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आर्टिकल-370 हटने का असर, पीडीपी से उठा भरोसा... जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीत के बड़े फैक्टर

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा वोटर्स के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था, जिस पर वह भरोसा कर सकें. ऐसे में लोगों ने एनसी को जमकर समर्थन दिया. दरअसल, पीडीपी ने 2014 के चुनाव के बाद बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था, इस वजह से लोगों का भरोसा पीडीपी से कम हुआ.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटों पर जीत का परचम लहराया है. (फोटो- पीटीआई) नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटों पर जीत का परचम लहराया है. (फोटो- पीटीआई)
मीर फरीद
  • श्रीनगर,
  • 08 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 12:07 AM IST

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC)और कांग्रेस के गठबंधन ने 48 सीटों पर जीत का परचम फहराया है. इसमें NC 42 सीटों पर तो कांग्रेस 6 सीटों पर चुनाव जीती है. इस जीत के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि उमर अब्दुल्ला अगले मुख्यमंत्री होंगे. ऐसे में ये जानना जरूरी है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के शानदार प्रदर्शन के पीछे क्या कारण रहे?

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आर्टिकल-370 हटने से विशेष दर्जा खोने का दर्द 

कश्मीर के लोग अभी तक नहीं भूले हैं कि किस तरह आर्टिकल-370 को हटाया गया. राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल देने से घाव पर नमक छिड़का गया. लोगों के मन में अभी भी उसका अहसास है. विकास, सड़क, पर्यटन के जरिए अविश्वास की खाई को भरने की बीजेपी ने पुरजोर कोशिश की, लेकिन सारी कोशिशें बुरी तरह फेल रहीं. जो घाटी के लोगों को ये नहीं समझा पाईं कि आर्टिकल-370 वरदान नहीं था. सम्मान का मामला नहीं था, बल्कि एक धोखा था, जिसे नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां राजनीतिक फायदे के लिए लोगों को बेच रही थीं.

सरकार के सख्त नियमों का पड़ा असर

आर्टिकल-370 के बाद अलगाववादी ईकोसिस्टम पर बीजेपी सरकार की अभूतपूर्व कार्रवाई से सुरक्षा की स्थिति में काफी सुधार हुआ, इससे आतंक और पत्थरबाजी की घटनाओं में भारी कमी आई, लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी और दंड के सिद्धांत से आम आदमी को भी कुछ मामलों में नुकसान उठाना पड़ा. जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की आम शिकायत शामिल थी, क्योंकि लोगों को डर था कि कोई भी असहमति उन्हें परेशानी में डाल सकती है, जबकि दूसरी ओर नौकरियों, पासपोर्ट और अन्य सेवाओं के लिए सिक्योरिटी वेरिफिकेशन को सख्त बना दिया गया था, क्योंकि जिस किसी का भी रिश्तेदार, भले ही वह कितना भी दूर का क्यों न हो अगर किसी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधि में शामिल पाया जाता था, तो उसे भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था. जिसके कारण भाजपा सरकार के खिलाफ गंभीर लेकिन मौन असंतोष पैदा हुआ.

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वोटर्स का पीडीपी से भरोसा दरका, इंजीनियर राशिद का भी नहीं चला जादू

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा वोटर्स के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था, जिस पर वह भरोसा कर सकें. ऐसे में लोगों ने एनसी को जमकर समर्थन दिया. दरअसल, पीडीपी ने 2014 के चुनाव के बाद बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था, इस वजह से लोगों का भरोसा पीडीपी से कम हुआ. इसका असर साफ तौर पर दिखा और पीडीपी सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई. उधर, लोकसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज कराने के बाद इंजीनियर राशिद जादू को फिर से चलाने में फेल रहे, क्योंकि उन्हें भाजपा के प्रॉक्सी के रूप में स्थापित करने का नेशनल कॉन्फ्रेंस का मास्टर स्ट्रोक काम कर गया और जो वोट बंट सकता था, वह एनसी के पास चला गया.

पीर पंजाल-चिनाब घाटी में अच्छा प्रदर्शन 

जम्मू के हिंदू बहुल जिलों में बीजेपी ने जीत दर्ज की, लेकिन जम्मू के पीर पंजाल और चिनाब घाटी क्षेत्रों में एनसी ने अच्छा प्रदर्शन किया, जहां हिंदू मुस्लिम आबादी का मिश्रण है. इसके अलावा कुछ क्षेत्र जो मुस्लिम बहुल वाले हैं, वहां भी एनसी को वोट मिले. क्योंकि ये एक समय पर कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, लेकिन पार्टी वोटरों को अपनी ओर खींचने में विफल रही, इसका लाभ नेशनल कॉन्फ्रेस को हुआ.

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