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5 साल में कितना बदल चुका है महाराष्ट्र और झारखंड में चुनावी सीन? किसका खेमा हुआ मजबूत- 10 points में समझें

महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है, जहां बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए और विपक्षी इंडिया ब्लॉक के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी. महाराष्ट्र में एनडीए की सरकार है जबकि झारखंड में जेएमएम के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन की सत्ता है. चुनावी अभियान तेज है, लेकिन सीट शेयरिंग पर सहमति बाकी है. 10 पॉइंट्स में समझिए इन राज्यों के चुनावी समीकरण.

 मल्लिकार्जुन खड़गे, जेपी नड्डा मल्लिकार्जुन खड़गे, जेपी नड्डा
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 5:46 PM IST

महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है. दोनों ही राज्यों में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और विपक्षी इंडिया ब्लॉक में आमने-सामने मुकाबला है. महाराष्ट्र में एनडीए सरकार है, जबकि झारखंड में जेएमएम के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन की सरकार है.

हालांकि, दोनों ही राज्यों में अभी तक सीट शेयरिंग फाइनल नहीं हुआ है. एनडीए और इंडिया ब्लॉक के सहयोगी दलों में बातचीत को अंतिम रूप देने की कोशिश की जा रही है. पहले लोकसभा, फिर हरियाणा विधानसभा चुनाव में जीत के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद हैं. INDIA ब्लॉक की तैयारी भी तेज हो गई है.

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1. झारखंड में इस बार सहयोगी दलों के साथ उतरेगी बीजेपी

दरअसल, महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव में बीजेपी को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है. हरियाणा चुनाव के नतीजों ने बीजेपी को बूस्टर मिला है. नेताओं में जोश है और कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं. पार्टी को लग रहा है कि महाराष्ट्र और झारखंड में भी वो अच्छा प्रदर्शन करेगी. झारखंड में बीजेपी का मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ JMM-कांग्रेस अलायंस से है. बीजेपी इस बार यहां ऑल इंडिया झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जनता दल यूनाइटेड के साथ मिलकर चुनाव लड़ने जा रही है. 

2019 में बीजेपी ने अकेले झारखंड चुनाव लड़ा था, जबकि जेएमएम ने कांग्रेस और आरजेडी से अलायंस किया था. राज्य में कुल 81 सीटें हैं. इस अलायंस ने 47 सीटें जीती थीं. बीजेपी को सिर्फ 25 सीटों पर ही जीत मिल सकी थी. उस समय बीजेपी के सीएम रघुवर दास खुद चुनाव हार गए थे. उन्हें बीजेपी के बागी सरयू राय ने जमशेदपुर पूर्व सीट से चुनाव हराया था.

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2. झारखंड में बड़े मुद्दे क्या हैं?

झारखंड में हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं और झारखंड मुक्ति मोर्चा को कांग्रेस का समर्थन है. सीएम सोरेन भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं. वे जमानत पर जेल से रिहा हुए हैं. बीजेपी लगातार करप्शन का मुद्दा उठा रही है और चंपई सोरेन की नाराजगी का कैश कराने की तैयारी कर रही है. दरअसल, जब हेमंत जेल गए थे, तब पार्टी ने चंपई को नया सीएम बनाया था.

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हालांकि, 5 महीने बाद जब हेमंत रिहा हुए तो चंपई को कुर्सी छोड़नी पड़ी और नाराज होकर वे बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी अब चंपई की मदद से आदिवासी वोट बैंक साधने की कोशिश में जुट गई है. झारखंड में आदिवासी मतदाता किसी भी चुनाव का निर्णायक फैक्टर होते हैं. सोरेन और JMM ने इस वोट बैंक को मजबूत किया है, लेकिन बीजेपी भी इसे अपने पक्ष में करने की कोशिश में है. राज्य में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता चुनावी मुद्दे होंगे. विपक्षी पार्टियां इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाने की कोशिश करेंगी.

3. झारखंड में हेमंत के सामने चुनौती क्या?

हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार के सामने पांच साल की सत्ता विरोधी लहर है. लोकसभा चुनाव के नतीजों में JMM को इसका नुकसान उठाना पड़ा है. कथित भ्रष्टाचार और आदिवासी बहुल इलाकों में तेजी से बदलती आबादी की तस्वीर का मुद्दा भी गरम है. बीजेपी, धर्मांतरण को लेकर हमलावर है. हेमंत सोरेन जमीन घोटाले में फंसे हैं. हालांकि, जेएमएम और हेमंत सोरेन आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी ने उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की है. लेकिन यह दांव कितना सफल होगा, यह चुनाव नतीजे आने के बाद पता चल सकेगा.

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कांग्रेस JMM के साथ गठबंधन में है, लेकिन पार्टी की स्थिति कमजोर है. उसका चुनावी प्रदर्शन और गठबंधन की मजबूती बड़ा फैक्टर रहेगा. बीजेपी ने झारखंड में आदिवासी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है. पहले द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया. उसके बाद ओडिशा में मोहन माझी को सीएम बनाया और हाल ही में चंपाई सोरेन की बीजेपी में एंट्री कराई है. माना जा रहा है कि बीजेपी इस समुदाय पर विशेष ध्यान दे रही है, जो चुनावों में बड़ा फैक्टर रहेगा.

4. महाराष्ट्र में क्या बड़े मुद्दे?

महाराष्ट्र में आरक्षण का मुद्दा गरम है और विपक्षी दल इसी के सहारे बीजेपी-महायुति सरकार को घेरने में लगे हैं. पिछले छह महीने से मराठा समुदाय, ओबीसी कोटे से आरक्षण देने की मांग कर रहा है. जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय इस मांग के खिलाफ है और दोनों समुदाय की लड़ाई थम नहीं रही है. सरकार सुलह का फॉर्मूला नहीं निकाल पाई है.

इस बीच, धनगर समाज भी आदिवासी दर्जा देने की मांग करने लगा है. इधर, एसटी वर्ग (आदिवासी समुदाय) ने धनगर समुदाय की इस मांग का विरोध किया है. मराठा आरक्षण आंदोलन को नेतृत्व देने वाले मनोज जरांगे पाटिल का राजनीतिक रुख कई विधानसभा क्षेत्रों में असर डाल सकता है. बीजेपी के सामने डैमेज कंट्रोल और बीच का रास्ता निकालने की चुनौती है. इसके अलावा, महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान आंदोलन और उनकी समस्याओं का असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है. किसानों के मुद्दे हर पार्टी के लिए अहम चुनावी फैक्टर रहेंगे.

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5. 5 साल में कितना बदल चुका है महाराष्ट्र?

महाराष्ट्र में इस समय महायुति की सरकार है. शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री हैं. NCP प्रमुख अजित पवार और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम हैं. महाराष्ट्र में 2019 के चुनाव नतीजे आने के बाद से लगातार उथल-पुथल देखने को मिली है. बीजेपी ने शिवसेना (अविभाजित) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. नतीजे आने के बाद बीजेपी-शिवसेना में मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद बढ़ा और उद्धव ठाकरे अलग हो गए. इस बीच, बीजेपी ने अजित पवार से डील फाइनल की और 23 नवंबर 2019 की सुबह शपथ ग्रहण हो गया. देवेंद्र फडणवीस ने सीएम और अजित ने डिप्टी सीएम की शपथ ली. यह सरकार 80 घंटे ही चल सकी और अजित पवार पाला बदला और महा विकास अघाड़ी का हिस्सा बन गए. 

MVA ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बनाई और इस सरकार में भी अजित को डिप्टी सीएम बनाया गया. जून 2022 में एकनाथ शिंदे समेत अन्य विधायकों ने शिवसेना से बगावत कर दी और बीजेपी के पाले में चले गए. MVA गठबंधन सरकार की सरकार गई और बीजेपी के समर्थन से शिंदे नए सीएम बन गए. सालभर बाद यानी जून 2023 में एनसीपी में भी टूट हो गई और अजित भी एनडीए सरकार का हिस्सा बन गए. फिलहाल, अब महाराष्ट्र में दो शिवसेना, दो एनसीपी हैं. एक शिवसेना और एक एनसीपी बीजेपी अलायंस के साथ है.

