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कैसे बना टैगोर का 'भारतो -भाग्यो-बिधाता' राष्ट्रगान... जानिए 'जन-गन-मन' का ऐतिहासिक सफर

भारत भाग्य विधाता... साल 1911 में कलकत्ता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के दूसरे सेशन में पहली बार इस बंगाली गीत को लोगों ने सुना जिसे खुद टैगोर ने गाया था. इस गीत के हिंदी अनुवाद से पहले साल 1919 में टैगोर ने खुद इस गीत को अनुवाद अंग्रेजी में किया, जिसे नाम दिया 'द मार्निंग सांग ऑफ इंडिया'. 28 फरवरी 1919 में पहली बार कोलकाता ( तब कलकत्ता) से बाहर टैगोर ने आंध्र प्रदेश के मदनापल्ले के थियोसोफिकल कॉलेज में खुद इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद गाया था.

India National Anthem India National Anthem
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 6:49 PM IST

"भारत भाग्य विधाता" ये उसी बंगाली गीत के बोल हैं जिसके हिंदी स्वरूप को भारत के राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया गया.  वो राष्ट्रगान जिसे सुनकर, जिसे गाकर हम 140 करोड़ भारतीयों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जिसे सुनकर देशभक्ति की अलग ही अनुभूति होती है. जो हमें ये याद दिलाता है कि भारत को आजाद कराने के पीछे कितने ही लोगों का खून -पसीना और बलिदान है. और ये जानना जरूरी है कि हमारे  राष्ट्रगान का भी अपना एक अलग इतिहास है. इस साल हमारी आजादी के 78 साल हो रहे हैं, लेकिन हमारे राष्ट्रगान का इतिहास आज़ादी से भी कई दशक पहले का है. "Bharato Bhagyo Bidhata" से "Jan-Gan-Man" तक का एक सफर है हमारे राष्ट्रगान का. तो आइए जानते हैं कि कैसै एक बंगाली गीत ने हिंदी स्वरूप में देश का राष्ट्रगान बनकर देश को पहचान दिलाई. 

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कैसे हुई राष्ट्रगान की रचना?
भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन प्रसिद्ध लेखक और कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए बंगाली गीत 'भारतो-भाग्यो बिधाता' का हिंदी संस्करण है. रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस बंगाली गीत को 5 स्टेंजा में लिखा था और साल 1905 में पहली बार बंगाल की पत्रिका 'तत्वबोधिनी पत्रिका' में प्रकाशित हुआ था. साल 1911 में कलकत्ता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के दूसरे सेशन में पहली बार इस बंगाली गीत को लोगों ने सुना जिसे खुद टैगोर ने गाया था. इस गीत के हिंदी अनुवाद से पहले साल 1919 में टैगोर ने खुद इस गीत को अनुवाद अंग्रेजी में किया जिसे नाम दिया 'द मार्निंग सॉंग ऑफ इंडिया'. 28 फरवरी 1919 में पहली बार कलकत्ता से बाहर टैगोर ने आंध्र प्रदेश के मदनापल्ले के थियोसोफिकल कॉलेज में खुद इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद गाया था.  साल 1943 में इस बंगाली गीत का हिंदी अनुवाद किया गया जिसे शुभ-सुख-चैन नाम दिया गया और उसी साल इस हिंदी अनुवाद को भारत के राष्ट्रगान का दर्जा दिया गया. 

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भारत को राष्ट्रगान देने में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका
साल 1942 में जर्मनी के हैमबर्ग में भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश के खिलाफ प्रशिक्षण देते समय बोस को महसूस हुआ कि एक ऐसा गीत होना चाहिए जिसे सुनकर सैनिकों में देश की आज़ादी को लेकर जोश बना रहे. देश को आज़ाद कराने के लिए हर सैनिक अपनी पूरा दम-ख़म लगा दें और उनका हौसला बना रहे.  जिस समय नेताजी जर्मनी में सैनिकों को प्रशिक्षित कर रहे थे उस समय तक भारतो-भाग्यो बिधाता भारत में एक लोकप्रिय गीत के रूप में अपनी पहचान बना चुका था. उस समय देश के लिए एक राष्ट्रगान तय करने के लिए बर्लिन में एक मीटिंग हुई जिसमें बोस ने ये तर्क दिया कि आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के लिए ये गीत सबसे उत्तम है और इस तरह उन्होंने भारतो-भाग्यो बिधाता को देश का राष्ट्रगान घोषित किया.  

