
जुलाई 1947 में जब भारत अपनी आजादी के करीब था, ब्रिटिश शासन का सूर्य भारत में अस्त होने वाला था. जिस आजादी के लिए देश के वीर-जवानों ने कुर्बानी दी थी वो आजादी मिलने के करीब आ रही थी. अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंट बेटन के कंधों पर जिम्मेदारी दी थी कि वो भारतीय स्वतंत्रता सौंपे लेकिन कैसे? एक दिन माउंट बेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से अपने दफ्तर में पूछा कि आप किस तरह सत्ता का हस्तातंरण करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक अवसर है इसलिए हाथ मिलाना या फाइल का आदान-प्रदान करना ठीक नहीं है. कुछ ऐसी रस्म होनी चाहिए जिसका अपना महत्व हो और जो इस ऐतिहासिक पल को रेखांकित कर पाए.
जवाहरलाल नेहरू के पास उस वक्त कोई जवाब नहीं था, लेकिन उनके खास, दार्शनिक, बहुत अनुभवी स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय परंपराओं के जानकार और इतिहास के मर्मज्ञ-विद्वान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के पास जवाब था. तब उन्होंने सटीक इतिहास रेखांकित करके इस सेंगोल की प्रकिया को चिह्नित किया और पं. नेहरू को बताया कि हमारे यहां, हमारी परंपरा में इस सेंगोल के माध्यम से सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया को अधिकृत किया गया है. इसके बाद इसे तमिलनाडु से मंगाया गया और आधी रात को पंडित नेहरू ने डॉ राजेंद्र प्रसाद और कई अन्य लोगों की उपस्थिति में 'सेंगोल' को स्वीकार किया था. नेहरू का उद्देश्य भावनात्मक एकता और अकादमिक एकीकरण था. इसका तात्पर्य था पारंपरिक तरीके से ये सत्ता हमारे पास आई है.
हिस्टोरिकल एकाउंट्स के अनुसार, सी राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु के तंजौर जिले में धार्मिक मठ – थिरुववदुथुराई अधीनम से संपर्क किया था. अधीनम के नेता ने तुरंत ‘सेंगोल’ की तैयारी शुरू कर दी थी.
सेंगोल एक बार फिर चर्चा में है, संसद भवन में स्थापित किया गया ऐतिहासिक राजदंड 'सेंगोल' एक बार फिर सियासी घमासान शुरू हो गया है. विपक्षी दलों ने संसद भवन में स्पीकर के आसन के पास स्थापित सेंगोल को हटाने की मांग की है. इस बीच सेंगोल के बारे में जानना और समझना फिर से जरूरी हो गया है.
संसद में सेंगोल का विरोध क्यों?
सेंगोल के बारे में जानने से पहले जानिए संसद भवन में इसके स्थापित किए जाने पर विरोध क्यों हो रहा है. विपक्ष ने सेंगोल को राजशाही का प्रतीक बताकर उसे हटाने और उसकी जगह संविधान को स्थापित करने की मांग की है. समाजवादी पार्टी (SP) के सांसद आर के चौधरी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने संसद भवन में जहां स्पीकर बैठते हैं, वहां सेंगोल स्थापित कर दिया. सेंगोल का हिंदी अर्थ है राजदंड़, जिसका मतलब है राजा का डंडा. इसलिए संसद भवन से सेंगोल को हटाया जाना चाहिए. सपा सांसद आर के चौधरी ने कहा कि अब देश संविधान से चलेगा या फिर राजा के डंडे से चलेगा. इसलिए हमारी ये मांग है कि अगर लोकतंत्र को बचाना है तो संसद भवन से सेंगोल को हटाना है. मैं मांग करता हूं कि संविधान को बचाने के लिए संसद से सेंगोल को हटाया जाए.
क्या है सेंगोल?
सेंगोल संस्कृत शब्द "संकु" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "शंख". शंख हिंदू धर्म में एक पवित्र वस्तु थी, और इसे अक्सर संप्रभुता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. राजदंड भारतीय सम्राट की शक्ति और अधिकार का प्रतीक था. यह सोने या चांदी से बना था, और इसे अक्सर कीमती पत्थरों से सजाया जाता था. सेंगोल राजदंड औपचारिक अवसरों पर सम्राट द्वारा ले जाया जाता था. सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक भी माना जाता है.
महाभारत में भी मिलता है इतिहास
रामायण-महाभारत के कथा प्रसंगों में भी ऐसे उत्तराधिकार सौंपे जाने के ऐसे जिक्र मिलते रहे हैं. इन कथाओं में राजतिलक होना, राजमुकुट पहनाना सत्ता सौंपने के प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल होता दिखता है, लेकिन इसी के साथ राजा को धातु की एक छड़ी भी सौंपी जाती थी, जिसे राजदंड कहा जाता था. इसका जिक्र महाभारत में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के दौरान भी मिलता है. जहां शांतिपर्व में इसके जिक्र की बात करते हुए कहा जाता है कि 'राजदंड राजा का धर्म है, दंड ही धर्म और अर्थ की रक्षा करता है.' मध्ययुगीन काल में, सेंगोल का उपयोग मुगल सम्राटों द्वारा भी किया जाता था. मुगल सम्राटों के लिए, सेंगोल न केवल शक्ति का प्रतीक था, बल्कि यह उनके दैवीय अधिकार का भी प्रतीक था.
मौर्य, गुप्त, चोल, विजयनगर साम्राज्य के बाद मुगलों ने भी किया इस्तेमाल
भारत के इतिहास में राजदंड का पहला ज्ञात इस्तेमाल मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा पूर्व) द्वारा किया गया था. मौर्य सम्राटों ने अपने विशाल साम्राज्य पर अपने अधिकार को दर्शाने के लिए राजदंड का इस्तेमाल किया था. गुप्त साम्राज्य (320-550 ईस्वी), चोल साम्राज्य (907-1310 ईस्वी) और विजयनगर साम्राज्य (1336-1646 ईस्वी) द्वारा सेंगोल का इस्तेमाल किया गया था. इतिहास में सेंगोल आखिरी बार मुगल साम्राज्य द्वारा इस्तेमाल किया गया था. मुगलों ने अपने विशाल साम्राज्य पर अपने अधिकार को दर्शाने के लिए इसका इस्तेमाल किया था.
प्राचीन इतिहास पर नजर डालें तो सेंगोल के सूत्र चोल राज शासन से जुड़ते हैं, जहां सत्ता का उत्तराधिकार सौंपते हुए पूर्व राजा, नए बने राजा को सेंगोल सौंपता था. यह सेंगोल राज्य का उत्तराधिकार सौंपे जाने का जीता-जागता प्रमाण होता था और राज्य को न्यायोचित तरीके से चलाने का निर्देश भी.
सेंगोल का महत्व
सेंगोल का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है. यह न केवल शक्ति और अधिकार का प्रतीक है, बल्कि यह न्याय, धर्म और सत्य का भी प्रतीक है. आधुनिक भारत में, सेंगोल का उपयोग अभी भी कुछ समारोहों और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है. यह भारतीय संसद के स्पीकर के सामने भी रखा जाता है, जो लोकतंत्र और कानून के शासन का प्रतिनिधित्व करता है.
2023 में, भारत की नई संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के तिरुवावटुतुरै आतीनम मठ से प्राप्त 5 फीट लंबा सेंगोल संसद भवन में स्थापित किया था. यह सेंगोल भारत की समृद्ध विरासत और लोकतंत्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है. यह दर्शाता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और अपनी संस्कृति को महत्व देता है.