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न होमवर्क, न एग्जाम, न कंपटीशन, एक्सपर्ट से जानिए- क्यों वर्ल्डक्लास है फिनलैंड का एजुकेशन सिस्टम?

फिनलैंड में ट्रेनिंग के लिए जा रहे दिल्ली सरकार के स्कूलों के टीचर्स का मामला विवादों में घिर गया है. आइए जानते हैं कि क्यों यहां के एजुकेशन सिस्टम की चर्चा हो रही है, इसमें ऐसी क्या खास बात है कि दिल्ली के टीचर्स को यहां ट्रेनिंग पर भेजा जा रहा है.

प्रतीकात्मक फोटो (Getty) प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
मानसी मिश्रा
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  • 18 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 1:56 PM IST

इन दिनों दिल्ली में स्वीडन से सटे उत्तरी यूरोपियन देश फिनलैंड के एजुकेशन सिस्टम की चर्चा जोरों पर है. बर्फ से घ‍िरा ये छोटा सा देश फिनलैंड अपने बेहतर एजुकेशन सिस्टम के लिए पूरी दुनिया में पहचान बना चुका है. आइए जानते हैं कि क्यों यहां के एजुकेशन सिस्टम की चर्चा हो रही है, इसमें ऐसी क्या खास बात है कि दिल्ली के टीचर्स को यहां ट्रेनिंग पर भेजा जा रहा है. 

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सात साल की उम्र से शुरू होती है पढ़ाई 

फिनलैंड के एजुकेशन सिस्टम में छात्रों के लिए कई तरह की सहूलियतें दी जाती हैं जो कि उनके लिए पढ़ाई को इंट्रेस्ट‍िंग बनाती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में श‍िक्षा विभाग की श‍िक्ष‍िका प्रो हनीत गांधी कहती हैं कि करीब 10 साल पहले फिनलैंड के एजुकेशन सिस्टम पर पूरे दुनिया में चर्चा की जाने लगी. उनके सिस्टम में बच्चों को कॉन्सेप्ट समझाने पर पर बहुत काम किया है. वहां हर विषय को बच्चों को समझाने के लिए सबसे पहले उसका कॉन्सेप्ट समझाया जाता है कि उस विषय को समझने की जरूरत क्यों है. उन्हें सिर्फ सवाल-जवाब के कॉन्सेप्ट में नहीं समझाया जाता है. 

प्रो गांधी कहती हैं कि अगर आप उदाहरण के तौर पर समझें तो मान लीजिए उन्हें इत‍िहास पढ़ाना है तो घटनाओं को समय-काल-परिस्थ‍िति के हिसाब से रटने के बजाय वहां उसे क्रोनोलॉजी के आधार पर समझाया जाता है. बच्चे उसमें रुचि लेने लगते हैं, इस तरह वो खुद ही उस विषय को गहनता से समझ जाते हैं. पढ़ाने का जो यह अलग ढंग है इसी कारण वहां बच्चों को स्कूल में बोरियत नहीं होती. वहां बच्चे स्कूल होने वाली एक्ट‍िविटीज जैसे पढ़ाई के अलावा खेलकूद आदि भी पसंद करते हैं. बच्चों की पर्सनैलिटी का विकास स्कूल के अंदर होती है. 

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वहां न बच्चों को होमवर्क की इतनी चिंता रहती है न इस बात की उन्हें फेल कर दिया जाएगा. वहां नो ड‍िटेंशन यानी कि उन्हें पढ़ाई में सीखने के लिहाज से आंका नहीं जाता. उन्हें कॉन्सेप्ट के हिसाब से आंका जाता है. बच्चों का असेसमेंट टीचर्स करते हैं, इससे वहां एग्जाम लेने का तरीका छात्र केंद्रित होता है. वहां पढ़ाई के लिए सात साल की उम्र से शुरुआत होती है, और 16 साल की उम्र तक कोई एग्जाम बच्चों को फेस नहीं करना होता. शायद यही वजह है कि वहां ट्यूशन कल्चर भी नहीं है, न ही बच्चों में फेल होने का कोई फियर, या कोई स्ट्रेस या एंजाइटी. स्ट्रेस की बात करें तो वहां साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग भी पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा है. बच्चों की समय-समय पर साइकलॉजिकल स्क्रीनिंग की जाती है. 

स्टूडेंट्स के लिए ये 7 बातें हैं खास 

  • नो डिटेंशन यानी फेल होने का कॉन्सेप्ट ही नहीं है 
  • कोई मंथली टेस्ट नहीं, पहला एग्जाम हाइस्कूल का होता है 
  • कोई स्कूली छात्रों या रीजन के स्कूलों के बीच रैंकिंग या कंपटीशन नहीं होता है. 
  • हर लेशन क्लास के बाद 15 मिनट आउटडोर प्ले टाइम मिलता है 
  • कम से कम होमवर्क 
  • सात साल की उम्र से शुरू होती है पढ़ाई 
  • बच्चों के लिए प्री स्कूल एकदम फ्री हैं 

टीचर्स के लिए क्या है खास 

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  • फिनलैंड में टीचर एजुकेशन इंस्टीट्यूट में एडमिशन स्टूडेंट्स का सपना होता है 
  • टीच‍िंग प्रोफेशनल्स देश के ग्रेजुएट्स में से टॉप 10 वालों को चुना जाता है 
  • टीचर्स को ऑन द जॉब ट्रेनिंग हमेशा दी जाती है 
  • टीचिंग के अलग अलग मेथड पर सहकर्मी टीचर्स आपस में कंलस्टेशन करते हैं 
  • फिनलैंड में टीचर्स की सैलरी भी सबसे अच्छी होती है 

प्रशासनिक तौर पर हैं ये खासियतें 

  • यहां एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह डी-सेंट्रलाइज है 
  • इंस्पेक्शन का कोई नियम नहीं, सारी जवाबदेही टीचर्स और प्रिंसिपल की होती है 
  • फिनिश, मैथ्स और साइंस के अलावा पहली कक्षा से बच्चों को म्यूजिक, आर्ट, खेल, रिलिजन और टेक्स्टाइल हैंडीक्राफ्ट सिखाते हैं, तीसरी कक्षा से इंग्ल‍िश पढ़ाई जाती है. 

 

 

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