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'बंटेंगे तो कटेंगे' पर अजित पवार का मुखर विरोध क्या महायुति के लार्जर गेमप्लान का हिस्सा है?

'बंटेंगे तो कटेंगे' नारे पर मचे सियासी हंगामे के बीच महायुति में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एपी) के प्रमुख अजित पवार खुलकर इसके विरोध में उतर आए हैं. अजित पवार का मुखर विरोध क्या महायुति के लार्जर गेमप्लान का हिस्सा है?

अजित पवार (फाइल फोटो) अजित पवार (फाइल फोटो)
बिकेश तिवारी
  • नई दिल्ली,
  • 11 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:51 PM IST

महाराष्ट्र चुनाव में सत्ताधारी गठबंधन महायुति की दो प्रमुख पार्टियां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना हिंदुत्व की पिच पर खुलकर बैटिंग कर रही हैं. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने 'बंटेंगे तो कटेंगे' का नारा दिया. बीजेपी के साथ ही शिवसेना ने भी इस नारे का समर्थन किया है तो वहीं महायुति के ही एक घटक अजित पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इसके विरोध में खुलकर उतर आई है. अजित पवार ने साफ कह दिया है कि इसका समर्थन नहीं करता हूं. ये यूपी या झारखंड में चलता होगा, महाराष्ट्र में नहीं चलता.

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अजित पवार ने बीजेपी और शिवसेना के उलट महाराष्ट्र चुनाव में सबका साथ, सबका विकास का राग छेड़ दिया है. अजित के स्टैंड के बाद कयास महायुति में दरार के भी लगाए जा रहे हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि चुनावों के बीच महायुति में दरार खुलकर सामने आ गई है. इसके पीछे नवाब मलिक को टिकट से लेकर तमाम तर्क दिए जा रहे हैं लेकिन क्या बात वास्तव में दरार की ही है या अजित के तेवर चुनावी मौसम में महायुति के किसी लार्जर गेमप्लान का हिस्सा हैं? सवाल ये भी उठ रहे हैं.

क्यों उठ रही है गेमप्लान की बात

सीएम योगी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक हैं तो सेफ हैं का नारा दिया था. इस नारे को लेकर महायुति की ओर से महाराष्ट्र के अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर एक पेज का विज्ञापन दिया गया है जिसमें तीनों घटक दलों का निशान भी छपा है. इस विज्ञापन में महाराष्ट्र के अलग-अलग समुदायों की खास पगड़ी भी छपी है लेकिन मुस्लिम टोपी नहीं है. एक तरफ अजित पवार तेवर भी दिखा रहे हैं और दूसरी तरफ 'एक हैं तो सेफ हैं' के विज्ञापन में उनकी तस्वीर भी छपी है. 

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एक बल्ब जलाने के लिए भी बोर्ड से होल्डर तक जो तार जाता है, उसमें दो तार होते हैं. एक फेज का और दूसरा न्यूट्रल का. फेज तार के जरिये ऊर्जा का प्रवाह होता है तो न्यूट्रल तार उसे संतुलित करने का काम करता है. महायुति के तीन प्रमुख घटक दलों में से दो पार्टियां बीजेपी और शिवसेना हिंदुत्व की पिच पर आक्रामक रणनीति के साथ बढ़ चुकी हैं, ऐसे में अजित पवार का अलग स्टैंड कहीं इस फेज के लिए न्यूट्रल तार की भूमिका निभाने की रणनीति का हिस्सा तो नहीं है? अजित के अलग स्टैंड को महायुति के लार्जर गेमप्लान से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है, इसे पांच पॉइंट में समझा जा सकता है.

1- मुस्लिम नेताओं के लिए एनसीपी सेफ पैसेज

थोड़ा सा पीछे चलते हैं. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र के सियासी दलों में दलबदल का सिलसिला सा चल रहा था. विपक्षी महाविकास अघाड़ी (एमवीए, खासकर कांग्रेस के कई नेता अपनी पार्टी छोड़कर महायुति के घटक दलों में शामिल हो रहे थे. मिलिंद देवड़ा, अशोक चव्हाण जैसे नेताओं ने शिवसेना और बीजेपी का रुख किया. कांग्रेस बाबा सिद्दीकी ने भी छोड़ी लेकिन वे इन दोनों में से किसी पार्टी में नहीं, अजित पवार की पार्टी में शामिल हुए. मुस्लिम नेता एमवीए छोड़कर महायुति में आए तो उनके लिए अजित पवार की एनसीपी ही सेफ पैसेज बनी. अजित का ताजा रुख भविष्य में भी महायुति के साथ आने की चाह रखने वाले मुस्लिम नेताओं के लिए एनसीपी सेफ पैसेज बनी रहे, इस रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

