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BPSC Success Story: मिट्टी-बांस का घर, मां ने खेतों में मजदूरी कर पढ़ाया, गांव का पहला 12वीं पास मंजय बना टीचर

BPSC Success Story Manjay Lal Sada: दरभंगा जिले के परमार गांव के मुसहरी टोला के मंजय लाल सदा ने गरीबी और चुनौतियों का सामना करते हुए BPSC शिक्षक पात्रता परीक्षा (TRE) पास की. वे अपने गांव से इंटर पास कर सरकारी नौकरी पाने वाले पहले व्यक्ति बने. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, फिर भी उनकी सफलता ने गांव में शिक्षा का माहौल बदल दिया है और उनकी कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है.

मंजय, गांव के पहले 12वीं पास और अब सरकारी नौकरी प्राप्त करने वाले हैं. मंजय, गांव के पहले 12वीं पास और अब सरकारी नौकरी प्राप्त करने वाले हैं.
प्रह्लाद कुमार
  • दरभंगा,
  • 09 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 8:07 PM IST

BPSC Success Story Manjay Lal Sada: दरभंगा जिले के परमार गांव के मुसहरी टोला का नाम इन दिनों हर किसी की जुबान पर है. इसकी वजह हैं मंजय लाल सदा, जिन्होंने गरीबी और तमाम चुनौतियों के बावजूद BPSC शिक्षक पात्रता परीक्षा (TRE) पास की है. मंजय अपने गांव से इंटर पास कर सरकारी नौकरी पाने वाले पहले व्यक्ति बन गए हैं. उनकी सफलता ने न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे गांव को गर्व से भर दिया है.

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संघर्षों से भरी जिंदगी
मंजय का परिवार दलित वर्ग से आता है और बेहद गरीबी में जीवन यापन करता है. उनके पिता परमेश्वर सदा पंजाब में मजदूरी करते हैं, जबकि मां भुखनि देवी गांव में दूसरों के खेतों में काम करती हैं. मंजय पांच भाई-बहनों में इकलौते हैं जिन्होंने पढ़ाई पूरी की. बाकी भाई-बहन आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गए. मिट्टी और बांस के कच्चे घर में रहने वाले मंजय ने पुरानी साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाना शुरू किया. यह साइकिल उनके संघर्षों की साथी रही.

शिक्षा के प्रति समर्पण
मंजय ने गांव के मध्य विद्यालय परमार से आठवीं तक की पढ़ाई की. इसके बाद दरभंगा के आनंदपुर स्कूल से इंटरमीडिएट पास किया. अपने छोटे खर्च पूरे करने के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया. कठिनाईयों के बावजूद पढ़ाई जारी रखते हुए उन्होंने पहले प्रयास में BPSC परीक्षा पास की थी, लेकिन एक अंक से चयन नहीं हो सका. दूसरी बार मेहनत करते हुए उन्होंने TRE परीक्षा पास कर सरकारी शिक्षक बनने का सपना पूरा किया.

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परिवार और गांव में खुशी की लहर
मंजय की मां भुखनि देवी ने कहा, "गरीबी और भूख से जूझते हुए भी बेटे को पढ़ाया. आज वह मास्टर बन गया है, इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है." मंजय की मां ने कहा,'गांव में सब लोग साथ रहते थे लेकिन दो पैसा ज्यादा कमाने के लिए उनके पति पंजाब जाकर मजदूरी करते हैं, वे भी घर के काम काज निपटा कर गांव में ही दूसरे लोगों के खेत-खलिहान में मजदूरी कर सौ दो सौ रुपये कमा लेती हैं. इसी पैसो से भूखे पेट रह कर बेटे को पढ़ाई में मदद की. अब बीटा मास्टर बन गया है तो बहुत ख़ुशी हो रही है. मंजय के चाचा राम ज्ञान सदा ने भावुक होकर कहा, "मंजय ने हमारे परिवार का नाम रोशन किया. अब गांव के लोग भी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं." बीपीएससी का रिजल्ट देखने के बाद मंजय और उनकी मां दोनों काफी भावुक हुए और फूट-फूटकर रोने लगे.

गांव में शिक्षा की नई शुरुआत
मध्य विद्यालय परमार के प्रिंसिपल हर्ष नारायण झा ने बताया, "मंजय शुरू से ही मेधावी छात्र रहा है. उनकी सफलता ने गांव में शिक्षा का माहौल बदल दिया है. अब गांव के लोग बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जागरूक हो रहे हैं."

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मंजय की प्रेरणा और संदेश
मंजय ने कहा, "मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है. मेरा सपना है कि गांव के बच्चों को पढ़ाई में मदद करूं. एक रोटी कम खाकर भी उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करूंगा." मंजय की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल हालातों से लड़ते हुए भी अपने सपनों को पूरा करने का हौसला रखते हैं. उनकी सफलता ने साबित कर दिया कि शिक्षा ही वह शक्ति है जो किसी भी परिस्थिति को बदल सकती है.

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