
हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में ही हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए हैं. जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस-एनसी गठबंधन ने बहुमत हासिल किया है तो वहीं हरियाणा में बीजेपी तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है. दोनों राज्यों में सबसे बड़ा झटका पीडीपी और जेजेपी को लगा है. जहां हरियाणा में जेजेपी का खाता नहीं खुल सका तो वहीं जम्मू-कश्मीर में पीडीपी को सिर्फ तीन ही सीटें मिल सकीं. दोनों राज्यों की इन क्षेत्रीय पार्टियों को अपने-अपने स्तर पर बड़े नुकसान हुए हैं. खास तौर पर दोनों पार्टियों को अपने पुराने सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (BJP) से गठबंधन करने का खामियाजा भुगतना पड़ा है और फिर अपने इलाकों में उनका सफाया होता दिख रहा है.
हरियाणा: JJP का गठबंधन और अकेले चुनाव लड़ने का नुकसान
जेजेपी 2019 में किंगमेकर बनकर उभरी थी, लेकिन इस बार दुष्यंत चौटाला के लिए स्थिति बदतर रही. हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर शनिवार को मतदान के बाद आए एग्जिट पोल के नतीजों ने भी दुष्यंत चौटाला की पार्टी JJP के लिए एक कठिन तस्वीर पेश की थी. हुआ भी ऐसा ही. उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी.
यह नतीजा पिछले चुनाव के विपरीत है, जब 2019 में JJP ने 10 सीटें जीती थीं और बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी. हालांकि, इस बार JJP का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला उसके लिए घाटे का सौदा साबित हुआ. खासतौर पर किसान आंदोलन के दौरान बीजेपी के साथ गठबंधन में रहना JJP के लिए बड़ी गलती साबित हुआ. किसान आंदोलन में JJP का समर्थन खोने से पार्टी के जाट वोट बैंक को भारी झटका लगा. दुष्यंत चौटाला खुद मानते हैं कि उस समय बीजेपी के साथ रहना गलत था, और यह गलती उन्हें अब भारी पड़ी.
जम्मू-कश्मीर: PDP की गिरती साख
दूसरी तरफ, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी की साख भी गिरती दिख रही है. यहां NC-कांग्रेस ने 49 सीटें जीती हैं तो वहीं बीजेपी 29 सीटों पर जीत दर्ज की है. लेकिन महबूबा मुफ्ती की पीडीपी सिर्फ 3 सीटों पर ही सिमट गई. महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP, जो कभी घाटी में मुख्यधारा की कश्मीरी मुस्लिम वोटबैंक की प्रमुख पार्टी थी, अब गिरावट का सामना कर रही है. 2015 में PDP ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर राज्य में सरकार बनाई थी, लेकिन इस गठबंधन के बाद पार्टी का समर्थन आधार टूट गया.
अनुच्छेद 370 हटने के बाद PDP की स्थिति और कमजोर हो गई, क्योंकि यह पार्टी की विचारधारा के खिलाफ था. इसके परिणामस्वरूप PDP के समर्थकों ने पार्टी से दूरी बना ली, और अब पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है.