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केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में चुनाव प्रचार अब आखिरी चरण में है. चुनाव प्रचार का आखिरी हफ्ता बचा है, ऐसे में हर किसी के मन में सवाल यही है कि चुनाव किस दिशा में जा रहा है? क्या केजरीवाल के खिलाफ़ एंटी इनकम्बेंसी इतनी मजबूत है कि सत्ता में बदलाव हो जाए या कुछ नाराजगियों के बावजूद अरविंद केजरीवाल जीत की हैट्रिक लगाने के लिए तैयार हैं? 8 फरवरी के नतीज़ों के बाद क्या अरविंद चौथी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे या दिल्ली में केजरीवाल युग का पटाक्षेप हो जाएगा?
क्यों केजरीवाल बन गए हैं दिल्ली चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर?
दिल्ली में तीनों बड़ी पार्टियों ने मतदाताओं के सामने अपना-अपना एजेंडा रख दिया है. हर दल इस चुनाव में फ्री वाली योजनाओं पर फोकस करके लड़ रहा है. आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस के पास अपनी-अपनी रेवड़ियां हैं और जनता को यह चुनना है कि आखिरकार उन्हें कौन सी गोली पसंद आ रही है. बीजेपी यह साफ कर चुकी है कि वह मौजूदा सरकार की चल रही योजनाओं पर कोई भी ब्रेक नहीं लगाएगी.
यह एक तरीके से स्वीकारोक्ति भी है कि मौजूदा सरकार के अंदर चल रही योजनाएं पब्लिक को पसंद आ रही हैं. इससे एक बात और साफ हो जाती है कि थोड़ी-बहुत नाराजगी के बावजूद अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की सरकार की योजनाएं लोगों में पॉपुलर हैं. शायद यही वजह है कि इसलिए जाने-अनजाने केजरीवाल इन चुनावों में सबसे बड़ा फैक्टर बन चुके हैं.
करप्शन की तलवार क्या कुंद करेगी केजरीवाल की धार?
शराब घोटाले से लेकर मुख्यमंत्री आवास के निर्माण में गड़बड़ियों का आरोप सीधे-सीधे अरविंद केजरीवाल पर लगा और पहले मामले में तो उनकी गिरफ्तारी भी हुई. दिल्ली के लोगों के बीच इस बात की चर्चा तो है कि अरविंद केजरीवाल की इमेज अब पहले जैसी साफ-सुथरी नहीं रही. अब बात यहां पर आकर टिक जाती है कि क्या लोगों को ऐसी इमेज वाले मुख्यमंत्री से ऐतराज है या सरकारी सुविधाओं के आगे ये आरोप बौने साबित होंगे. आम आदमी पार्टी को सरकारी योजनाओं के सहारे नैया पार लगने की उम्मीद है. एक फैक्टर ये भी है कि बीजेपी हो या कांग्रेस, किसी भी दल ने दिल्ली चुनाव में सीएम फेस घोषित नहीं किया है.
फ्रीबीज़ बंद होने का डर!
आम आदमी पार्टी चुनाव प्रचार के दौरान इस बात पर जोर दे रही है कि अगर उसकी सरकार गई तो दिल्ली वालों को मिल रहे फ्रीबीज बंद हो जाएंगे. नई योजनाओं के अलावा लोगों को पुरानी योजनाओं के बंद होने का डर दिखाया जा रहा है. बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता फ्री की योजनाओं के खिलाफ बीजेपी के कई नेता बयान दे चुके हैं.
बीजेपी के नेता अब लगातार आश्वासन दे रहे हैं कि फ्री की योजनाएं बंद नहीं होंगी लेकिन जनता कितना विश्वास करती है, ये देखना होगा. हालांकि, आम आदमी पार्टी की सरकार ने भी मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना जैसी येजनाएं अभी लागू नहीं की हैं लेकिन लोगों में इस बात की चर्चा जरूर है कि सस्ती बिजली और पानी के साथ-साथ महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा तो मिल ही रही है.
केजरीवाल नहीं तो कौन?
एक और सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि अगर अरविंद केजरीवाल को लोग नहीं चुनना चाहते हैं तो फिर उनकी जगह विकल्प क्या है? ना ही बीजेपी और ना ही कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल के सामने बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार किसी चेहरे को प्रोजेक्ट किया है. ऐसा भी नहीं है कि दोनों पार्टियों में कोई और नेता अरविंद केजरीवाल का नेचुरल विकल्प भी दिखाई दे रहा हो.
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यानी बीजेपी और कांग्रेस अरविंद केजरीवाल पर हमला तो बोल रहीं हैं लेकिन सीएम फेस के सवाल पर चुनाव बाद तय करने की बात भी कह रहे हैं. ये बात आम आदमी पार्टी के लिए हथियार है और वो लोगों को इस कन्फ्यूजन के बारे में बता भी रही है. इसे ही अंग्रेजी में "देयर इज नो अल्टरनेटिव" यानि TINA फैक्टर कहा जाता है.
लेकिन, चुनावी गेम अभी बाकी है...
लेकिन आखिरी हफ्ते में भी इस बेहद करीबी चुनाव में कुछ भी हो सकता है. बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता कांग्रेस के राहुल गांधी तक, दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के दो बड़े चेहरे चुनाव प्रचार के आखिरी हफ्ते में अपने-अपने दल के लिए प्रचार के मैदान में नजर आएंगे. बड़े नेताओं की रैलियां और उनके जरिए बनाए गए नैरेटिव अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं. खास तौर पर कांग्रेस को वोट बैंक बढ़ने की उम्मीद नजर आ रही है तो उसके पीछे वजह आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के खिलाफ नाराजगी को कैश कराने की कोशिश ही है.
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वहीं, बीजेपी को उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव में जितना वोट उसे मिला था अगर वही विधानसभा चुनाव में भी समर्थन कर दें तो अरविंद केजरीवाल फैक्टर के बावजूद आम आदमी पार्टी को पराजित करना मुश्किल नहीं होगा. खास तौर पर तब, जब भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में पहले के मुकाबले गिरावट की बातें कहीं जा रही हैं. दिल्ली के दिल में क्या है? ये जनता 5 फरवरी को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कैद करेगी और 8 फरवरी को नतीजे आने के बाद ही पता चल सकेगा.