
'जो दौर हमने जिया है... वो हमारे बच्चे नहीं जी सकते.... अब तो दिलों में नफ़रतें बैठ गई हैं...', 74 साल के शम्सुद्दीन जब ऐनक उतारकर ये कहते हैं तो उनकी आंखों में सिवाए पीड़ा के कुछ नजर नहीं आता. ये पूछने पर कि कौन फैला रहा है नफ़रतें? वह साफगोई से एक झटके में कह जाते हैं कि आज तो इंसानियत ख़त्म हो गई है, शराफ़त ख़त्म हो गई है, मुहब्बत खत्म हो गई है... एक-दूसरे की तरक़्क़ी से इंसान जलने लगा है तो ऐसे में दिलों में नफ़रतें बैठना लाज़िमी है.
1947 में मुल्क दो टुकड़ों में बंटा तो शम्सुद्दीन का परिवार बंटवारे का दंश झेलता हुआ लाहौर से लखनऊ आ गया. शम्सुद्दीन कहते हैं कि लखनऊ कुछ जमा नहीं तो उनके अब्बा अगले ही साल दिल्ली आ गए. चांदनी चौक में उनके कुछ रिश्तेदार पहले से थे. तो परिवार ने भी यहीं आशियाना बना लिया. 1951 में शम्सुद्दीन का जन्म हुआ. बचपन से लेकर जवानी और अब बुढ़ापा चांदनी चौक की इन्हीं गलियों में बीत रहा है. उनकी चांदनी चौक में कपड़े की एक छोटी सी दुकान है, जो दशकों से दुल्हनों के लहंगे से लेकर बाकी कपड़े बेचती आ रही है.
शम्सुद्दीन ने जन्म से ही दिल्ली और यहां की सियासत को करीब से देखा है. इतने सालों में दिल्ली कितनी बदली? बड़े सुकून से इसका जवाब देते हुए वह कहते हैं कि मेरा तो जन्म ही ऐसे माहौल में बना, जब दिल्ली में बड़ी हलचल थी. देश को आजाद हुए कुछ ही साल बीते थे. मैंने तो 60 और 70 के दशक की दिल्ली भी देखी है और आज की दिल्ली भी देख रहा हूं. इंदिरा और राजीव को भी देखा है, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी को भी...
शम्सुद्दीन कहते हैं कि मेरे अब्बा पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के ज़बरदस्त फैन हुआ करते थे. मुझे भी नेहरू पसंद थे. मुझे याद है कि पंडित नेहरू जामा मस्जिद के पास बनी मौलाना आज़ाद की क़ब्र पर हर साल जाया करते थे, उस समय उनके साथ सिक्योरिटी नहीं होती थी. इसे लेकर उस समय घर-कूचे में बहुत बातें हुआ करती थीं कि नेहरू जी बिना सिक्योरिटी के वहां जाते हैं. नेहरू असल में मिलनसार थे. शांत स्वभाव के थे. वह आसानी से लोगों से कनेक्ट कर जाते थे. आज के समय में इतने बड़े कद के किसी नेता को बिना सिक्योरिटी के देख सकते हैं क्या? एक अदना सा पार्षद इतने रौब में चलता है, मानो किसी रियासत का महाराज हो.
शम्सुद्दीन को दिल्ली से जुड़े कई किस्से याद हैं. वह बताते हैं कि एक बार राजीव गांधी प्रचार करने चांदनी चौक आए थे. यहां रैली के दौरान उन्होंने अपनी सिक्योरिटी हटा दी थी तो उनसे बहुत कहा गया कि मुस्लिम इलाका है, कुछ अनहोनी हो सकती है लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने बिना सिक्योरिटी के यहां रैली की. चांदनी चौक तो ऐसी जगह है, यहां के लोगों ने सभी का दिल खोलकर स्वागत किया है. ऊपर से तब दिल्ली ऐसी नहीं थी, वो दौर अलग था, उस वक्त अलग मिजाज के लोग थे.
45 सालों से दिल्ली में रह रहे राम गोपाल भी कुछ इसी तरह पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि मुझे कई बार रह-रहकर पुराने दिन याद आते हैं. तब आज की तरह ना भीड़भाड़ थी, ना शोर-शराबा. जिदंगी में एक ठहराव था. मैं 1980 के दशक की शुरुआत में बागपत से दिल्ली आया था. शुरुआत में बाहरी दिल्ली के एक छोटे से गांव में कुछ साल रहा. उस गांव का नाम था- हिरण कूदना. वो यूपी और हरियाणा के किसी गांव की तरह था. आजकल के गांव कहां गांव रह गए हैं? कहने को गांव हैं, लेकिन उस दौर में लोगों के अंदर आत्मीयता थी. अपनापन था. पड़ोस में सभी मिल-जुलकर खाना खाते थे. कभी एक दिन ऐसा नहीं गया जब एक ही सब्जी के साथ खाना खाया हो. अपनी आलू-मटर की सब्जी के साथ-साथ पड़ोसियों की लौकी, बैंगन और कढ़ी खाई जाती थी. अब तो पता ही नहीं चलता कि बगल के मकान में कौन रहता है?
