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IIT कानपुर के वैज्ञानिकों ने खोज निकाली लिवर फाइब्रोसिस की दवा, ऐसे करेगी काम

आईआईटी कानपुर के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार ने बताया कि लिवर मानव शरीर का ऐसा अंग है जो खुद को पुनर्जीवित कर सकता है, लेकिन कुछ मामलों में यह संभव नहीं होता. उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने ऐसी रीजेनरेटिव मेडिसिन विकसित की हैं जो स्वस्थ लिवर टीशूज को रीजनरेट कर सकती हैं. इससे न केवल लिवर फाइब्रोसिस बल्कि सिरोसिस भी ठीक हो जाएगा.

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सिमर चावला
  • कानपुर,
  • 11 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 7:41 PM IST

रीजेनरेटिव मेडिसिन की कैटेगरी में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) कानपुर ने कमाल कर दिया है. आईआईटी कानपुर के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग ने ऐसी दवा विकसित की है, जो लिवर फाइब्रोसिस और फैटी लिवर जैसी समस्याओं को ठीक कर सकती है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने इसे क्लीनिकल ट्रायल के लिए मंजूरी दे दी है. ये ट्रायल जल्द ही महाराष्ट्र के वर्धा में शुरू किए जाएंगे.

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दरअसल, बदलते लाइफस्टाइल में फैटी लिवर की समस्या एक आम बीमारी बन गई है. जब यह समस्या बढ़ जाती है तो लिवर के स्वस्थ ऊतक नष्ट होने लगते हैं और उनकी जगह स्कार टिशू आ जाते हैं, जिससे लिवर सामान्य रूप से काम नहीं कर पाता. आईआईटी कानपुर के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार ने बताया कि लिवर मानव शरीर का ऐसा अंग है जो खुद को पुनर्जीवित कर सकता है, लेकिन कुछ मामलों में यह संभव नहीं होता. उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने ऐसी रीजेनरेटिव मेडिसिन विकसित की हैं जो स्वस्थ लिवर टीशूज को रीजनरेट कर सकती हैं. इससे न केवल लिवर फाइब्रोसिस बल्कि सिरोसिस भी ठीक हो जाएगा.

जल्द शुरू होगा ट्रायल

क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी प्रयोगशाला परीक्षणों में सफलता के बाद आईसीएमआर ने इस दवा में रुचि दिखाई है. वर्धा के दत्ता मेघे अस्पताल में इसका क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया जाएगा. दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (आईएलबीएस) से भी चर्चा चल रही है. ट्रायल के लिए मरीजों और केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाएगी. दवा को टारगेटेड थेरेपी के तहत दिया जाएगा ताकि इसका असर सिर्फ संबंधित अंग पर हो, शरीर के दूसरे हिस्सों पर नहीं.

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रीढ़ की हड्डी की चोटों का भी होगा इलाज

प्रोफेसर अशोक कुमार ने यह भी बताया कि स्पाइनल कॉर्ड (मेरुरज्जु) की चोटें बहुत गंभीर होती है. इन चोटों से लोग लकवे का भी शिकार होते हैं. उनकी टीम ने रीढ़ की हड्डी की गंभीर चोटों के इलाज के लिए एक खास मैटेरियल तैयार किया है. इस मैटेरियल का इस्तेमाल कर ऊतक को दोबारा उगाने की दिशा में काम किया गया है. एनिमल मॉडल पर किए गए परीक्षणों में यह तकनीक सफल रही है. यहां तक कि टूटी हुई रीढ़ की हड्डी को भी जोड़ने में सफलता मिल सकती है. सेंट्रल नर्वस सिस्टम के बाहर की नसों पर भी यह इलाज कारगर साबित हुआ है. आईआईटी कानपुर के ये प्रयास न केवल लिवर और स्पाइन से जुड़ी समस्याओं के इलाज में क्रांति ला सकते हैं, बल्कि चिकित्सा जगत को भी नई दिशा दे सकते हैं.

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