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'एक थे तो सेफ थे...', भाई राज ठाकरे की तरह ही हो गया उद्धव ठाकरे का भी हाल!

महाराष्ट्र में वोटों की गिनती जारी है. अब तक के रूझानों से साफ हो गया है कि महाराष्ट्र में महायुति सरकार वापसी करने जा रही है. इस चुनाव में सबसे बड़ा नुकसान ठाकरे परिवार को होता दिख रहा है. ठाकरे गुट की शिवसेना के लिए 25 सीटें जीतना भी मुश्किल हो रहा है. राज ठाकरे के बेटे अमित भी हारते नजर आ रहे हैं.

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे.
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 23 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:46 PM IST

महाराष्ट्र में एक बार फिर महायुति की सरकार बनने जा रही है. अब तक के रुझानों में महायुति गठबंधन ने विधानसभा की 288 में से दो-तिहाई से ज्यादा सीटों पर बढ़त बना ली है. 

चुनाव आयोग के मुताबिक, साढ़े 11 बजे तक की गिनती में बीजेपी 126, शिवसेना 53 और एनसीपी 34 सीटों पर आगे चल रही है. जबकि, महा विकास अघाड़ी गठबंधन की पार्टियां बुरी तरह हारती दिख रहीं हैं. शिवसेना (यूबीटी) को 21, कांग्रेस को 19 और एनसीपी (एसपी) 15 सीटों पर बढ़त मिल रही है.

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अगर यही रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं तो सबसे बड़ा झटका उद्धव ठाकरे को लगेगा. क्योंकि ये चुनाव एक तरह से ठाकरे और उनकी शिवसेना के अस्तित्व का चुनाव है. नतीजे शिंदे पक्ष में आने का सीधा मतलब है कि अब शिवसेना का मतलब सिर्फ 'ठाकरे' नहीं है.

महाराष्ट्र में एक और ठाकरे की सेना भी चुनाव लड़ रही है. और वो है राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे. लेकिन मनसे का भी बुरा हाल है. पिछले चुनाव में मनसे ने कम से कम एक सीट जीती थी. लेकिन इस बार तो पार्टी का खाता भी खुलता नहीं दिख रहा है. 

कुल मिलाकर अब महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार का शायद वो दबदबा न रहे, जो हुआ करता था. क्योंकि पार्टी सियासी जमीन लगातार खोती जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उद्धव ठाकरे का हाल भी भाई राज ठाकरे की तरह ही हो जाएगा?

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पहले राज ठाकरे

शिवसेना और ठाकरे परिवार जब तक साथ थे, तब तक खूब आगे बढ़े. लेकिन जैसे ही अलग हुए, वैसे ही सियासी जमीन खोते चले गए.

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे चचेरे भाई हैं. एक वक्त था, जब शिवसेना में राज ठाकरे को बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता था. मगर फिर बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव को आगे बढ़ाना शुरू किया तो नाराज होकर राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी.

साल 2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) नाम से अपनी पार्टी शुरू की. उनके पीछे 'ठाकरे' जैसा ताकतवर पारिवारिक नाम था. नई पार्टी बनने के बाद जब मनसे ने 2009 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा तो 13 सीटों पर जीत दर्ज की. इस चुनाव में उन्हें 'मराठी माणूस' के मुद्दे को भुनाया. 

लेकिन 2014 में 2 और 2019 में 1 सीट पर सिमट गई. इस बार तो पार्टी का खाता भी नहीं खुलता दिख रहा है. इस चुनाव में राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे माहिम सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. अमित अभी तीसरे नंबर पर हैं.

अब उद्धव ठाकरे

जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी. शिंदे अपने साथ 39 विधायकों को भी ले आए. इस तरह से महा विकास अघाड़ी की सरकार गिर गई और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा. बाद में शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने.

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महाराष्ट्र में बीजेपी हमेशा शिवसेना का 'बड़ा भाई' बनकर रही. 2019 का चुनाव साथ मिलकर लड़ा. लेकिन मुख्यमंत्री पद पर सहमति नहीं बनने के कारण उद्धव ठाकरे ने एनडीए का साथ छोड़ा और कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली थी.

शिवसेना जब टूटी तो इसका सीधा-सीधा असर ठाकरे पर पड़ा. एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने पर ठाकरे पर न सिर्फ अवसरवादी होने का आरोप लगा. बल्कि उन पर हिंदुत्व को धोखा देने का इल्जाम भी लगा. इससे शिवसेना का हिंदू वोट खिसका. 2024 के लोकसभा चुनाव में एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने से ठाकरे की शिवसेना को मुसलमानों और दलितों ने खुलकर वोट दिया. लेकिन विधानसभा चुनाव में इसका उल्टा हो गया.

महाराष्ट्र विधानसभा में ठाकरे की शिवसेना के पास अभी 16 विधायक थे. अभी उनकी पार्टी 21 सीटों पर आगे चल रही है. पिछले चुनाव में जब शिवसेना एकजुट थी, तो उसने 126 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से 56 जीती थीं. इस बार ठाकरे की शिवसेना ने करीब 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और उसे 25 सीटें भी मिलती नहीं दिख रही हैं.

एक थे तो सेफ थे?

अब यहां बात आती है कि क्या टूट और अलग होने का नतीजा चुनाव पर दिख रहा है. ये बात राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, दोनों पर फिट बैठती है.

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जब तक राज ठाकरे शिवसेना के साथ थे, तो महाराष्ट्र की सियासत पर उनकी पकड़ थी. मराठी माणूस और उत्तर भारतीयों के विरोध ने उन्हें ताकतवर नेता बना दिया था. लेकिन ठाकरे परिवार से अलग होने के बाद वो सियासत में कुछ खास कमाल नहीं दिखा सके. इस चुनाव से उन्होंने अपने बेटे को लॉन्च किया था, लेकिन ताकतवर परिवार से वास्ता रखने के बावजूद अमित ठाकरे को जनता का साथ नहीं मिल रहा है.

इसी तरह, उद्धव ठाकरे को भी शिवसेना के टूटने का नुकसान उठाना पड़ रहा है. शिवसेना का कोर वोटर अब बंट चुका है. विधानसभा चुनाव के जो नतीजे सामने आ रहे हैं, उससे लग रहा है कि जनता ने अब शिंदे गुट को ही 'असली शिवसेना' मान लिया है.

लेकिन अगर आज शिवसेना एक ही होती और उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे भी साथ होते तो नतीजे शायद कुछ और हो सकते थे. 

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