
जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान की तारीख करीब आ गई है. पहले चरण में 24 सीटों पर 18 सितंबर को वोट डाले जाएंगे और इससे पहले इंजीनियर राशिद को लेकर कश्मीर की सियासी फिजा में गरमाहट है. इंजीनियर राशिद की चुनावी मौजूदगी को लेकर कश्मीर घाटी में मजबूत आधार रखने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसी प्रमुख पार्टियों के नेता परेशान हैं. वर्षों से कश्मीर की सियासत की धुरी रहीं ये पार्टियां परेशान क्यों हैं? सात पॉइंट में जानते हैं.
1- प्रतिबंधित जमात से गठबंधन
पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की परेशानी के पीछे बड़ी वजह अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) का जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन है. बारामूला के सांसद इंजीनियर राशिद एआईपी के प्रमुख हैं. जमात प्रतिबंधित संगठन है और इसने 1987 के विधानसभा चुनाव के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा है. जमात ने इस बार घाटी की सात विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. जब जमात और एआईपी में गठबंधन हो गया है तो मुख्य पार्टियों की टेंशन ये है कि इंजीनियर राशिद का ग्लैमर और जमात का कैडर मिलकर उनका गणित ना बिगाड़ दें.
2- सियासी आधार की चिंता
महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) दक्षिण कश्मीर में मजबूत आधार रखती है. पार्टी के मजबूत आधार के पीछे जमात का कैडर भी माना जाता है. जमात लंबे समय से चुनावी राजनीति से दूर रही है और पार्टी पीडीपी को समर्थन देती आई है. इस बार पार्टी के उम्मीदवार उतारने से जमात के वोट माइनस हुए तो पीडीपी का आधार खिसक सकता है. जमात ने सात में से पांच उम्मीदवार इसी दक्षिणी कश्मीर की सीटों पर ही उतारे हैं. एआईपी और जमात के गठबंधन ने उत्तरी और मध्य कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की चुनौती भी बढ़ा दी है. इस इलाके में इंजीनियर राशिद और जमात के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हुए तो नेशनल कॉन्फ्रेंस की राह मुश्किल हो सकती है.
3- संसदीय चुनावों के नतीजे
हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में इंजीनियर राशिद ने बारामूला सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा था. बारामूला सीट पर नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुद मैदान में थे. तब राशिद ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के सबसे बड़े चेहरों में से एक उमर को शिकस्त दे दी थी और वह भी एकतरफा अंदाज में. राशिद को दो लाख वोट से अधिक के अंतर से जीत मिली थी. उमर अब्दुल्ला विधानसभा चुनाव में बड़गाम विधानसभा सीट से मैदान में हैं जो उसी बारामूला संसदीय क्षेत्र में आती है, जहां से इंजीनियर राशिद सांसद हैं.
4- अलगाववादी वोट
महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीडीपी को जमात का साथ मिलता रहा है. जमात की इमेज अलगाववादी पार्टी के रूप में है और पीडीपी को लेकर भी कहा जाता है कि पार्टी की लाइन सॉफ्ट अलगाववाद रहा है और यही वजह है कि उसे जमात का समर्थन मिलता आया है. दूसरी प्रमुख पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस की इमेज उदारवादी दल की है और दक्षिण कश्मीर में पार्टी की कमजोर पकड़ के पीछे भी इसे एक बड़ा फैक्टर बताया जाता है. जमात और एआईपी, दोनों की ही राजनीति का आधार कश्मीर समस्या का समाधान रहा है. ऐसे में जब एक विकल्प मौजूद है, सॉफ्ट या हार्ड अलगाववादी महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला की पार्टी पर भरोसा करेंगे, ऐसा लगता नहीं है.
5- 370 का एजेंडा और सेंटीमेंट
राज्य से केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने और विशेष दर्जा वापस लिए जाने के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव है. जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में इस बार अनुच्छेद 370 और 35 ए प्रमुख मुद्दा हैं. नेशनल कॉन्फ्रेंस से लेकर पीडीपी तक, घाटी के हर प्रमुख दल के एजेंडे में ये प्रमुखता से है. अब हार्डलाइनर इंजीनियर राशिद और जमात भी मजबूती से इसकी बात कर रहे हैं. कश्मीर के सेंटीमेंट से जुड़े इन मुद्दों को लेकर इंजीनियर राशिद की मुखरता दोनों प्रमुख दलों की टेंशन बढ़ा रही है.
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6- घाटी की सियासत
कश्मीर घाटी की सियासत में वर्षों से नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ही मुख्य प्लेयर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के बाद अब अगर विधानसभा चुनाव में इंजीनियर राशिद की अगुवाई वाला गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहता है तो ये घाटी की सियासत में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार की पॉलिटिक्स के लिए खतरा होगा. सज्जाद लोन पहले से ही विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश में हैं. अब अगर एआईपी-जमात घाटी की सियासत में तीसरे विकल्प के रूप में उभरते हैं तो निश्चित रूप से ये दोनों मुख्य पार्टियों के लिए चिंता की बात होगी.
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7- राजनीतिक दलों को लेकर निरुत्साह
चुनाव बहिष्कार, मतदान बहिष्कार की खबरों के लिए सुर्खियों में रहती आई कश्मीर घाटी में मुख्य धारा की पार्टियों के विरोध का सेंटीमेंट भी रहा है. इंजीनियर राशिद और जमात का गठबंधन इस सेंटीमेंट के लिए एक मंच की तरह भी देखा जा रहा है. उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में पंचायत आजतक जम्मू कश्मीर के मंच पर कहा भी था, "इंजीनियर राशिद ने आज क्या कहा? अफजल गुरु की कुर्बानी, मकबूल भट्ट की कुर्बानी जाया नहीं होनी चाहिए. वो किस सेंटीमेंट को एड्रेस करते हैं. अगर वो जीत जाते हैं तो कौन सा सेंटीमेंट जीतता है? अगर राशिद साहब के कार्यक्रम में हुजूम उमड़ा तो क्या ये अच्छी बात है?"