गाजियाबाद के एक गांव में पैदा हुए मनुज जिंदल शुरुआती पढ़ाई करने के बाद देहरादून के एक स्कूल में पढ़ाई करने चले गए. स्कूल की पढ़ाई पूरी करते ही उनका सीधे एनडीए में चयन हो गया. ट्रेनिंग एकेडमी में उन्होंने पहले टर्म में तो बहुत अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन दूसरा टर्म आते आते वो एंजाइटी और डिप्रेशन का शिकार हो गए. इस मुसीबत से लड़ाई उनके लिए बेहद मुश्किल थी, साथ ही मुश्किल था अपना वजूद और अपनी पहचान बचाना... इस दौर से बाहर आकर कैसे वो एक आईएएस अफसर बने, इसके पीछे की पूरी कहानी हर उस इंसान को प्रेरणा देती है जो डिप्रेशन को जीवन का अंत मान लेता है.
aajtak.in से बातचीत में मनुज जिंदल ने बताया कि यह 2005 की बात है. "मैं 18 साल था. तब मेरा एनडीए में सेलेक्शन हो गया था. पहले टर्म में मेरा बहुत अच्छा जा रहा था लेकिन तब भी मैं मेंटली सेटल नहीं हो पा रहा था. पेरेंट्स सोच रहे थे कि अभी नया नया है, धीरे धीरे सेटल हो जाऊंगा. उन्होंने भी मुझे समझाया. लेकिन मैं एकदम सेटल नहीं हो पा रहा था."
"अब सेकेंड टर्म में मैं बहुत डिप्रेशन में था. मेरे हाथ और पैर में इंजरी हो गई थी, इसकी वजह भी मैं यही मानता हूं, कि मैं मेंटली सेटल नहीं था, इसलिए फिजिकली भी बहुत अच्छा नहीं कर पा रहा था. मेरे मन में हमेशा यही ख्याल आता था कि मैं इसके लिए नहीं बना हूं, मुझे जिंदगी में कुछ और करना है. फिर मेरा डिप्रेशन इतना बढ़ गया कि अधिकारियों ने मुझे अस्पताल में भर्ती करा दिया. वहां तीन चार महीने मेरा इलाज चला. दवाईयां खाईं."
पापा ने निभाया खास रोल
"मेरे डिप्रेशन के कारण मैं खुद को समझा नहीं पा रहा था कि आगे क्या कैसे करूंगा. एकेडमी ने मुझे निकाल दिया था. उनकी कार्यवाही होने के बाद और देर न लगे और मेरी पढ़ाई लगे इसके लिए मेरे पिता ने अफसरों से बात करके सब जल्दी जल्दी कराया और मुझे घर ले आए. अब मैं धीरे धीरे संभलने लगा था. पेरेंट्स और मेरे भाई मुझे बहुत संभाल रहे थे. वहीं कुछ लोगों से नकारात्मक बातें सुनने को मिल ही जाती थीं, फिर भी मैंने सबको अनसुना करके सिर्फ अपनी सेहत और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया."
मनुज कहते हैं कि हमेशा डिप्रेशन की कोई न कोई वजह होती है. अगर आप उसे समझ लें तो निकलने में आसानी होती है. "एनडीए से वापस आने के बाद अब मुझे अपना लक्ष्य दिखने लगा था. मैंने सोचा कि इससे निकलना है तो कुछ और करना है. मैंने वहां से आकर आगे पढ़ाई करने की सोची. मेरे दोस्तों ने बताया कि मैं भारत के अलावा विदेशों की यूनिवर्सिटी में भी अप्लाई कर सकता हूं. अगर वहां स्कॉलरशिप मिली तो पढ़ सकता हूं. और वही हुआ मुझे यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया में पढ़ने का मौका मिला."
यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया से ग्रेजुएशन करने के बाद मुझे बार्कलेज में जॉब भी मिल गई. मैंने अच्छे सेलरी पैकेज में वहां तीन साल जॉब किया. इस दौरान जब मैं इंडिया आया तो मेरा छोटा भाई यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. मेरा भी भारत वापस लौटने और यहां कोई सार्थक काम करने का मन कर रहा था. उसने मुझे समझाया और मैंने तैयारी करके साल 2014 में पहला अटेंप्ट दिया. पहले अटेंप्ट में ही मेरा प्री और मेंस में सेलेक्शन हो गया था, लेकिन इंटरव्यू में रैंक नहीं मिली.
फिर दूसरे अटेंप्ट में भी प्री मेंस निकल गए लेकिन इंटरव्यू के बाद वो रिजर्व लिस्ट में आ गए. लेकिन उन्होंने तैयारी नहीं रोकी और साल 2017 में ऑल इंडिया 52वीं रैंक प्राप्त की. वर्तमान में वो औरंगाबाद के पास स्थित जालना जिला सीईओ जिला परिषद के तौर पर तैनात हैं. मनुज कहते हैं कि कभी भी बुरे दौर में हार नहीं माननी चाहिए. हमेशा ये सोचना चाहिए कि कितना भी बुरा वक्त हो, वो टल जरूर जाता है. इसके अलावा अपनी कमान अपने हाथ में रखें, अपनी मेहनत पर विश्वास करें और हमेशा मन में ये दोहराते रहें कि जो भी है मेरे हाथ में है, चलते रहो बढ़ते रहो.