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दूसरी शिवसेना और दूसरी एनसीपी कांग्रेस अलायंस का हिस्सा है. अब विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद खबर है कि उद्धव शिवसेना के कई नेता बीजेपी के संपर्क में हैं. माना जा रहा है कि ये नेता उद्धव की पार्टी का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. उद्धव सेना के इन नेताओं का कहना है कि वे वैचारिक रूप से बीजेपी के ज्यादा करीब हैं. राज्य में बीजेपी का खेमा मजबूत हुआ है और शिवसेना का परंपरागत वोट बैंक अब बंट चुका है. इसके अलावा, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) की राजनीतिक शक्ति पिछले कुछ वर्षों में कम हो गई है, लेकिन राज ठाकरे अभी भी कुछ हद तक मराठी मतदाताओं पर प्रभाव रखते हैं.

6. 5 साल में झारखंड में क्या बदला?

2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस गठबंधन ने बीजेपी को हराकर सरकार बनाई. हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने. JMM का आधार आदिवासी मतदाताओं में मजबूत है और सरकार ने अपनी नीतियों से इस बड़े वर्ग को साधने की कोशिश की है. बीजेपी अब विपक्ष में है. हाल के वर्षों में राज्य में बीजेपी ने अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश की है, लेकिन अभी भी सत्ता वापसी के लिए संघर्षरत है.

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झारखंड में विपक्षी दलों ने हेमंत सोरेन सरकार को गिराने की कोशिश की, लेकिन सरकार बच गई. वहीं, विपक्षी एकजुटता का प्रभाव झारखंड में आने वाले चुनावों पर देखा जा सकता है. खासकर अगर बीजेपी कोई बड़ा गठबंधन करती है. वहीं, हेमंत सोरेन और उनके परिवार पर अवैध खनन और भूमि घोटालों के आरोप लगे हैं, जिससे उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचा है. हालांकि, सोरेन सरकार अभी स्थिर है, लेकिन भविष्य में यह मुद्दे उनके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं.

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7. महाराष्ट्र में किसकी क्या स्थिति?

महाराष्ट्र चुनाव ना सिर्फ महायुति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि महाविकास अघाड़ी की प्रतिष्ठा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. 2023 में जिस तरह उद्धव के नेतृत्व वाली MVA सरकार गिरी, उससे गठबंधन की साख प्रभावित हुई है. MVA ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने शिवसेना में टूट कराई है, जिसके कारण उद्धव को इस्तीफा देना पड़ा. इस चुनाव के जरिए विपक्षी गठबंधन अपनी उस हार और सरकार गिराने का बदला लेना चाहेगा, जिसे वह विश्वासघात का नाम देता आ रहा है.

8. क्या लड़की बहन योजना बनवाएगी महायुति की सरकार?

लोकसभा चुनाव में महायुति को जितनी सफलता की उम्मीद थी, उतनी नहीं मिली. इंडिया ब्लॉक ने जबरदस्त वोट शेयर और रिकॉर्ड सीटें हासिल कीं. उसके बाद महायुति सरकार ने रणनीति बदली और पिछले कुछ दिनों में सरकार की ओर से कई बड़े ऐलान किए गए. चाहे वो लड़की बहिन योजना हो या युवाओं को भत्ता देने की योजना. कई माध्यमों से लोगों के बैंक खातों में पैसा आएगा. इससे महाविकास अघाड़ी के सामने चुनौती भी बढ़ गई है. देखना यह है कि लोग पांच साल के राजनीतिक भूचाल, विचारधारा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूखा और राजनीति में नैतिकता के आधार पर वोट देंगे या फिर आरक्षण, जातीय समीकरण और नये गठबंधन को स्वीकार करेंगे.

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9. महाराष्ट्र में कौन-कौन पार्टियां? 

महायुति: बीजेपी, एकनाथ शिंदे की शिवसेना, अजित पवार की एनसीपी और क्षेत्रीय सहयोगी दल हैं.

MVA: कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और सीपीएम है.

झारखंड में कौन-कौन पार्टियां?

