रोत था, इन बेनेडिक्टिन संतों के बीयर बनाने के उन्नत तरीके बेहद मशहूर हो गए. जानकार मानते हैं कि वाइन निर्माण के क्षेत्र में यूरोप की आज जो बादशाहत है, उसमें बहुत बड़ा योगदान इन्हीं बेनेडिक्टिन मंक्स का है. इंडिया की सबसे मशहूर रम की प्रेरणा यही बेनेडिक्टिन संत थे. 

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Old Monk and Grand Old Parr

दिलचस्प है ओल्ड मंक के बोतल की भी कहानी 
कर्नल मोहन को ओल्ड मंक के उस चौकोर खुरदुरे बोतल की प्रेरणा कहां से मिली? कहते हैं कि कर्नल को ओल्ड पार स्कॉच व्हिस्की की बोतल बेहद पसंद थी. फिलहाल इस ब्रांड का मालिकाना हक शराब कंपनी डियाजियो के पास है और यह कोलंबिया में काफी बिकती है. मोहन ने ओल्ड मंक रम के लिए भी ऐसी ही बोतल इस्तेमाल करने का फैसला किया. इस अनूठे आकार के बोतल में उस वक्त रम की पैकिंग बेहद मुश्किल थी. इस दौरान असेंबली लाइन पर बहुत सारी बोतलें शहीद हुईं, जिसके बाद प्रक्रिया को दुरुस्त किया गया. उधर, ओल्ड पार के निर्माताओं ने मोहन मीकीन को बोतल के मुद्दे पर कोर्ट में घसीटा. बाद में दोनों कंपनियां इस बात पर राजी हुईं कि ओल्ड पार गहरे रंग के बोतल में शराब बेचना जारी रखेगी, जबकि ओल्ड मंक ट्रांसपेरेंट शीशे वाली बोतल में. मोहन मीकिन ओल्ड मंक रम के लिए आज भी इसका इस्तेमाल कर रही है. जहां तक ओल्ड मंक की बोतल पर छपे गोलमटोल से शख्स का सवाल है, माना जाता है कि यह खुशमिजाज चेहरा एचजी मीकिन का है, जिन्होंने एक अंग्रेज से इस शराब कंपनी को खरीदा था. इनका ही नाम कंपनी के नाम मोहन मीकिन में आता है. 

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मोहन मीकिन का अंग्रेजों से क्या है कनेक्शन  
बात 1855 की है, जब एक अंग्रेज एडवर्ड अब्राहम डायर ने हिमाचल प्रदेश के कस्बे कसौली में एक बीयर कारखाना लगाया. मकसद भारत में मौजूद ब्रिटिश सैनिकों के लिए सस्ती और बढ़िया बीयर उपलब्ध कराना था. डायर ने पाया कि बीयर कारखाने के लिए पूरे भारत में सबसे बेहतर पानी यहीं उपलब्ध है. यहां उन्होंने लायन बीयर तैयार की जो काफी मशहूर हुई.  एडवर्ड उसी जनरल रेजिनल्ड डायर के पिता थे, जिस पर जलियांवाला बाग हत्याकांड की कालिख पुती. आजादी के बाद एचजी मीकिन ने एडवर्ड डायर से उनका कारखाना खरीद लिया और नाम दिया ‘डायर मीकिन ब्रूरीज़ लिमिटेड’. बाद में कारोबारी नरेंद्र नाथ मोहन ने इसका अधिग्रहण किया. कंपनी के नाम पर लगे डायर के दाग को हटाते हुए नया नाम रखा 'मोहन मीकिन'. ओल्ड मंक के लॉन्च के बाद महज 45 साल की उम्र में वेद रतन मोहन का निधन हो गया और कंपनी की बागडोर बिग्रेडियर कपिल मोहन ने संभाली. उनके नेतृत्व में कंपनी ने व्यापार का विस्तार किया और नई ऊंचाइयां छुईं. 2018 में कपिल मोहन के निधन के बाद इस वक्त कंपनी की बागडोर उनकी अगली पीढ़ी हेमंत मोहन और विनय मोहन के पास है.

 

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