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अफ्रीकी देश में शांति के लिए शहीद हो गए थे गुरबचन सिंह

आज बहादुर कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया की जयंती है. गुरबचन सिंह ने 5 दिसंबर 1961 में अफ्रीका के कॉन्गो में शांति के लिए लड़ते हुए खुद को न्योछावर कर दिया था. उन्हें याद कर, हर देशवासी का सीना गर्व से फूल जाता है.

प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो
मोहित पारीक
  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 4:02 PM IST

आज बहादुर कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया की जयंती है. गुरबचन सिंह ने 5 दिसंबर 1961 में अफ्रीका के कॉन्गो में शांति के लिए लड़ते हुए खुद को न्योछावर कर दिया था. उन्हें याद कर, हर देशवासी का सीना गर्व से फूल जाता है. वो एक मात्र यूएन पीसकीपिंग फोर्स के जवान थे, जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था. वो पीस कीपिंग फोर्स के तहत कान्गो गए थे.

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उनका जन्म पंजाब के गुरदासपुर के राजपूत परिवार में हुआ था और 9 जून 1957 को 1 गोरखा राइफल में शामिल हो गए थे. कान्गो में उन्होंने भारतीय सेना का मान बढ़ाया था. बता दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने कॉन्गो में विद्रोह को रोकने के लिए सेना भेजी थी, जिसमें भारतीय सेना के भी कई जवान थे. इस सेना में गुरबचन सिंह भी शामिल थे.

5 दिसम्बर 1961 को एलिजाबेथ विला में लड़ते हुए अद्भुत पराक्रम दिखाने के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया. इस दौरान दुश्मन के सौ में से चालीस जवान, वहीं ढेर हो गए लेकिन दुश्मन के बीच खलबली मच गई. तभी गुरबचन सिंह एक के दाब एक दो गोलियों का निशाना बन गए वह उस समय केवल 26 वर्ष के थे.

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