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पढ़ें स्वामी विवेकानंद का वो भाषण, जिसकी वजह से इतिहास की अमर घटना बन गई उनकी अमेरिका यात्रा

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में सबसे पहले अमरीकी भाइयों और बहनों कहकर सभा को संबोध‍ित किया. इसके बाद उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है और...

स्वामी विवेकानंद की 161वीं जयंती आज स्वामी विवेकानंद की 161वीं जयंती आज
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 12 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 12:48 PM IST

स्वामी विवेकानंद की अमेरिका यात्रा को इतिहास की अमर घटना कहा जाता है. क्योंकि पहली बार पश्चिमी देशों में भारतीय सभ्यता, संस्कृति और वेद-वेदांतों के ज्ञान का परचम लहराया था. भारत के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने अपने ओजस्वी भाषण से भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को प्रभावी ढंग से पूरी दुनिया के सामने रखा था. 

11 सितंबर 1893 को शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में मौजूद लोगों को कोई अंदाजा भी नहीं होगा कि आज यह सन्यासी ऐतिहासिक भाषण देने जा रहा है. आइये उनकी जयंती (Swami Vivekananda Jayanti) पर एक बार फिर उस भाषण के कुछ बिंदुओं को पढ़ें, जो आज भी गर्व की अनुभूति कराते हैं.

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  • स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में सबसे पहले अमरीकी भाइयों और बहनों कहकर सभा को संबोध‍ित किया. इसके बाद उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं.
  • मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली.
  • मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है. 
  • मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं.
  • सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए. यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से हो. 

बता दें कि स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में कलकत्ता में हुआ था. उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी और पिता का नाम विश्वनाथदत्त था, जो एक प्रसिद्ध वकील थे. स्वामी विवेकानंद का असली नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था, दीक्षा के बाद वह 'स्वामी विवेकानंद' के नाम से प्रसिद्ध हुए. वे वेदांत के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे. 25 साल की उम्र में विवेकानंद ने सांसारिक मोह माया त्याग दी थी और संन्यासी बन गए. 1881 में विवेकानंद की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई. जिसके बाद वे पूरे विश्‍व में दार्शनिक और विचारक के तौर पर लोगों को प्रेरित करने लगे. विवेकानंद को धर्म, दर्शन, इतिहास, कला, सामाजिक विज्ञान, साहित्य का ज्ञान था. शिक्षा में निपुण होने के साथ-साथ वे भारतीय शास्त्रीय संगीत का भी ज्ञान रखते थे.

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