इंडिया ब्लॉक: झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वामपंथी दल शामिल हैं.

एनडीए: बीजेपी, AJSU, JDU शामिल है.

10. महाराष्ट्र में कौन-कौन बड़े नेता?

महाराष्ट्र में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बीजेपी के प्रमुख चेहरा हैं. उनकी प्रशासनिक छवि और मराठा समुदाय के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश महत्वपूर्ण है. वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना के एक बड़े धड़े का एनडीए के साथ होना चुनावी समीकरण में अहम फैक्टर है. उनके नेतृत्व को जनता कितनी स्वीकारती है, यह चुनाव परिणामों में देखने को मिलेगा. अजित पवार का एनडीए में शामिल होना महाराष्ट्र चुनावों का प्रमुख मुद्दा रहेगा.

वो उपमुख्यमंत्री हैं और मराठा वोट बैंक को साधने की कोशिश करेंगे. एनसीपी के संस्थापक शरद पवार अब भी महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेता हैं. उनकी पार्टी का विभाजन और उनकी रणनीति चुनावी परिणामों पर बड़ा असर डाल सकती है. शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुट अब महा विकास आघाड़ी में शामिल है. उनकी छवि और मराठा वोट बैंक में उनके समर्थन की कमी या मजबूती MVA के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करेगी. कांग्रेस से प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले मैदान में डटे हैं.

झारखंड में कौन-कौन बड़े नेता?

झारखंड में वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख चेहरे हैं. उनकी आदिवासी समर्थक नीतियों और भूमि विवादों से जुड़े कानूनी मामले चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकते हैं. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास इस समय ओडिशा के राज्यपाल हैं. वे झारखंड में बीजेपी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक रहे हैं. इसके अलावा, झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी बीजेपी के बड़े चेहरे हैं और प्रदेश अध्यक्ष हैं. उनका आदिवासी समाज में बड़ा समर्थन है और उनका प्रभावी व्यक्तित्व बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण होगा.

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इसी तरह, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) के प्रमुख नेता सुदेश महतो का राज्य के कुछ हिस्सों में अच्छा खासा जनाधार है. उनकी पार्टी बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है और गठबंधन की स्थिति को देखते हुए वो चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. भाकपा (माले) से जुड़े अरुप चटर्जी भी राज्य में वामपंथी राजनीति का मजबूत चेहरा हैं. उनका प्रभाव मुख्य रूप से झारखंड के मजदूर और गरीब तबके में है. हालांकि वामपंथी दल यहां मुख्यधारा में नहीं हैं, लेकिन वे कुछ क्षेत्रों में प्रभावी हो सकते हैं.

झारखंड के आदिवासी और राजनीति में शिबू सोरेन का बड़ा नाम हैं. वे झारखंड आंदोलन के दिग्गज नेता हैं और राज्य में अभी भी उनके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग है. उनकी उपस्थिति JMM के चुनावी रणनीति को मजबूती देती है. सुदेश महतो के करीबी और युवा नेता अमित महतो झारखंड की राजनीति में उभरते हुए नेता हैं. उनका क्षेत्रीय समर्थन और AJSU में उनकी भूमिका उन्हें चुनावों में महत्वपूर्ण बनाती है. रामेश्वर उरांव कांग्रेस के आदिवासी नेता हैं और वर्तमान में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. वे आदिवासी समाज में कांग्रेस का आधार मजबूत कर सकते हैं. चंपई सोरेन कोल्हान क्षेत्र में पार्टी के बड़े चेहरे हैं. उनका प्रभाव बीजेपी की चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभा सकता है.

महाराष्ट्र और झारखंड में बड़े भाई की भूमिका में बीजेपी

महाराष्ट्र और झारखंड में बीजेपी एक-दो दिन में अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट भी जारी कर सकती है. बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होने जा रही है. इसमें उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम मुहर लगेगी. दोनों ही राज्यों में बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में देखी जाएगी. महाराष्ट्र में बीजेपी 150 से 160 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. जबकि झारखंड में 67 से 70 सीटों पर उम्मीदवार फाइनल किए जाने पर मंथन चल रहा है.

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