Advertisement

एजुकेशन

सरकारी कर्मचारी से ऐसे बहुजन नायक बने थे कांशीराम, रखी थी BSP की नींव

मानसी मिश्रा
  • 09 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 3:39 PM IST
  • 1/7

बहुजन समाज पार्टी की नींव रखने वाले कांशीराम दलित आंदोलन के अगुवा और बहुजन नायक के रूप में सदैव पहचाने जाएंगे. आज उनकी बरसी पर आइए जानते हैं कि किस तरह एक सरकारी कर्मचारी का पद त्यागकर वो बहुजन नायक बन गए. बसपा की वर्तमान उत्तराधिकारी मायावती को पहचान दिलाने वाले कांशीराम ने जमीनी स्तर पर काम करके ये पार्टी खड़ी की थी.

  • 2/7

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को ब्रिटिश भारत पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था. कुछ लोग उनका जन्मस्थान पिरथीपुर बुंगा मानते हैं. तथ्यों के अनुसार उनका परिवार पंजाब में एक तथाकथित अछूत संप्रदाय के रामदासिया सिख था. विभिन्न स्थानीय स्कूलों में अध्ययन के बाद कांशीराम ने 1956 में गवर्नमेंट कॉलेज रोपा से बीएससी की डिग्री हासिल की.

  • 3/7

पढ़ाई के बाद कांशीराम विस्फोटक अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला में काम करने लगे. ये सरकार की एक सकारात्मक स्कीम के तहत था. ये वो दौर था जब उन्हें पहली बार भेदभाव महसूस हुआ. फिर 1964 आते-आते वो एक्टिविस्ट बन गए, उनके समर्थक वर्ग का कहना है कि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की किताब एनिहिलेशन पढ़कर उन्हें ये बदलाव आया था.

Advertisement
  • 4/7

कांशीराम ने उस दौर में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को सहयोग देना शुरू किया था. उसके बाद 1971 में उन्होंने ऑल इंडिया एससी, एसटी, ओबीसी एंड माइनॉरिटी एम्प्लाइज एसोसिएशन की नींव रखी और 1978 में इसी का नाम बामसेफ BAMCEF पड़ गया. बामसेफ एक ऐसा संगठन जिसमें शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब्स और अन्य पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक वर्ग के पढ़े-लिखे लोगों को जोड़ा गया. BAMCEF न तो कोई राजनीतिक और न ही धार्मिक संस्था थी. इसका अपने उद्देश्य के लिए आंदोलन करने का भी कोई एजेंडा नहीं थी.

  • 5/7

साल 1981 में कांशीराम ने एक और सामाजिक संगठन बनाया, जिसे दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसएसएस, या डीएसआरएस) के नाम से जाना जाता है. इस संगठन के जरिये उन्होंने दलित वोट को मजबूत करने की अपनी कोशिश शुरू की और 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की. उन्होंने अपना पहला चुनाव 1984 में छत्तीसगढ़ की जांजगीर-चांपा सीट से लड़ा. तब उत्तर प्रदेश में बसपा को सफलता मिली, शुरू में ही उन्होंने दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच विभाजन को पाटने के लिए संघर्ष किया लेकिन बाद में मायावती के नेतृत्व में इस खाई को पाटा गया.

  • 6/7

साल 1982 में उन्होंने द चमचा एज नाम से किताब लिखी जिसमें उन्होंने कई नेताओं को इस शब्द से जोड़ा. उन्होंने बीएसपी बनाने के बाद कहा था कि पार्टी पहला इलेक्शन हारेगी, अगली बार नोटिस किया जाएगा, लेकिन तीसरी बार जरूर जीतेंगे.

Advertisement
  • 7/7

कांशीराम की मौत नौ अक्टूबर 2006 को हुई थी. बताते हैं कि वो मधुमेह के मरीज थे, इसके चलते उन्हें पहला हार्ट अटैक 1994 में आया, बताते हैं कि उसके बाद 1995 में तभी उनके दिमाग में आट्रियल क्लॉट की समस्या सामने आई. कांशीराम की पुस्तकों की बात करें तो चमचा एज के अलावा बर्थ ऑफ बामसेफ का नाम भी लिया जाता है. उत्तर प्रदेश में कांशीराम की मौत के बाद सार्वजनिक संस्थानों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया.

Advertisement

लेटेस्ट फोटो

Advertisement