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2- मुस्लिम वोट साधने की रणनीति

हिंदुत्व की पिच पर आक्रामक रणनीति उन सीटों पर उल्टी पड़ सकती है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इस रणनीति की वजह से मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर किसी उम्मीदवार को मात मिलती है तो नुकसान महायुति का ही होगा. अजित पवार ने बीजेपी के विरोध को दरकिनार कर अंतिम समय में नवाब मलिक को अपनी पार्टी का टिकट दे दिया था. पार्टी ने नवाब मलिक की बेटी सना मलिक और बाबा सिद्दीकी के बेटे जीशान सिद्दीकी को भी टिकट दिया है. नवाब को टिकट और अब बंटेंगे तो कटेंगे नारे का विरोध, अजित के यह दोनों ही कदम दो सहयोगियों की हिंदू फोकस्ड पॉलिटिक्स के बीच मुस्लिम वोटबैंक को बैलेंस करने की रणनीति से जोड़कर ही देखे जा रहे हैं.

3- बीजेपी को लेकर नैरेटिव काउंटर करने की कोशिश

एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम हैं. उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) से लेकर अन्य विरोधी पार्टियां भी यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश में जुटी नजर आई हैं कि सरकार तो बीजेपी ही चला रही है, फडणवीस ही चला रहे हैं. ज्यादातर मुद्दों पर सीएम शिंदे बीजेपी की लाइन के आसपास खड़े नजर आए हैं जिसकी वजह से इसे और बल ही मिला. बीजेपी की इमेज ड्राइविंग फोर्स की भी बन गई थी. अब अजित के अलग रुख को इस नैरेटिव और इमेज को काउंटर करने की रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

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4- असली का दावा है तो दिखना भी पड़ेगा

शरद पवार से बगावत कर एनसीपी के नाम-निशान पर कब्जा कर लेने के बाद से ही अजित पवार लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उनकी अगुवाई वाली पार्टी ही असली एनसीपी है. अब असली का दावा है तो असली की तरह दिखना भी पड़ेगा. एनसीपी की इमेज मुस्लिम विरोध की नहीं रही है. अब संकट ये है कि अजित पवार के दोनों गठबंधन सहयोगी मुखर हिंदुत्व की राह पर हैं. ऐसे में खुद अजित के लिए भी जरूरी हो जाता है कि वे अपने दावे को स्थापित करने के लिए इसका मुखर विरोध करें. लोकसभा चुनाव नतीजों में अजित की पार्टी एक ही सीट जीत सकी तो उसके पीछे भी यही वजह बताई गई कि एनसीपी के मतदाताओं को उनका पूरी तरह से बीजेपी के रंग में रंग जाना रास नहीं आया.

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5- अजित के गठबंधन में होने से नाराज वोटर को संदेश

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद एनडीए को हुए सीटों के नुकसान के लिए अजित पवार की पार्टी से गठबंधन को वजह बताया गया था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक पत्रिका में तो इसे लेकर बाकायदा लेख तक छपा था. पिछले दिनों हुए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव मुंबई के मंच पर देवेंद्र फडणवीस को भी इससे जुड़े सवालों का सामना करना पड़ा था. देवेंद्र फडणवीस ने तब कहा था कि हमारा कार्यकर्ता समझदार है. कई बार राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से कुछ फैसले लेने पड़ते हैं.

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देवेंद्र फडणवीस की नामांकन रैली से लेकर पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ राजनीतिक कार्यक्रमों तक, महायुति के आयोजन में बीजेपी और शिवसेना के बैनर-पोस्टर और झंडे दिखे लेकिन अजित पवार और उनकी पार्टी के निशान नदारद रहे. अब बीजेपी और शिवसेना के साथ एनसीपी (एपी) की तल्खी खुलकर सामने आ रही है तो इसके पीछे दरार का संदेश देकर अ्जित से गठबंधन को लेकर नाराज मतदाताओं को साधने की रणनीति तो नहीं?

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