
Who is Hansa Mehta? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 119वे एपिसोड में हंसा मेहता जिक्र किया. उन्होंने कहा, 'साथियो, हंसा मेहता जी ने हमारे राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण से लेकर उसके लिए बलिदान देने वाली देश-भर की महिलाओं के योगदान को सामने रखा था. उनका मानना था कि हमारे तिरंगे में केसरिया रंग से भी ये भावना उजागर होती है. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि हमारी नारी-शक्ति भारत को सशक्त और समृद्ध बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान देगी. आज उनकी बातें सच साबित हो रही हैं.' पीएम मोदी ने संविधान सभा में उनके ऐतिहासिक योगदान को याद करते हुए उनकी एक पुरानी ऑडियो क्लिप साझा की, जिसमें वे भारत का राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत करते हुए सुनाई दे रही हैं. आइए जानते हैं हंसा मेहता कौन थीं?
कौन थीं हंसा मेहता?
3 जुलाई 1897 को सूरत, गुजरात में जन्मीं हंसा जीवराज मेहता एक प्रख्यात भारतीय विद्वान, स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख नेता, शिक्षिका, समाज सुधारक, लेखिका और महिला अधिकारों की चैंपियन थीं.
शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव
उन्होंने बड़ौदा कॉलेज में दर्शनशास्त्र और फिर इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र की पढ़ाई की. 1920 में लंदन में रहते हुए हंसा मेहता की मुलाकात सरोजिनी नायडू से हुई, जिन्होंने बाद में उन्हें महात्मा गांधी और भारतीय महिला स्वतंत्रता आंदोलन से परिचित कराया. वे महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुईं और महिलाओं के अधिकारों के लिए सक्रिय रहीं. उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई, जिसका जिक्रा आज पीएम मोदी ने 'मन की बात' में भी किया.
राजनीतिक सफर और महिला अधिकारों की वकालत
मेहता के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1937 में बॉम्बे विधान परिषद चुनाव में उनकी जीत से हुई. आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने से इनकार करने के बाद उन्होंने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और 1949 तक परिषद में रहीं.
इस दौरान, मेहता अखिल भारतीय महिला सम्मेलन से जुड़ीं और 1946 में इसकी अध्यक्ष बनीं. अपनी अध्यक्षता के दौरान, उन्होंने भारतीय महिला अधिकार और कर्तव्यों का चार्टर तैयार किया, जिसमें महिलाओं के लिए लैंगिक समानता और नागरिक अधिकारों की मांग की.
1946 में ही हंसा मेहता ने महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र उप-समिति के सदस्य के रूप में काम किया. वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति की सार्वभौमिक घोषणा की एलेनोर रूजवेल्ट के साथ उपाध्यक्ष थीं. इसके अलावा, वह बॉम्बे में श्रीमती नाथीबाई दामोदर ठाकरसे महिला विश्वविद्यालय (SNDT University) में अपनी नियुक्ति के साथ भारत में पहली महिला कुलपति बनीं. उन्होंने बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में पुस्तकालय की स्थापना की, जो उनके सम्मान में नामित किया गया.
संविधान सभा में हंसा मेहता की ऐतिहासिक भूमिका
हंसा मेहता 1946 से 1949 तक संविधान सभा की सदस्य रहीं और मौलिक अधिकार उप-समिति, सलाहकार समिति और प्रांतीय संवैधानिक समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. संविधान सभा में उन्होंने समान नागरिक संहिता (UCC) को मौलिक अधिकारों में शामिल करने की मांग की थी, हालांकि उनका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया.
संविधान सभा में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया
15 अगस्त 1947 की आधी रात के कुछ मिनट बाद, उन्होंने ‘भारत की महिलाओं’ की ओर (सबसे पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया था.) से संविधान सभा में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पेश किया. यह वह ध्वज था जिसे स्वतंत्र भारत में सबसे पहले फहराया गया. इस मौके पर उन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया-
'यह उचित ही है कि इस पवित्र सभा के ऊपर फहराने वाला यह पहला ध्वज भारत की महिलाओं का उपहार हो. हमने इस केसरिया रंग को धारण किया है. हमने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, कष्ट सहे और बलिदान दिए. आज हमने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है. इस स्वतंत्रता के प्रतीक को प्रस्तुत करते हुए, हम एक बार फिर राष्ट्र की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं. हम एक महान भारत के निर्माण के लिए, एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध होते हैं जो दुनिया के अन्य राष्ट्रों के बीच गौरव से खड़ा हो. हम स्वयं को एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित करते हैं, उस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए जिसे हमने प्राप्त किया है.'
संविधान सभा में भूमिका
संविधान सभा में उनका प्रमुख योगदान महिलाओं के अधिकारों की वकालत करना था. हंसा मेहता ने राजकुमारी अमृत कौर के साथ मिलकर ‘भारतीय महिला अधिकार और कर्तव्य चार्टर’ तैयार किया, जिसमें समान नागरिक संहिता (UCC), महिलाओं की शिक्षा, समान वेतन और विवाह कानूनों में सुधार की मांग की गई थी.
संयुक्त राष्ट्र में ऐतिहासिक बदलाव की सूत्रधार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया. उनकी एक अहम उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की शुरुआती पंक्ति में बदलाव करवाया. मूल रूप से इसमें लिखा था “All men are born free and equal”, जिसे उनके प्रयासों से “All human beings are born free and equal” कर दिया गया. यह बदलाव महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था.
पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री मोदी ने हंसा मेहता के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनका जीवन देश की बेटियों और महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है. उनकी यह विरासत भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण और समानता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनी हुई है.