11 सितंबर 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मन इंडियन सोसाइटी ऑफ हैमबर्ग का उद्घाटन किया और तभी पहली बार ये गीत देश की पहचान, देश के राष्ट्रगान के रूप में गाया गया. बोस चाहते थे कि ये गीत ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे, इसके लिए उन्होंने अपनी ऑर्मी को दो जनरल मुमताज़ हुसैन और आबिद हसन साफ़रानी से इस गीत को हिंदी में अनुवाद करने को कहा जिसे शुभ सुख चैन का नाम दिया गया. इसके बाद साल 1943 में इंडियन नेशनल ऑर्मी के कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने इसी गीत को मिलेट्री बीट के साथ संगीतबद्ध किया.

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देश को राष्ट्रगान देने में सिनेमा की भी अहम भूमिका
जिस समय देश आज़ादी के आंदोलनों का संघर्ष चल रहा था उसी समय साल 1944 में बिमल रॉय ने अपनी फिल्म उदयर पाथे में भारतो-भाग्यो बिधाता को शामिल किया. बाद में 1945 में इसी फिल्म के हिंदी संस्करण हमराही में एक बार फिर भारतो-भाग्यो बिधाता को शामिल किया गया. इस बार ये गीत लोगों ने बड़े पर्दे पर सुना और लोकप्रिय भी हुआ. लोगों को बीच यह गीत इसलिए भी लोकप्रिय हुआ क्योंकि इस गीत में देश को एकसाथ लाने की, देशवासियों को आज़ादी के लिए किए संघर्षों को याद दिलाने की और देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने की ताकत है.

टैगोर के 'भारतो-भाग्यो बिधाता' को ही राष्ट्रगान के रूप में क्यों चुना गया
जिस समय टैगोर ने इस बंगाली गीत 'भारतो-भाग्यो बिधाता' की रचना की थी. उस समय भारत ब्रिटिश सरकार के अधीन था. चारों ओर देश को आज़ाद कराने के आंदोलन चल रहे थे. टैगोर के लिखे इस गीत में ब्रिटिश सरकार के अधीन आने वाले राज्यों को शामिल कर शब्दों में पिरोया गया. जिसने आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों, देश को लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया और लोगों के बीच ये गीत लोकप्रिय भी हुआ.

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1950 में आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगान घोषित
हर देश को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अवसरों पर एक खास गीत की जरूरत होती है जो उस देश को प्रतिनिधित्व करे. आज़ाद भारत को भी अपने लिए ऐसे ही एक गीत की जरूरत थी. आज़ादी के बाद विदेशी सरकारों ने भारत से एक आधिकारिक गीत की मांग की जो भारत का पहचान के रूप में दर्ज कराया जा सके. 25 अगस्त 1948 में भारतीय संविधान सभा (कॉन्सटीट्यूशनल असेम्बली ऑफ इंडिया) के सेशन में नेहरू ने बताया कि साल 1943 में पहले ही इंडियन नेशनल मिलेट्री द्वारा 'जन-गण-मन' को लयबद्ध कर भारत के राष्ट्रगान के तौर पर गाया जा चुका है और वह गीत भारतवासियों के बीच लोकप्रिय भी है. नेहरू की कहा इस बात के बाद 24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान सभा (कॉन्सटीट्यूशनल असेम्बली ऑफ इंडिया) के आखरी सेशन में आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जन-गण-मन को आधिकारिक तौर पर देश का राष्ट्रगान घोषित किया. 

बता दें कि टैगोर के लिखे बंगाली गीत 'भारतो-भाग्यो बिधाता' में 5 स्टेंजा थे. वहीं उसके हिंदी संस्करण 'शुभ-सुख-चैन' और आधिकारिक तौर पर लिए गए 'जन-गण-मन' में एक स्टेंजा है. आपके लिए यह भी जानना जरूरी है और ध्यान रखन वाली बात है कि हमारा राष्ट्रगान  52 सेकेंड के निर्धारित समय अवधि में ही गाया जाता है. राष्ट्रगान के सम्मान में हमेशा खड़े होकर ही इसे सुना या गाया जाता है.

Inputs by: Anamika Asthana

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