सरकारी नौकरी से रिटायर हुए राम गोपाल को एक अरसा हो गया है. वो कहते हैं कि 1984 के दंगों के बाद मैं अपने परिवार के साथ रोहिणी शिफ्ट हो गया था. इंदिरा गांधी की हत्या और बाद में हुए दंगों की यादें आज भी उनके जेहन में ताजा हैं. वह बताते हैं कि मैं किसी काम से दिल्ली कैंट गया था. खबर फैल गई कि इंदिरा जी को गोली लग गई है. उस वक्त तो कुछ भी क्लियर नहीं था, सौ लोग सौ तरह की बातें कर रहे थे. बाद में पता चला की सिखों ने गोली मारी है. सच कहूं सिर्फ सिखों में खौफ नहीं था.. मुसलमानों में भी एक तरह का खौफ था. उस समय जिस तरह की लूटपाट और मारकाट हुई, इतने सालों बाद भी भुलाए नहीं भूलती.
राम गोपाल की पत्नी उनकी बात को बीच में काटते हुए बोली कि जिंदा सिख फूंक दिए थे... एक इंदिरा गांधी की मौत का ऐसे बदला लिया. हमारी गली में सिख परिवार रहता था- रातोरात गायब हो गया. उस वक्त सोचते थे कि अच्छा है हम सिख नहीं हैं...
मेरे ये पूछने पर कि आपको क्या लगता है कि 1984 जैसा दंगा आज हो सकता है? राम गोपाल कहते हैं कि अभी कुछ साल पहले दिल्ली दंगे हुए. तीन दिनों तक चले. आज के समय में नफरत फैलाने का ट्रेंड बदला है. अब सब हाईटेक हो गया है. एक अफवाह सारा काम करा देती है. मॉब लिंचिंग यही तो है...
81 साल के कुलवंत सिंह ने जीवन का एक बड़ा हिस्सा घूमने-फिरने में गुजारा है. सिंह कहते हैं कि मेरे दोस्त मुझे घुमंतू कुलवंत कहते थे. जब भी मौका मिलता था, मैं घूमने निकल पड़ता था. मैंने दिल्ली के कई इलाकों में आबादी बसते देखी है. नॉर्थ और वेस्ट दिल्ली के खाली पड़े मैदान, जंगलों को कटते और वहां कॉलोनी बनती देखी है. पीतमपुरा में बारातघर की जगह स्कूल तो प्रशांत विहार में पुरानी जर्जर इमारत की जगह पीवीआर खुलते देखा है. आजादपुर के पास मॉडल टाउन में अल्पना नाम का सिंगल होम थिएटर हुआ करता था, उसे बंद होते हुए भी देखा है. उस थिएटर से बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं. कॉलेज के दिनों में वहां खूब फिल्में देखी हैं.
पुरानी दिल्ली की यादों में खोते हुए कुलवंत कहते हैं कि पहले दिल्ली में डीटीसी की डबल डेकर बसें चला करती थीं. 70 के दशक में खूब सवारी की है. पांच पैसे का टिकट हुआ करता था. लेकिन डीजल बसों पर बैन के बाद डबल डेकर बसें बंद कर दी गईं.
इन्हीं पुरानी यादों के बारे में जब हमने शम्सुद्दीन से जानने की कोशिश की कि आज की दिल्ली में क्या कमी खलती है? वह तपाक से कहते हैं पिकनिक जैसे शब्द अब फीके पड़ गए हैं. हमारे समय में पिकनिक होती थी. उसकी प्लानिंग करनी होती थी. कहां पिकनिक करनी है, क्या ले जाना है? किसके साथ जाना है? उसका रोमांच था जो अब नहीं रहा. पार्कों की भीड़ की सूरत भी बदल गई है. पहले पार्कों में परिवार मिलते थे, आउटिंग होती थी लेकिन अब वहां अधिकतर प्यार करने वाले मिलते हैं. वो सुकून अब दिल्ली में नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था. लोगों में अपनेपन की भावना खत्म हो गई है.
शम्सुद्दीन की बात की ही तस्दीक करते हुए अकरम कहते हैं कि एक वाकया सुनाता हूं. 1991 या 1992 की बात है, मैं उस समय किसी काम से रानी बाग जा रहा था. रोजमर्रा की तरह पैदल-पैदल जाना हुआ. उस वक्त मोबाइल फोन नहीं हुआ करता था. जैसे ही डीडीए पार्क क्रॉस किया, मुझे सीने में तेज दर्द हुआ और मैं धड़ाम से नीचे गिरा. पार्क में टहल रहे कुछ लोगों ने मुझे देखा और जैसे-तैसे करके अस्पताल पहुंचाया. उनमें मेरा एक पड़ोसी भी था. वह चाहता तो मेरी बीवी को बताकर झंझट से बच सकता था. लेकिन हॉस्पिटल में भर्ती कराने से लेकर एडमिट फीस भरने तक की सारी जिम्मेदारी उसने उठाई. ये अपनापन और इंसानियत आज देखने को नहीं मिलेगी. अभी दो दिन से तबीयत ठीक नहीं है, डॉक्टर घर पर विजिट कर रहे हैं. पर सामने रह रहे भाई साहब हालचाल भी नहीं पूछते. पहले सच में दिल्ली के लोग दिल वाले थे, तभी तो दिल्ली दिलवालों की कहा गया... आज तो ना वो दिल्ली बची है, ना दिल्लीवालों के पास दिल...