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झोपड़ी में जन्मे रंजीत रामचंद्रन से सीख‍िए हालातों से जीतना, वॉचमैन से बने IIM में प्रोफेसर

IIM रांची में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद तक पहुंचने के सफर के लिए रंजीत ने जी-तोड़ मेहनत की. पनाथुर के केलापनकायम में उनके पिता रामचंद्रन नायक दर्जी का काम करके और मां बेबी आर मनरेगा में दिहाड़ी मजदूरी के जरिए घर का खर्च चलाते थे.

प्रो. रामचंद्रन (aajtak.in) प्रो. रामचंद्रन (aajtak.in)
गोपी उन्नीथन
  • तिरुवनंतपुरम,
  • 13 अप्रैल 2021,
  • अपडेटेड 3:04 PM IST

“मैं इस घर में पैदा हुआ, यहीं बढ़ा हुआ. मुझे ये बताते हुए बड़ी खुशी है कि IIM के एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने इसी घर में जन्म लिया. मैं इस घर से IIM रांची तक के सफर की कहानी सभी से साझा करना चाहता हूं. मैं अपनी इस कोशिश को कामयाब मानूंगा अगर इसे जानकार एक भी शख्स को अपना सपना पूरा करने के लिए प्रेरणा मिल सके.” 28 साल के रंजीत रामचंद्रन ने 9 अप्रैल को तिरपाल की छत वाली इस झोपड़ी की फोटो के साथ फेसबुक पर ये पोस्ट डाली तो उन्होंने सोचा नहीं था कि ये वायरल हो जाएगी और इसे बेशुमार लाइक्स मिलेंगे.  

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IIM रांची में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद तक पहुंचने के सफर के लिए रंजीत ने जी-तोड़ मेहनत की. पनाथुर के केलापनकायम में उनके पिता रामचंद्रन नायक दर्जी का काम करके और मां बेबी आर मनरेगा में दिहाड़ी मजदूरी के जरिए घर का खर्च चलाते थे. मराठी अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले रामचंद्रन और बेबी ने सिर्फ पांचवीं तक की ही पढ़ाई की. लेकिन दोनों शिक्षा का महत्व अच्छी तरह समझते थे इसलिए बेटे रंजीत को पिलीकोड के वेल्लाचल में स्थित सरकारी मॉडल रेजीडेंशियल स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया. यहां सरकारी खर्च पर रंजीत ने दसवीं तक की पढ़ाई की.  

इसके बाद हायर सेकेंड्री की पढ़ाई के लिए रंजीत ने बालनथोडे के सरकारी स्कूल को ज्वाइन किया. यहीं से उन्हें इकोनॉमिक्स में दिलचस्पी जागी. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद रंजीत ने राजापुरम के सेंट पायस कॉलेज में बीए इकोनॉमिक्स में दाखिला लिया. अब कॉलेज में पढ़ाई के साथ रहने का खर्च पूरा करना रंजीत के लिए मुश्किल हो गया था. एक बार उन्होंने पढ़ाई छोड़ने का ही फैसला कर लिया. लेकिन फिर उनकी नजर एक दिन एक विज्ञापन पर पढ़ी जिसमें पनाथुर में बीएसएनएल टेलीफोन एक्सजेंच की ओर से नाइट वाचमैन की नौकरी के लिए आवेदन मांगे गए थे. रंजीत ने यहीं पांच साल तक रात को नौकरी और दिन में पढ़ाई करने के साथ ग्रेजुएश और पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया.   

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रंजीत ने सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ केरल से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद IIT मद्रास में पीएचडी के लिए दाखिला लिया. चेन्नई आने से पहले रंजीत की मलयालम भाषा पर ही अच्छी पकड़ थी. IIT मद्रास में रंजीत को बोलने में भी झिझक होती थी. यहां उन्होंने एक साल बाद पीएचडी की पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया. लेकिन उनके गाइड प्रोफेसर सुभाष शशिधरन ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. प्रोफेसर सुभाष ने रंजीत को समझाया, हार मानने से पहले लड़ो जरूर.  

रंजीत को IIT मद्रास से डॉक्टरेट पूरी करने के बाद बेंगलुरु के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिली. पिछले दो महीने से रंजीत IIM रांची में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात हैं.  

केरल के वित्त मंत्री टी एम थॉमस ने फेसबुक पर रंजीत को शुभकामनाएं दी. साथ ही लिखा कि रंजीत की कहानी सभी के लिए प्रेरणा है. थॉमस ने लिखा, जब उसे लगा कि वो हार गया, वो उठा और कामयाबी हासिल कर ही दम लिया. हमारे सामने पहले महान हस्तियों की प्रेरणादायक कहानियां रहीं हैं, जिनमें के आर नारायणन भी शामिल हैं जिन्होंने असाधारण इच्छाशक्ति के दम पर कामयाबी हासिल की और देश के राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचे.  

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रंजीत की बहन 24 साल की रंजीता के आर भी अपने भाई को अपने लिए सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बताती हैं. रंजीता भी इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट और बीएड हैं.

 

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